क्या हम एक मूक सामूहिक हत्या के मूकदर्शक बने हुए हैं?
एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

गोंदिया (महाराष्ट्र) – 31 मई को विश्व तंबाकू निषेध दिवस मनाया जाता है। हर वर्ष भाषण, शपथ और जागरूकता कार्यक्रम होते हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल आज भी हमारे सामने खड़ा है कि तंबाकू और नशे के खिलाफ देश में कभी वैसा उग्र जनआंदोलन क्यों नहीं खड़ा हुआ, जैसा भ्रष्टाचार, आरक्षण, कृषि कानून, नागरिकता या सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर देखने को मिला?
तंबाकू केवल एक व्यक्तिगत आदत नहीं, बल्कि एक धीमी सामूहिक हत्या है। हर वर्ष लाखों लोग कैंसर, हृदय रोग, स्ट्रोक और फेफड़ों की बीमारियों से दम तोड़ देते हैं। हजारों परिवार उजड़ जाते हैं, लेकिन समाज की संवेदनाएं अब भी उतनी तीव्र नहीं दिखतीं।
आज नशे का स्वरूप भी बदल चुका है। बीड़ी-सिगरेट से आगे बढ़कर ई-सिगरेट, वेप्स, निकोटीन पॉड्स, फ्लेवर्ड हुक्के और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण युवाओं को आकर्षित कर रहे हैं। इन्हें आधुनिकता और स्टेटस सिंबल के रूप में पेश किया जा रहा है, जबकि यह “मीठा जहर” नई पीढ़ी को निकोटीन की गिरफ्त में धकेल रहा है।

सबसे खतरनाक पहलू पैसिव स्मोकिंग है। धूम्रपान करने वाला व्यक्ति केवल अपना नहीं, बल्कि अपने परिवार, बच्चों, गर्भवती महिलाओं और आसपास के लोगों का स्वास्थ्य भी खतरे में डालता है। यह केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता नहीं, बल्कि दूसरों के स्वास्थ्य अधिकारों का उल्लंघन है।
यह भी विचारणीय है कि तंबाकू विरोधी संघर्ष अब तक बड़ा जनआंदोलन क्यों नहीं बन पाया? इसका कारण यह है कि तंबाकू तत्काल मृत्यु नहीं देता, बल्कि धीरे-धीरे शरीर को नष्ट करता है। दूसरा कारण तंबाकू उद्योग का विशाल आर्थिक तंत्र और तीसरा कारण सामाजिक स्वीकार्यता है।
अब समय आ गया है कि तंबाकू निषेध को केवल स्वास्थ्य विभाग का विषय न माना जाए। शासन, प्रशासन, विद्यालय, महाविद्यालय, पंचायतें, नगर निकाय, सामाजिक संगठन, धार्मिक संस्थाएं, चिकित्सक समुदाय, मीडिया और राजनीतिक दल मिलकर राष्ट्रव्यापी अभियान चलाएं।
जिस प्रकार स्वच्छता अभियान, पोलियो उन्मूलन और बेटी बचाओ जैसे अभियानों को जनभागीदारी से सफलता मिली, उसी प्रकार “नशा मुक्त भारत” को भी राष्ट्रीय जनचेतना आंदोलन बनाया जा सकता है।
तंबाकू को “ना” कहना केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि स्वस्थ समाज और सुरक्षित भविष्य की दिशा में जिम्मेदार कदम है। क्योंकि नशा कभी शान नहीं हो सकता, यह व्यक्ति, परिवार और समाज की चेतना का क्षरण है।









