सीबीएसई : गले की घंटी बना ऑन स्क्रीन मार्किंग सिस्टम

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ऑन स्क्रीन मार्किंग की तकनीकी खामियों ने बढ़ाई विद्यार्थियों और अभिभावकों की चिंता, सीबीएसई की विश्वसनीयता पर उठे सवाल।

ज्ञान चंद पाटनी

सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (सीबीएसई) के नए ऑन स्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) सिस्टम ने विद्यार्थियों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। इससे बोर्ड की साख भी प्रभावित हुई है। 12वीं कक्षा के हजारों विद्यार्थियों ने अपनी आंसर शीट की स्कैन कॉपी मांगी है क्योंकि वे परिणाम से संतुष्ट नहीं हैं। ओएसएम सिस्टम की वजह से परिणाम में गड़बड़ी के आरोप गंभीर बात है। बारहवीं के बाद विद्यार्थी प्रोफेशनल और उच्च शिक्षा की राह खोजने के लिए निकलते हैं। ऐसे समय में विद्यार्थी अपने परिणाम को लेकर आशंकित हैं, तो सवाल तो उठेंगे ही। सीबीएसई के नए ऑन स्क्रीन मार्किंग(ओएसएम) सिस्टम पर स्टूडेंट्स, अभिभावक और विपक्षी दल सवाल उठा रहे हैं। इस सिस्टम को उत्तरपुस्तिकाओं की जांच को सटीक और तेज बनाने के लिए लाया गया था, लेकिन सामने आ रही गड़बड़ियां दूसरी ही कहानी कह रही हैं। विद्यार्थी अपने आपको ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

पहले परीक्षा के बाद उत्तरपुस्तिकाओं के बंडल बनाकर अध्यापकों को दिए जाते थे। वे उन्हें जांचते थे, नंबर जोड़ते थे और साइन करते थे। इस बार सीबीएसई ने नया तरीका अपनाया। पहले सभी कॉपियां स्कैन की गईं। यानी उनकी डिजिटल फोटो खींची गईं। फिर यह फोटो ऑनलाइन सिस्टम पर अपलोड की गई। शिक्षकों ने कंप्यूटर या लैपटॉप की स्क्रीन पर कॉपी की फोटो देखकर नंबर दिए। सीबीएसई ने ओएसएम सिस्टम को लेकर कहा कि इससे जांच की प्रक्रिया ज्यादा तेज और सटीक हो सकेगी। साथ ही मैनुअल गलतियां कम से कम रहेंगी लेकिन अब इस दावे पर सवाल उठ रहे हैं।

12वीं कक्षा के बहुत से विद्यार्थी धुंधली उत्तरपुस्तिका और उत्तरपुस्तिका बदलने तक की शिकायत कर रहे हैं। मुद्दा इतना तूल पकड़ चुका है कि सीबीएसई के 12वीं बोर्ड परीक्षा में बैठे हर चार में से करीब एक छात्र ने अपनी जांची हुई आंसर शीट की स्कैन कॉपी मांगी है। एक छात्र वेदांत श्रीवास्तव ने सोशल मीडिया पर दावा किया था कि बोर्ड ने उन्हें एक विषय की गलत आंसर शीट भेजी है। मामला तब और बढ़ गया जब उन्हें पाकिस्तानी बताकर ट्रोल किया गया। सोशल मीडिया पर हुए हल्ले के बाद सीबीएसई ने वेदांत के केस में हुई तकनीकी समस्या को तो हल कर दिया लेकिन नए असेसमेंट सिस्टम यानी ओएसएम से जुड़ी शिकायतें कम नहीं हुईं। कई विद्यार्थियों का कहना है कि स्कैन कॉपी में दिख रही उत्तरपुस्तिका उनकी है ही नहीं, जैसे वेदांत के मामले में हुआ था। कुछ विद्यार्थियों के मुताबिक, उनकी सप्लीमेंट्री शीट गायब है। कई जवाबों को जांचा ही नहीं गया। स्टेप मार्किंग के सिस्टम को नजरअंदाज किया गया। अगर छात्र ने सवाल का पूरा जवाब न लिखा हो, लेकिन कुछ स्टेप सही किए तो भी उसे नंबर मिलते थे, लेकिन कई विद्यार्थियों का आरोप है कि उनकी कॉपी जांचते समय इस प्रावधान का पालन नहीं हुआ।

