सस्ती दवा का सच

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एनपीपीए द्वारा 39 आवश्यक दवाओं के मूल्य निर्धारण के बीच बड़ा सवाल—क्या सस्ती दवा वास्तव में हर मरीज तक निर्धारित कीमत पर पहुंच पाएगी?

कुमार कृष्णन

बीमार पड़ना केवल स्वास्थ्य का संकट नहीं बल्कि भारत जैसे देश में आर्थिक संकट भी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और विभिन्न राष्ट्रीय अध्ययनों ने बार-बार संकेत दिया है कि भारत में स्वास्थ्य पर होने वाले कुल खर्च का बड़ा हिस्सा लोगों को अपनी जेब से वहन करना पड़ता है। इस खर्च का सबसे बड़ा भाग दवाओं पर होता है। यही कारण है कि जब राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) आवश्यक दवाओं की कीमत तय करता है या उनमें संशोधन करता है तो उसका प्रभाव केवल दवा उद्योग तक सीमित नहीं रहता, बल्कि करोड़ों परिवारों की घरेलू अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है।

हाल ही में एनपीपीए ने उच्च रक्तचाप, हृदय रोग और अन्य गंभीर बीमारियों के उपचार में प्रयुक्त 39 दवाओं की खुदरा कीमत निर्धारित की है। इसके साथ ही एंटी-रेबीज इम्यूनोग्लोबुलिन इंजेक्शन की कीमत में संशोधन किया गया है तथा कैल्शियम और विटामिन डी-3 जैसी व्यापक रूप से उपयोग होने वाली दवाओं का अधिकतम खुदरा मूल्य भी तय किया गया है। पहली दृष्टि में यह एक नियमित प्रशासनिक निर्णय प्रतीत हो सकता है किंतु इसके पीछे सार्वजनिक स्वास्थ्य, दवा उद्योग, उपभोक्ता अधिकार और सामाजिक न्याय जैसे अनेक गंभीर प्रश्न जुड़े हुए हैं।

भारत में उच्च रक्तचाप और हृदय रोग तेजी से बढ़ रहे हैं। जीवनशैली में बदलाव, तनाव, असंतुलित खान-पान और शारीरिक श्रम में कमी के कारण ये बीमारियाँ अब केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रह गई हैं। लाखों लोग वर्षों तक नियमित दवाओं पर निर्भर रहते हैं। ऐसे मरीजों के लिए दवा की कीमत में मामूली कमी भी मासिक खर्च में उल्लेखनीय राहत ला सकती है। यही बात कैल्शियम और विटामिन डी-3 जैसी दवाओं पर भी लागू होती है, जिनका उपयोग केवल बुजुर्ग ही नहीं, बल्कि महिलाओं, बच्चों और गर्भवती माताओं तक के उपचार में किया जाता है।

इसी प्रकार एंटी-रेबीज इम्यूनोग्लोबुलिन का महत्व किसी परिचय का मोहताज नहीं है। भारत में हर वर्ष बड़ी संख्या में लोग कुत्तों, बंदरों और अन्य जानवरों के काटने का शिकार होते हैं। रेबीज एक ऐसी बीमारी है, जिसमें समय पर उपचार न मिले तो मृत्यु लगभग निश्चित मानी जाती है। इसलिए इस जीवनरक्षक दवा की कीमत का निर्धारण केवल आर्थिक नहीं बल्कि मानवीय दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

एनपीपीए का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आवश्यक दवाएँ अनियंत्रित मूल्य वृद्धि का शिकार न हों और आम नागरिक उन्हें उचित कीमत पर खरीद सकें। यह व्यवस्था दवा मूल्य नियंत्रण आदेश (डीपीसीओ) के अंतर्गत संचालित होती है, जिसके माध्यम से सरकार आवश्यक दवाओं के अधिकतम मूल्य पर निगरानी रखती है। इससे बाजार में मनमानी कीमत वसूलने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने का प्रयास किया जाता है।

लेकिन प्रश्न यह है कि क्या केवल कीमत तय कर देने से मरीजों को वास्तविक राहत मिल जाती है? भारतीय दवा बाजार का अनुभव बताता है कि ऐसा हमेशा नहीं होता। कई बार नियंत्रित मूल्य वाली दवाएँ बाजार में आसानी से उपलब्ध नहीं होतीं जबकि महंगे ब्रांड हर मेडिकल स्टोर पर मिल जाते हैं। अनेक मरीजों को यह जानकारी भी नहीं होती कि जिस दवा के लिए उनसे अधिक कीमत ली जा रही है, उसका सरकारी स्तर पर निर्धारित मूल्य इससे कम है।

यहीं से इस निर्णय का दूसरा और अधिक गंभीर पक्ष सामने आता है। दवा का मूल्य निर्धारण तभी सार्थक है, जब उसके साथ पारदर्शिता, प्रभावी निगरानी, पर्याप्त उपलब्धता और उपभोक्ता जागरूकता भी सुनिश्चित हो अन्यथा सरकारी अधिसूचनाएँ कागज़ों तक सीमित रह जाती हैं और मरीज पहले की तरह बाजार की शर्तों पर निर्भर रहने को विवश होते हैं।

