पुनीत उपाध्याय

आम आदमी के लिए अच्छी खबर है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि फुटपाथ पर चलना आम आदमी का मौलिक अधिकार है। न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति अतुल एस चांदुरकर की पीठ ने इस अधिकार को कर्नाटक में एक टैंकर लॉरी की टक्कर से एक पांच साल के बच्चे की हुई मौत पर अधिक मुआवजे की मांग के मामले में दोहराया। पीठ ने अफसोस के साथ टिप्पणी करते हुए कहा कि जैसे.जैसे गाड़ियों की तादाद और रफ्तार बढ़ी है वैसे.वैसे पैदल चलना बेहद असुविधाजनक और जोखिम भरा हो गया है। वाहन चालक अक्सर पैदल यात्रियों को एक मुसीबत या रुकावट की तरह देखते हैं जिसे या तो बर्दाश्त करना है या रास्ते से हटा देना है।
पैदल यात्रियों के अधिकारों को तय करने वाले किसी केंद्रीय कानून के न होने की वजह से उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी नगर पालिका के कानूनों, टाउन.प्लानिंग के नियमों और सड़कों के डिजाइन से जुड़े दिशा.निर्देशों के बीच बंटी हुई है। यही वजह है कि आज के दौर में पैदल यात्रियों को तब तक सुरक्षित मान लिया जाता है जब तक कि उन्हें कोई तत्काल शारीरिक चोट या नुकसान न पहुंचे। हमारे ज्यादातर शहरों में लगातार बने हुए और बाधा.मुक्त फुटपाथों की भारी कमी हैय और जहां कहीं फुटपाथ मौजूद भी हैं वहां अक्सर गाड़ियों की पार्किंग, रेहड़ी.पटरी वालों, बिजली.पानी से जुड़ी सुविधाओं और निर्माण संबंधी मलबे का कब्जा रहता है या फिर वे सड़कों को चौड़ी करने जैसी होड़ की भेंट चढ़ जाते हैं। फैसले की एक बड़ी विशेषता यह है कि यदि आम आदमी को यह सुविधा नहीं मिल पा रही तो वह कोर्ट का दरवाजा भी खटखटा सकता है।
भारत के लिए बड़ी चुनौती
दुनिया की विशालतम आबादी वाले देश भारत में व्यवस्थित रोड ट्रांसपोर्ट बड़ी चुनौती है। राजधानी दिल्ली समेत तमाम बड़े शहरों में लोगों को सड़क पर सुरक्षित चलने के लिए फुटपाथों का अभाव है। छोटे शहरों की तो बात सोचना भी बेमानी है। शहरों में पैदल चलना किसी जानलेवा चुनौती से कम नहीं, कहीं फुटपाथ का नामोनिशान नहीं कहीं हैं भी तो उन पर रसूखदारों का कब्जा है तो कहीं पैदल चलने की जगह गाड़ियां सीना ताने दौड़ रही हैं। यह एक ऐसी कड़वी हकीकत है जिससे आम आदमी हर दिन रूबरू होता है। इसलिए अदालत ने स्पष्ट किया है कि सुरक्षित और बाधा रहित फुटपाथ पर चलना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है जिसे मोटर वाहनों की सुविधा से पहले संरक्षण मिलना चाहिए।
कृपा नहीं यह है अधिकार
फैसले में दो.टूक कहा गया है कि सुरक्षित और साफ फुटपाथ पर चलना कोई सरकारी कृपा नहींए बल्कि हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। इतना ही नहीं, पैदल यात्रियों का यह अधिकार मोटर वाहनों की आवाजाही से पहले माना जाएगा। अब इस अधिकार की रक्षा करना सरकारों की संवैधानिक जिम्मेदारी होगी। अदालत का मानना है कि मौजूदा समय में देश में ऐसा कोई विशेष कानून नहीं है जो फुटपाथ पर चलने के अधिकार को स्पष्ट रूप से मान्यता देता हो। इसलिए अब समय आ गया है कि संसद एक व्यापक कानून बनाए जिसमें इस अधिकार को कानूनी दर्जा दिया जाए संबंधित सरकारी एजेंसियों की जिम्मेदारियां तय हों, उल्लंघन पर जल्द से जल्द न्याय मिले और इस अधिकार के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए एक स्वतंत्र नियामक संस्था भी बनाई जाए।








