“योग किसी दल या विचारधारा का नहीं, सम्पूर्ण मानवता के स्वास्थ्य और कल्याण का माध्यम है : विद्रोही”
रेवाडी, 21 जून। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर स्वयंसेवी संस्था ग्रामीण भारत के अध्यक्ष वेदप्रकाश विद्रोही ने देशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं देते हुए आह्वान किया कि सभी नागरिक अपने दैनिक जीवन में योग को नियमित रूप से अपनाकर स्वयं तथा समाज को स्वस्थ और सशक्त बनाने में योगदान दें।
विद्रोही ने कहा कि भारत की प्राचीन संस्कृति में योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन, मानसिक संतुलन और आत्मिक उन्नति का एक समग्र माध्यम रहा है। सदियों से भारतीय समाज योग की परंपरा को अपनाकर अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहा है और इसी विरासत को दुनिया भर में पहुंचाकर मानवता को स्वस्थ जीवन का संदेश देता आया है। आज योग की वैश्विक स्वीकार्यता भारत की उसी महान परंपरा का परिणाम है।
उन्होंने कहा कि आर्य समाज और उसके गुरुकुलों ने योग के प्रचार-प्रसार में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। पिछले डेढ़ सौ वर्षों से अधिक समय से आर्य समाज के गुरुकुलों में विद्यार्थियों को नियमित रूप से सुबह और शाम योगासन तथा विभिन्न प्रकार के शारीरिक व्यायाम सिखाए जाते रहे हैं। इन गुरुकुलों से प्रशिक्षित हजारों युवाओं ने देश के विभिन्न हिस्सों में योग शिविर आयोजित कर आमजन को योग के प्रति प्रेरित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया है।
विद्रोही ने कहा कि आजादी के बाद देश के अधिकांश विद्यालयों में शारीरिक शिक्षा को विशेष महत्व दिया जाता था। विद्यालयों में पीटी (फिजिकल ट्रेनिंग) का अनिवार्य पीरियड होता था, जिसमें योगासन, व्यायाम और अन्य शारीरिक गतिविधियां बच्चों को सिखाई जाती थीं। इससे विद्यार्थियों के शारीरिक और मानसिक विकास में संतुलन बना रहता था। लेकिन पिछले 25-30 वर्षों में शिक्षा व्यवस्था में आए बदलावों और विद्यार्थियों पर बढ़ते पाठ्यक्रमीय दबाव के कारण विद्यालयों में शारीरिक शिक्षा का महत्व लगातार कम हुआ है। परिणामस्वरूप पीटी की कक्षाएं धीरे-धीरे समाप्त होती चली गईं और शारीरिक शिक्षा का दायरा केवल खेल प्रतियोगिताओं में भाग लेने वाले विद्यार्थियों तक सीमित होकर रह गया।
उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि वर्तमान समय में योग के प्रति लोगों का रुझान बढ़ा है, जो एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन इसके साथ-साथ योग को व्यवसाय और राजनीतिक प्रचार का माध्यम बनाने की प्रवृत्ति भी तेजी से बढ़ी है। योग का मूल उद्देश्य मानव को स्वस्थ, अनुशासित और संतुलित बनाना है। जब योग को केवल धन कमाने का साधन बना दिया जाता है तो उसकी मूल भावना और प्रभावशीलता प्रभावित होती है। योग का वास्तविक लाभ तभी मिलता है जब उसे सेवा, अनुशासन और आत्मविकास की भावना के साथ अपनाया जाए।
संयुक्त राष्ट्र द्वारा 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित किए जाने का स्वागत करते हुए विद्रोही ने कहा कि यह भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत की वैश्विक मान्यता है। हालांकि उन्होंने आरोप लगाया कि योग दिवस को सरकारी तंत्र और राजनीतिक प्रचार का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए। उनका कहना था कि योग किसी राजनीतिक दल, धर्म, जाति या विचारधारा की संपत्ति नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण मानव समाज की धरोहर है। इसलिए योग दिवस के आयोजनों को राजनीतिक रंग देने या सत्ता के दुरुपयोग से किसी विशेष विचारधारा के कार्यक्रम में परिवर्तित करना योग की मूल भावना के विपरीत है।
विद्रोही ने कहा कि योग का संदेश समरसता, संतुलन और आत्मअनुशासन का है। यदि योग को राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, धार्मिक विभाजन या आर्थिक लाभ के चश्मे से देखा जाएगा तो उसके व्यापक सामाजिक और मानवीय उद्देश्यों को नुकसान पहुंचेगा। उन्होंने कहा कि योग व्यक्ति को स्वयं से जोड़ता है और समाज में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। इसलिए इसे किसी भी प्रकार की संकीर्णता से मुक्त रखा जाना चाहिए।
अंत में वेदप्रकाश विद्रोही ने नागरिकों से अपील की कि वे राजनीति, धर्म और धनलिप्सा से ऊपर उठकर अपने जीवन में नियमित योगाभ्यास को स्थान दें। उन्होंने कहा कि स्वस्थ व्यक्ति ही स्वस्थ परिवार, स्वस्थ समाज और स्वस्थ राष्ट्र का निर्माण कर सकता है। योग को दैनिक जीवन का हिस्सा बनाकर न केवल शारीरिक रोगों से बचा जा सकता है, बल्कि मानसिक तनाव, अवसाद और जीवनशैली से जुड़ी अनेक समस्याओं का भी प्रभावी समाधान प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यदि अधिक से अधिक लोग योग को अपनाएंगे तो भारत ही नहीं, पूरा विश्व अधिक स्वस्थ, संतुलित और खुशहाल बन सकेगा।