ओएसएम प्रणाली से कॉपी जांचने वाले परीक्षकों की ट्रेनिंग पर सवाल उठ रहे हैं। पहले अध्यापक ऑफलाइन में भी गड़बड़ियां करते थे। कभी टोटलिंग में नंबर छूट जाते थे, तो कभी सही जवाब को गलत मार्क कर दिया जाता था। इन सबसे बचने के लिए ऑन स्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) सिस्टम लाया गया। एग्जाम ऑफलाइन लिया जा रहा है और जांच ऑनलाइन हो रही है। इस प्रक्रिया के लिए परीक्षकों को लंबी ट्रेनिंग मिलनी चाहिए थी, लेकिन सतही प्रशिक्षण के बाद सिस्टम लागू हो गया। बेहतर तो यह था कि जब तक शिक्षक इस तकनीक में पूरी तरह प्रशिक्षित नहीं होते, तब तक इसे अपनाया नहीं जाता, लेकिन पता नहीं किस दबाव में इसे लागू कर दिया गया। इससे सीबीएसई की साख पर सवाल लगा ही, विद्यार्थी अपने भविष्य को लेकर आशंकित भी हो रहे हैं। बोर्ड को यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रत्येक छात्र को न्याय मिले, उनका भरोसा बना रहे और उनका भविष्य प्रभावित न हो। तभी शिक्षा व्यवस्था विश्वसनीय बनी रहेगी।

12वीं के बाद अच्छी यूनिवर्सिटी में एडमिशन चाह रहे विद्यार्थी तनाव में हैं। अंकों में मामूली गड़बड़ी भी उनके भविष्य पर असर डाल सकती है। यह बात भी उठ रही है कि जब मैनुअल जांच पर ही भरोसा करना है तो ऑन स्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) सिस्टम लागू ही क्यों हुआ? तकनीकी गड़बड़ी सीधे-सीधे छात्रों के भविष्य को प्रभावित कर रही है। स्कैन कॉपी मिलने के बाद री-इवैल्यूएशन होगा, तब कहीं जाकर सही स्थिति पता लगेगी। इसमें समय लगेगा। इस बीच कई कॉलेजों में काउंसलिंग शुरू होने जा रही है।

सीबीएसई के ऑन स्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) सिस्टम को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। ऐसे में अचानक कई स्कूलों के प्रिंसिपल वीडियो जारी कर रहे हैं। इनमें वे दावा करते हुए दिखाई दे रहे हैं कि सीबीएसई की नई मार्किंग स्कीम ओएसएम अच्छी है, सुरक्षित है और छात्रों के लिए फायदेमंद है। असल में सीबीएसई को समझ नहीं आ रहा है कि वह अपने नए सिस्टम को कैसे बचाए। मां-बाप परेशान हैं, विद्यार्थियों के रिजल्ट पर सवाल उठ रहे हैं, स्कैन कॉपी में धुंधलापन, गलत आंसर शीट और नंबर न मिलने की शिकायतें सामने आ रही हैं। इस बीच प्रिंसिपल को पीआर वीडियो बनाने पर मजबूर किया जा रहा है। यह संकेत है कि सीबीएसई का संकट बहुत बड़ा है और वह अपने सिस्टम की सच्चाई को छिपाने के लिए अन्य तरीके अपना रहा है। 17 लाख 68 हजार विद्यार्थियों में से 4 लाख 4 हजार छात्रों ने स्कैन कॉपी के लिए आवेदन किया है। यह कुल विद्यार्थियों का 23 फीसदी है। इतनी बड़ी संख्या में छात्रों की शिकायतें हैं, लेकिन सीबीएसई प्रिंसिपल के वीडियो के जरिए यह बताने की कोशिश कर रहा है कि सब ठीक है। यह गलत संकेत है। सीबीएसई को छात्रों की शिकायतों को गंभीरता से लेना चाहिए, न कि प्रचार के जरिए उन्हें छिपाना चाहिए। प्रिंसिपल के वीडियो क्यों आ रहे हैं? शायद स्कूल प्रबंधन पर सीबीएसई का दबाव है। शायद प्रिंसिपलों को आदेश दिया गया है कि वे ओएसएम के समर्थन में वीडियो बनाएं। यह डराने-धमकाने की प्रक्रिया हो सकती है। अगर ऐसा है, तो यह चिंता की बात है।

सीबीएसई को समस्याओं को सुलझाना चाहिए। इन्हें छिपाने के लिए नए—नए हथकंडे नहीं अपनाने चाहिए। तकनीक का उपयोग समस्या के समाधान के लिए होना चाहिए, न कि समस्या बढ़ाने के लिए। विद्यार्थियों के भविष्य को जोखिम में डालकर कोई भी नया सिस्टम लागू नहीं किया जाना चाहिए। शिक्षा मंत्रालय और सीबीएसई को विद्यार्थियों और अभिभावकों की आवाज सुननी होगी। शिक्षा व्यवस्था विश्वसनीय और भरोसेमंद बनी रहना आवश्यक है।

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Author: Bharat Sarathi

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