कमलेश पांडेय

भारत की राजनीति में हालिया (जून 2026) के राज्यसभा और विधान परिषद चुनावों में क्रॉस वोटिंग के सबसे चर्चित मामले मुख्यतः झारखंड और कर्नाटक में सामने आए हैं, जिनके अपने-अपने सियासी निहितार्थ हैं। ऐसा इसलिए कि इन दोनों घटनाओं ने क्रमशः कांग्रेस और भाजपा की हेकड़ी भरी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। साथ ही खास तरह के राजनीतिक प्रबंधन को लोकतंत्र के लिए खतरा भी करार दे दिया क्योंकि इससे मतदाताओं के विश्वास को ठेस पहुंची और आया राम, गया राम वाली पूंजीवादी राजनीतिक संस्कृति की बल्ले बल्ले हो गई।
लिहाजा, ऐसी राजनीतिक अनैतिकता के खिलाफ स्पष्ट प्रावधान होने चाहिए, ताकि उनके समर्थक मतदाताओं के साथ सियासी छलावा न हो। सबसे पहले समझते हैं कि आखिर क्रॉस वोटिंग का अर्थ क्या है? तो यह जान लीजिए कि इसका अर्थ है कि कोई विधायक (MLA) अपनी पार्टी या गठबंधन के आधिकारिक उम्मीदवार के बजाय किसी अन्य दल या उम्मीदवार के पक्ष में मतदान कर दे। अमूमन, राज्यसभा और विधान परिषद (MLC) चुनावों में यह घटना अक्सर राजनीतिक भूचाल पैदा कर देती है। क्योंकि ऐसा अक्सर होता आया है।
आइए, सबसे पहले समझते हैं कि झारखंड राज्यसभा चुनाव में INDIA गठबंधन के कांग्रेस प्रत्याशी प्रणव झा को जोर का झटका धीरे से क्यों लगा? उल्लेखनीय है कि
झारखंड में दो राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव हुआ। यहां संख्याबल के हिसाब से सत्तारूढ़ INDIA गठबंधन (JMM, कांग्रेस, RJD आदि) को लाभ में माना जा रहा था, लेकिन NDA समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार Parimal Nathwani ने जीत दर्ज कर ली। उन्हें 28 वोट मिले, जबकि NDA के पास अपने दम पर केवल 24 विधायक थे। इससे क्रॉस वोटिंग की आशंकाएं मजबूत हुईं।
लिहाजा, प्रभावित दलों की प्रतिक्रिया आई और कांग्रेस ने अपने विधायकों द्वारा क्रॉस वोटिंग से इनकार किया और सहयोगी दलों की ओर संकेत किया। जबकि भाजपा/NDA ने इसे अपनी स्वीकार्यता और “दलगत सीमाओं से परे समर्थन” का प्रमाण बताया। इसलिए चुनाव परिणाम के बाद झारखंड की गठबंधन राजनीति में तनाव बढ़ा और सहयोगी दलों के बीच अविश्वास की चर्चाएं शुरू हो गईं।
फिर बात करते हैं कर्नाटक विधान परिषद (MLC) चुनाव की, जहां सबको चकमा देने वाली भाजपा खुद चकरा गई और उसमें व्याप्त नाराजगी समझी जा सकती है। मसलन,
18 जून 2026 को हुए कर्नाटक विधान परिषद चुनाव में कांग्रेस को अपेक्षा से अधिक सफलता मिली। इसके बाद भाजपा के भीतर क्रॉस वोटिंग के आरोप उभरे। पार्टी नेतृत्व को लगा कि कुछ भाजपा विधायकों ने आधिकारिक लाइन से हटकर मतदान किया।
ऐसे में प्रभावित दल की प्रतिक्रिया आई। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने राज्य इकाई के शीर्ष नेताओं को दिल्ली तलब किया। वहीं, पार्टी ने आंतरिक जांच शुरू की और अनुशासनहीनता पर नाराजगी जताई। इसे संगठनात्मक कमजोरी और गुटबाजी का संकेत माना गया। यह स्थिति उस भाजपा की है, जिसकी देश की राजनीति में तूती बोलती है।
अब इसका व्यापक राजनीतिक संकेत समझिए
इन दोनों घटनाओं ने कुछ बड़े संदेश दिए हैं: पहला, विधायक दलों में असंतोष बढ़ रहा है— केवल व्हिप या नेतृत्व का आदेश पर्याप्त नहीं रह गया है। दूसरा,