यही कारण है कि एनपीपीए के हालिया निर्णय को केवल दवा की कीमत तय करने के प्रशासनिक कदम के रूप में नहीं, बल्कि भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की व्यापक चुनौतियों के संदर्भ में देखने की आवश्यकता है। असली प्रश्न यह नहीं है कि दवा कितनी सस्ती हुई, बल्कि यह है कि क्या वह वास्तव में हर जरूरतमंद मरीज तक उसी निर्धारित कीमत पर पहुँच पाएगी।

दवा मूल्य नियंत्रण की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कागज़ पर निर्धारित कीमत और मरीज द्वारा चुकाई गई वास्तविक कीमत के बीच अक्सर बड़ा अंतर दिखाई देता है। एनपीपीए अधिकतम खुदरा मूल्य तय करता है, लेकिन यह सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है कि वही दवा बाजार में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो और निर्धारित मूल्य से अधिक पर न बेची जाए। यदि नियंत्रित मूल्य वाली दवा मेडिकल स्टोरों पर मिले ही नहीं, तो मूल्य निर्धारण का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।

भारतीय दवा बाजार की संरचना भी इस समस्या को जटिल बनाती है। एक ही औषधीय घटक (मॉलिक्यूल) अलग-अलग कंपनियों द्वारा अनेक ब्रांड नामों से बेचा जाता है। इन ब्रांडों की कीमतों में कई बार कई गुना तक अंतर होता है जबकि उनकी चिकित्सीय उपयोगिता समान होती है। ऐसे में मरीज अक्सर यह समझ ही नहीं पाता कि वह जिस दवा के लिए अधिक कीमत चुका रहा है, उसका अपेक्षाकृत सस्ता विकल्प भी उपलब्ध है।

यहीं जेनेरिक दवाओं का प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है। सरकार वर्षों से जेनेरिक दवाओं के उपयोग को बढ़ावा देने और जन औषधि केंद्रों के विस्तार की बात कर रही है। यदि गुणवत्तापूर्ण जेनेरिक दवाएँ आसानी से उपलब्ध हों और चिकित्सक भी उन्हें प्राथमिकता दें तो स्वास्थ्य पर होने वाला निजी खर्च काफी कम हो सकता है। लेकिन व्यवहार में अभी भी बड़ी संख्या में डॉक्टर ब्रांडेड दवाएँ लिखते हैं और अनेक मरीज भी महंगी दवा को बेहतर गुणवत्ता का पर्याय मान लेते हैं। यह धारणा बदलने की आवश्यकता है।

दवा कंपनियों, वितरकों और खुदरा विक्रेताओं की व्यावसायिक संरचना भी इस पूरे तंत्र को प्रभावित करती है। जिन दवाओं पर अधिक व्यापारिक लाभ मिलता है, उन्हें बाजार में अधिक बढ़ावा दिया जाता है। इसके विपरीत नियंत्रित मूल्य वाली दवाओं की उपलब्धता अपेक्षाकृत कम देखी जाती है। यही कारण है कि एनपीपीए द्वारा जारी मूल्य सूची तभी प्रभावी होगी, जब उसके अनुपालन की नियमित निगरानी हो और उल्लंघन करने वालों के विरुद्ध त्वरित कार्रवाई की जाए।

एनपीपीए ने दवा विक्रेताओं को निर्देश दिया है कि वे मूल्य सूची ऐसी जगह प्रदर्शित करें, जहाँ ग्राहक उसे आसानी से देख सकें। यह निर्देश पारदर्शिता की दिशा में एक अच्छा कदम है, लेकिन इसकी सफलता निरीक्षण व्यवस्था पर निर्भर करेगी। यदि मरीज को यह जानकारी ही न हो कि किसी दवा का अधिकतम खुदरा मूल्य क्या है, तो वह अपने अधिकार का उपयोग कैसे करेगा? इसलिए मूल्य नियंत्रण के साथ-साथ व्यापक जन-जागरूकता अभियान भी आवश्यक हैं।

भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था की एक और विडंबना यह है कि उपचार की लागत का बड़ा हिस्सा आज भी परिवार स्वयं वहन करते हैं। गंभीर बीमारी की स्थिति में कई परिवार कर्ज लेने, बचत तोड़ने या संपत्ति बेचने तक को मजबूर हो जाते हैं। ऐसे में आवश्यक दवाओं की कीमतों पर प्रभावी नियंत्रण केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा का भी प्रश्न है। स्वास्थ्य सेवा को यदि वास्तव में नागरिकों का अधिकार बनाना है, तो दवा को विलासिता नहीं, बल्कि मूलभूत आवश्यकता मानकर नीतियाँ बनानी होंगी।

स्पष्ट है कि एनपीपीए का हालिया निर्णय सकारात्मक है, किंतु इसकी सफलता बाजार की वास्तविक परिस्थितियों, प्रशासनिक निगरानी, चिकित्सकीय व्यवहार और उपभोक्ता जागरूकता पर समान रूप से निर्भर करेगी। केवल मूल्य तय कर देने से उद्देश्य पूरा नहीं होगा; यह सुनिश्चित करना होगा कि वही कीमत मरीज के बिल पर भी दिखाई दे।

