संस्थागत रजिस्ट्रेशन और फंडिंग पर सुलगते सवाल: क्या सभी प्रभावशाली संगठनों के लिए समान पारदर्शिता कानून जरूरी है?

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आरएसएस की फंडिंग और पंजीकरण पर उठे प्रश्नों ने छेड़ी नई बहस; क्या ट्रस्ट, एनजीओ, धार्मिक संस्थान और राजनीतिक संगठनों पर भी लागू होने चाहिए एक समान जवाबदेही मानदंड?

कमलेश पांडेय

किसी भी सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक अथवा गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) के संदर्भ में जब उसके पंजीकरण, वित्तीय स्रोतों और धन के उपयोग को लेकर सवाल उठते हैं, तो मामला केवल कानूनी दायरे तक सीमित नहीं रहता। यह पारदर्शिता, जवाबदेही और लोकतांत्रिक विश्वास का विषय बन जाता है। स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि संबंधित संगठन की कानूनी स्थिति क्या है? वह सोसायटी, ट्रस्ट, कंपनी या किसी अन्य स्वरूप में पंजीकृत है अथवा नहीं? यदि नहीं, तो उसकी गतिविधियाँ किस कानूनी ढाँचे के अंतर्गत संचालित हो रही हैं?

इसी प्रकार फंडिंग को लेकर भी अनेक प्रश्न सामने आते हैं। संगठन को धन कहाँ से प्राप्त होता है? क्या यह आम जनता के दान से संचालित होता है या किसी संस्थागत सहयोग से? क्या उसे विदेशी स्रोतों से आर्थिक सहायता मिलती है? यदि हाँ, तो क्या वह संबंधित कानूनों और नियमों के अनुरूप घोषित की गई है? प्राप्त धनराशि का उपयोग किन उद्देश्यों पर किया जाता है और क्या उसका स्वतंत्र ऑडिट कराया जाता है?

पारदर्शिता और जवाबदेही का प्रश्न

किसी भी प्रभावशाली संगठन के संदर्भ में यह अपेक्षा स्वाभाविक मानी जाती है कि वह अपनी आय-व्यय का विवरण सार्वजनिक करे तथा वित्तीय अभिलेख स्वतंत्र जांच के लिए उपलब्ध रखे। समर्थकों का तर्क होता है कि ऐसे प्रश्न कई बार वैचारिक या राजनीतिक विरोध के कारण उठाए जाते हैं। दूसरी ओर आलोचकों का मानना है कि जो संगठन सार्वजनिक जीवन, समाज और राजनीति पर प्रभाव रखते हैं, उन्हें अधिक पारदर्शिता और जवाबदेही प्रदर्शित करनी चाहिए।

लोकतांत्रिक दृष्टिकोण भी यही कहता है कि किसी संस्था का जितना व्यापक प्रभाव होगा, उसके प्रति सार्वजनिक जवाबदेही की अपेक्षा उतनी ही अधिक होगी।

भारत में संस्थाओं का विशाल नेटवर्क

भारत में लाखों संस्थाएँ विभिन्न स्वरूपों में पंजीकृत हैं—धर्मार्थ ट्रस्ट, सोसायटियाँ, सेक्शन-8 कंपनियाँ, धार्मिक संस्थान, ट्रेड यूनियन, राजनीतिक दल और अन्य गैर-सरकारी संगठन। इनमें से अधिकांश को आयकर, ऑडिट, दान और विदेशी फंडिंग से संबंधित नियमों का पालन करना पड़ता है।

यही कारण है कि जब किसी प्रभावशाली संस्था के रजिस्ट्रेशन या फंडिंग पर सवाल उठते हैं, तो व्यापक बहस शुरू हो जाती है कि क्या सभी संगठनों के लिए समान पारदर्शिता मानक होने चाहिए।

हालाँकि सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या भारत में सभी प्रभावशाली सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक और वैचारिक संगठनों के लिए आय-व्यय, दानदाताओं, ऑडिट रिपोर्ट और प्रशासनिक संरचना की सार्वजनिक पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए? यही प्रश्न आज सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में दिखाई देता है।

आँकड़ों की अनुपलब्धता भी चिंता का विषय

जानकारों के अनुसार भारत में सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और वैचारिक संगठनों की संख्या अत्यंत विशाल है, लेकिन इनका कोई समग्र और अद्यतन राष्ट्रीय आँकड़ा उपलब्ध नहीं है। यह स्थिति स्वयं प्रशासनिक और नीतिगत प्रश्न खड़े करती है।

नीति आयोग के एनजीओ-दर्पण पोर्टल पर लगभग 1.5 से 1.9 लाख सक्रिय संस्थाएँ सूचीबद्ध हैं, जबकि विभिन्न सरकारी और गैर-सरकारी आकलनों में पंजीकृत संस्थाओं की संख्या तीन लाख से अधिक बताई जाती है। केवल धर्मार्थ ट्रस्टों की संख्या ही लाखों में आँकी जाती है। उदाहरणस्वरूप, गुजरात में ही लगभग तीन लाख ट्रस्ट होने का अनुमान व्यक्त किया जाता रहा है।

