गोविंदनंद आश्रम में श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ का विशाल भंडारे के साथ समापन

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पिहोवा, 16 जून (प्रमोद कौशिक/संजीव कुमारी)। शिवपुरी रोड स्थित श्री गोविंदनंद आश्रम ठाकुरद्वारा में पुरुषोत्तम मास के उपलक्ष्य में 17 मई से 16 जून तक आयोजित श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ का मंगलवार को विशाल भंडारे एवं प्रसाद वितरण के साथ विधिवत समापन हो गया। कथा का आयोजन महामंडलेश्वर 1008 स्वामी विद्यागिरि महाराज तथा पीठ के संस्थापक श्रीमहंत बंसी पुरी महाराज के सानिध्य में संपन्न हुआ। कथा का वाचन आश्रम की महंत सर्वेश्वरी गिरि ने व्यासपीठ से किया।

समापन समारोह में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए महामंडलेश्वर 1008 स्वामी विद्यागिरि महाराज ने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मानव जीवन को सदाचार, भक्ति और सेवा के मार्ग पर अग्रसर करने वाला दिव्य ज्ञान यज्ञ है। उन्होंने कहा कि कथा श्रवण से मन की शुद्धि होती है तथा व्यक्ति के भीतर सकारात्मक संस्कारों का विकास होता है। पुरुषोत्तम मास में भगवान की भक्ति, सत्संग तथा दान-पुण्य का विशेष महत्व है। उन्होंने श्रद्धालुओं से कथा से प्राप्त शिक्षाओं को अपने दैनिक जीवन में आत्मसात करने का आह्वान किया।

इस अवसर पर श्री दक्षिणा काली पीठ के संस्थापक एवं अखाड़ा के श्रीमहंत बंसी पुरी महाराज ने कहा कि धार्मिक आयोजन समाज में आध्यात्मिक चेतना, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक मूल्यों को सुदृढ़ करने का कार्य करते हैं। उन्होंने कहा कि एक माह तक चली कथा के दौरान श्रद्धालुओं में धर्म के प्रति गहरी आस्था और उत्साह देखने को मिला। कथा के माध्यम से सनातन संस्कृति और भारतीय परंपराओं के संरक्षण एवं संवर्धन का संदेश जन-जन तक पहुंचा है। उन्होंने आयोजन को सफल बनाने वाले सभी श्रद्धालुओं, सहयोगियों और यजमान परिवारों का आभार व्यक्त किया।

कथा समापन के उपरांत विशाल भंडारे का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया।

इस अवसर पर षड्दर्शन साधु समाज के संगठन सचिव वैद्य पंडित प्रमोद कौशिक, महंत चमन गिरि, स्वामी लखन पुरी, स्वामी आशुतोष पुरी, स्वामी राम पुरी, कथा के मुख्य यजमान परिवार, रमेश कुमार, सोहन लाल मुंगड़िया, नरेश नोनू शर्मा, राघव शर्मा, ललित शर्मा, विजय शर्मा, राजीव शर्मा, माधव, पुरुषोत्तम शर्मा, निशा, शगुन, अनीता, वंदना सहित समस्त महिला मंडली एवं बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

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Author: Bharat Sarathi

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