स्वास्थ्य नीति का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि सरकार ने कितनी दवाओं की कीमत नियंत्रित की है। वास्तविक कसौटी यह है कि क्या मरीज को सही समय पर, सही गुणवत्ता की दवा, निर्धारित मूल्य पर उपलब्ध हो रही है। यदि दवा की कीमत तो नियंत्रित हो लेकिन वह अस्पताल या मेडिकल स्टोर पर उपलब्ध न हो, या मरीज को महंगा विकल्प खरीदने के लिए विवश किया जाए, तो ऐसी नीति का लाभ सीमित रह जाएगा।

पिछले कुछ वर्षों में केंद्र सरकार ने जन औषधि केंद्रों के विस्तार के माध्यम से सस्ती जेनेरिक दवाएं उपलब्ध कराने का प्रयास किया है। इस पहल का सकारात्मक प्रभाव भी दिखाई दिया है, लेकिन अभी इसकी पहुँच देश के हर गाँव और कस्बे तक नहीं बन सकी है। अनेक स्थानों पर आवश्यक दवाओं की नियमित आपूर्ति नहीं हो पाती, जबकि कई केंद्रों पर मरीजों को पूरी दवा सूची उपलब्ध नहीं मिलती। इसलिए केवल केंद्रों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है; उनकी कार्यक्षमता, दवा की उपलब्धता और गुणवत्ता की निरंतर निगरानी भी उतनी ही आवश्यक है।

दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न डॉक्टरों की भूमिका का है। यदि चिकित्सक केवल ब्रांडेड दवाएं लिखेंगे, तो मूल्य नियंत्रण का लाभ सीमित हो जाएगा। चिकित्सा जगत में ऐसी संस्कृति विकसित करनी होगी, जिसमें डॉक्टर औषधि के जेनेरिक नाम लिखने को प्राथमिकता दें और मरीजों को यह भरोसा दिलाएं कि गुणवत्ता का संबंध केवल ब्रांड से नहीं, बल्कि निर्धारित मानकों से है। इसी प्रकार फार्मासिस्टों की भी जिम्मेदारी है कि वे मरीज को उपलब्ध सस्ते और मानक विकल्पों की जानकारी दें।

दवा उद्योग का पक्ष भी पूरी तरह नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। शोध, उत्पादन, गुणवत्ता नियंत्रण और वितरण की अपनी लागत होती है। यदि मूल्य निर्धारण उद्योग के लिए पूरी तरह अव्यावहारिक हो जाए, तो नई दवाओं के विकास और उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है। इसलिए सरकार को मरीजों के हित और उद्योग की व्यवहारिक आवश्यकताओं के बीच संतुलन बनाकर चलना होगा। यही संतुलन एक स्वस्थ दवा नीति की पहचान है।

आज जब भारत वैश्विक स्तर पर जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा उत्पादक देशों में गिना जाता है, तब यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि देश के नागरिकों को भी गुणवत्तापूर्ण दवाएं सुलभ और किफायती कीमत पर मिलें। विडंबना यह है कि कई बार भारत में बनी दवाएं विदेशों में सस्ती उपलब्ध होती हैं, जबकि देश के भीतर मरीज अधिक कीमत चुकाते हैं। यह स्थिति मूल्य नियंत्रण, वितरण व्यवस्था और बाजार की पारदर्शिता पर नए सिरे से विचार करने की मांग करती है।

एनपीपीए द्वारा 39 दवाओं की खुदरा कीमत निर्धारित करना और जीवनरक्षक दवाओं के मूल्य की समीक्षा करना निश्चित रूप से स्वागतयोग्य कदम है। लेकिन यह एक सतत प्रक्रिया का हिस्सा होना चाहिए। मूल्य निर्धारण के साथ-साथ बाजार की निगरानी, उल्लंघन पर कठोर कार्रवाई, उपभोक्ता जागरूकता, जेनेरिक दवाओं का व्यापक प्रचार, सरकारी अस्पतालों में पर्याप्त दवा उपलब्धता और जन औषधि केंद्रों को मजबूत बनाना—ये सभी उपाय समान रूप से आवश्यक हैं।

आखिरकार, किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सफलता इस बात से भी तय होती है कि वह अपने नागरिकों को बीमारी के समय कितना सहारा देती है। दवा केवल एक व्यापारिक उत्पाद नहीं, बल्कि जीवन बचाने का माध्यम है। इसलिए दवा नीति का मूल उद्देश्य लाभ नहीं, बल्कि जनकल्याण होना चाहिए। यदि एनपीपीए के निर्णय का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुँचता है, तो यह केवल मूल्य नियंत्रण की सफलता नहीं होगी, बल्कि स्वास्थ्य के अधिकार को अधिक सार्थक बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम भी होगा। तभी यह कहा जा सकेगा कि सरकार ने केवल दवाओं के दाम तय नहीं किए, बल्कि आम नागरिक के जीवन और स्वास्थ्य की सुरक्षा को भी प्राथमिकता दी।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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