गठबंधन राजनीति की कमजोरियां उजागर हुई हैं—विशेषकर उन राज्यों में जहां कई दल मिलकर सरकार चला रहे हैं। तीसरा, राज्यसभा और परिषद चुनाव अब शक्ति-परीक्षण बन गए हैं— ये केवल सांसद या MLC चुनने के चुनाव नहीं, बल्कि दलों की आंतरिक एकजुटता का भी परीक्षण हैं। चौथा, छोटे दलों और निर्दलीयों की भूमिका बढ़ी है— कुछ अतिरिक्त वोट पूरे राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं।
भारत में राज्यसभा और विधान परिषद चुनावों में क्रॉस वोटिंग के राजनीतिक मायने
चूंकि झारखंड में क्रॉस वोटिंग से INDIA गठबंधन की एकजुटता व कांग्रेस प्रबंधन पर प्रश्न उठे, जबकि कर्नाटक में भाजपा को अपने संगठन के भीतर झांकने पर मजबूर होना पड़ा। इसलिए 2026 के ये चुनाव केवल सीटों का गणित नहीं बल्कि दलों की आंतरिक सेहत का भी राजनीतिक एक्स-रे साबित हुए। इसलिए अब इसके राजनीतिक मायने को विस्तार से समझते हैं:-
पहला, पार्टी नेतृत्व पर अविश्वास का संकेत:
जब विधायक अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार के खिलाफ वोट देते हैं, तो यह अक्सर नेतृत्व से असंतोष, टिकट वितरण पर नाराज़गी या गुटबाजी का संकेत माना जाता है।
दूसरा, गठबंधन की मजबूती या कमजोरी की परीक्षा:
राज्यसभा चुनावों में कई बार संख्याबल किसी गठबंधन के पक्ष में होता है, लेकिन क्रॉस वोटिंग परिणाम बदल देती है। इससे पता चलता है कि गठबंधन कागज़ पर मजबूत है या वास्तव में उसके विधायक एकजुट हैं। हाल के झारखंड राज्यसभा चुनाव में इसी प्रकार के आरोप और चर्चाएं सामने आईं।
तीसरा, “हॉर्स ट्रेडिंग” (वोटों की खरीद-फरोख्त) के आरोप:
क्रॉस वोटिंग होते ही विपक्ष और सत्तापक्ष अक्सर एक-दूसरे पर विधायकों की खरीद-फरोख्त के आरोप लगाते हैं। इसी कारण 2003 में राज्यसभा चुनावों में “ओपन बैलेट” व्यवस्था लागू की गई थी ताकि पारदर्शिता बढ़े।
चौथा, क्षेत्रीय दलों की वास्तविक शक्ति का परीक्षण:
छोटे दलों और निर्दलीय विधायकों की भूमिका ऐसे चुनावों में बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। कई बार उनकी क्रॉस वोटिंग किसी बड़े दल की जीत या हार तय कर देती है।
पांचवां, दल-बदल कानून की सीमाएं उजागर होती हैं:
राज्यसभा और विधान परिषद के चुनाव सदन की कार्यवाही नहीं बल्कि निर्वाचन प्रक्रिया माने जाते हैं। इसलिए सामान्यतः दल-बदल विरोधी कानून (दसवीं अनुसूची) के तहत सदस्यता स्वतः समाप्त नहीं होती। पार्टी अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सकती है, लेकिन विधायक की सदस्यता बची रह सकती है।
छठा, सरकार की स्थिरता पर अप्रत्यक्ष असर:
हालांकि क्रॉस वोटिंग से सरकार तुरंत नहीं गिरती, लेकिन यह संकेत देती है कि पार्टी के भीतर असंतोष है। बाद में यही असंतोष सरकार या गठबंधन के लिए बड़ी राजनीतिक चुनौती बन सकता है।
लोकतांत्रिक दृष्टि से दो अलग-अलग नजरिए
जहां समर्थकों का तर्क है कि विधायक अपनी अंतरात्मा और क्षेत्रीय हित के अनुसार मतदान कर सकते हैं। इससे पार्टी नेतृत्व की निरंकुशता पर अंकुश लगता है। जबकि
आलोचकों का तर्क है कि इससे राजनीतिक भ्रष्टाचार और सौदेबाजी को बढ़ावा मिल सकता है। मतदाता जिस दल के नाम पर विधायक चुनते हैं, उसके जनादेश का उल्लंघन होता है।
अंततोगत्वा राजनीतिक निष्कर्ष यह निकलता है कि राज्यसभा और विधान परिषद चुनावों में क्रॉस वोटिंग केवल वोट बदलने की घटना नहीं होती; यह किसी दल की आंतरिक एकजुटता, नेतृत्व की पकड़, गठबंधन की विश्वसनीयता और राजनीतिक नैतिकता की परीक्षा बन जाती है। कई बार इसका असर आने वाले विधानसभा या लोकसभा चुनावों तक दिखाई देता है।