यदि यह सिद्धांत स्वीकार किया जाए कि व्यापक सामाजिक या राजनीतिक प्रभाव रखने वाले संगठनों को अपनी वित्तीय और प्रशासनिक जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए, तो यह मांग केवल एक संगठन तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि लाखों संस्थाओं तक विस्तारित हो जाएगी।

बहस का दायरा केवल आरएसएस तक नहीं

ऐसे में प्रश्न केवल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) तक सीमित नहीं रह जाता। यही कसौटी अन्य धार्मिक, सामाजिक और वैचारिक संगठनों पर भी लागू हो सकती है। चाहे वे विभिन्न धार्मिक ट्रस्ट हों, वक्फ संस्थाएँ हों, चर्च प्रबंधन समितियाँ हों, गुरुद्वारा प्रबंधक संस्थाएँ हों या लाखों एनजीओ और धर्मार्थ ट्रस्ट—सभी के लिए समान मानदंड की मांग उठ सकती है।

हाल के वर्षों में विभिन्न धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं से जुड़े वित्तीय विवाद यह संकेत देते हैं कि पारदर्शिता की आवश्यकता किसी एक विचारधारा या संगठन तक सीमित नहीं है।

संपत्ति और संस्थागत विस्तार पर भी बहस आवश्यक

यह भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि किसी व्यक्ति, परिवार या समूह के नियंत्रण में अनेक कंपनियाँ, ट्रस्ट, सोसायटियाँ और संस्थाएँ होना किस सीमा तक उचित है। जिस प्रकार ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि-सीमा संबंधी कानूनों पर चर्चा होती रही है, उसी प्रकार शहरी संपत्ति, संस्थागत स्वामित्व और संगठनात्मक विस्तार के संदर्भ में भी नीतिगत बहस की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

राजनीतिक दलों और उनसे जुड़े संगठनों को भी इस विमर्श से अलग नहीं रखा जा सकता। यदि पारदर्शिता का सिद्धांत स्वीकार किया जाए तो उसका दायरा सभी पर समान रूप से लागू होना चाहिए।

आरएसएस और कर्नाटक सरकार के बीच विवाद

इसी पृष्ठभूमि में कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खरगे द्वारा जून 2026 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत को पत्र लिखकर संगठन के पंजीकरण, फंडिंग, आय-व्यय, संपत्तियों और कर अनुपालन से संबंधित जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की गई है।

खरगे का तर्क है कि देशभर में हजारों शाखाओं और करोड़ों स्वयंसेवकों वाले इतने बड़े संगठन की कानूनी स्थिति, वित्तीय स्रोतों और कर संबंधी अनुपालन के बारे में सार्वजनिक जानकारी उपलब्ध होनी चाहिए। उन्होंने यह भी पूछा है कि संगठन को मिलने वाले दान का स्वरूप क्या है, आय-व्यय का लेखा-जोखा किस प्रकार रखा जाता है और क्या इसकी सार्वजनिक ऑडिट व्यवस्था मौजूद है।

राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप

कांग्रेस का कहना है कि सार्वजनिक जीवन और राजनीति पर व्यापक प्रभाव रखने वाले संगठन से पारदर्शिता की अपेक्षा करना स्वाभाविक है। दूसरी ओर भाजपा और आरएसएस इसे राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित कदम बता रहे हैं।

मोहन भागवत का कहना है कि आरएसएस कोई गुप्त संगठन नहीं है। उसकी शाखाएँ और गतिविधियाँ खुले मैदानों में संचालित होती हैं तथा पंजीकरण को लेकर उठाए जा रहे प्रश्न राजनीति से प्रेरित हैं।

मूल प्रश्न अभी भी कायम है

वास्तविकता यह है कि यह विवाद केवल आरएसएस तक सीमित नहीं है। इसने एक व्यापक राष्ट्रीय बहस को जन्म दिया है कि क्या भारत में प्रभावशाली सामाजिक, धार्मिक, वैचारिक और गैर-सरकारी संगठनों के लिए एक समान पारदर्शिता और जवाबदेही कानून होना चाहिए।

यदि उत्तर “हाँ” है, तो इसका दायरा केवल एक संगठन नहीं बल्कि लाखों संस्थाओं तक जाएगा। तब प्रश्न केवल आरएसएस की फंडिंग का नहीं रहेगा, बल्कि सभी धार्मिक ट्रस्टों, एनजीओ, राजनीतिक संगठनों, वक्फ संस्थाओं, चर्चों, गुरुद्वारों, मंदिर ट्रस्टों और अन्य प्रभावशाली संस्थाओं की वित्तीय पारदर्शिता का होगा।

यही वह मूल प्रश्न है जो आज भारतीय लोकतंत्र के सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में खड़ा दिखाई देता है—क्या पारदर्शिता चयनात्मक होनी चाहिए या सभी के लिए समान रूप से लागू होनी चाहिए?

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Author: Bharat Sarathi

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