31 मई : विश्व तंबाकू निषेध दिवस : मुखौटे बदलते नशे, सुलगती सांसें

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तंबाकू के आधुनिक छलावे में दम तोड़ती हमारी पीढ़ियां

उमेश कुमार साहू

वैधानिक चेतावनियों से पटे सिगरेट के डिब्बे और गुटखे के पाउच असल में किसी इंसान की जेब में रखी उसकी अपनी मौत की किश्तें हैं। World Health Organization के आह्वान पर हर साल 31 मई को ‘विश्व तंबाकू निषेध दिवस’ मनाया जाता है। औपचारिकताएं होती हैं, रस्मी भाषण दिए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि तंबाकू नाम का यह धीमा जहर आज भी हर साल दुनिया भर में 80 लाख से अधिक लोगों को लील रहा है। चौंकाने वाला तथ्य यह है कि इनमें से करीब 13 लाख लोग वे हैं, जिन्होंने जिंदगी में कभी तंबाकू को हाथ भी नहीं लगाया; वे सिर्फ दूसरों के छोड़े धुएं यानी ‘पैसिव स्मोकिंग’ (Passive Smoking) के शिकार हुए हैं। यह आत्महत्या नहीं, समाज द्वारा की जा रही सामूहिक हत्या है।

तंबाकू का बदलता रूप : ‘कूल’ दिखने का जानलेवा भ्रम

पिछले एक दशक में तंबाकू उद्योग ने अपना चेहरा बदला है। अब यह सिर्फ हुक्के, बीड़ी या बदबूदार सिगरेट तक सीमित नहीं है। आज कॉरपोरेट कंपनियों ने युवाओं और विशेषकर किशोरों को फंसाने के लिए Vapes, E-Cigarettes और फ्लेवर्ड हुक्कों का एक मायाजाल बुना है। इसे ‘हानिरहित’ या ‘कूल’ बताकर बेचा जा रहा है, जो कि सरासर सफेद झूठ है।

हालिया मेडिकल रिसर्च बताते हैं कि ई-सिगरेट में इस्तेमाल होने वाले केमिकल फेफड़ों को इस कदर सड़ा देते हैं कि उस बीमारी को ‘इवाली’ (EVALI – E-cigarette or Vaping Product Use-Associated Lung Injury) नाम दिया गया है। जो युवा इसे स्टेटस सिंबल मान रहे हैं, वे असल में अपने फेफड़ों में प्लास्टिक और भारी धातुएं (जैसे निकेल और लेड) पिघलाकर भर रहे हैं। नशा कभी शान नहीं हो सकता, यह चेतना का दिवालियापन है।

आधी आबादी पर गहराता संकट : महिलाएं और बच्चियां निशाने पर

इस काले कारोबार का सबसे वीभत्स पहलू यह है कि अब इसका शिकार अल्पायु बच्चियां और महिलाएं हो रही हैं। आधुनिकता, पब-कल्चर और कॉर्पोरेट स्ट्रेस के नाम पर सिगरेट को ‘महिला सशक्तिकरण और आजादी’ के प्रतीक के रूप में विज्ञापित किया गया। यह आजादी नहीं, सीधे तौर पर शारीरिक और मानसिक गुलामी है।

चिकित्सकीय आंकड़े बताते हैं कि धूम्रपान और तंबाकू का सेवन महिलाओं के शरीर पर पुरुषों की तुलना में कहीं अधिक तेजी से और विनाशकारी तरीके से हमला करता है:

  • मातृत्व पर प्रहार : जो युवतियां या महिलाएं धूम्रपान करती हैं, उनमें बांझपन (Infertility) की दर 40% तक बढ़ जाती है। तंबाकू में मौजूद टॉक्सिन्स सीधे अंडाशयों (Ovaries) को प्रभावित करते हैं।
  • गर्भाशय में कत्लेआम : गर्भावस्था के दौरान लिया गया धुआं गर्भ में पल रहे शिशु के लिए ‘गैस चैंबर’ जैसा काम करता है। इससे समय से पहले प्रसव, नवजात का वजन कम होना और जन्मजात विकलांगता का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
  • कैंसर का तांडव : महिलाओं में ब्रैस्ट कैंसर, सर्वाइकल कैंसर और फेफड़ों के कैंसर के मामलों में बढ़ोतरी का सीधा संबंध एक्टिव और पैसिव स्मोकिंग से जुड़ा पाया गया है।
रसायन नहीं, यह साक्षात तेजाब है

सिगरेट के एक कश या गुटखे के एक थूक में जो रसायन शरीर में प्रवेश करते हैं, उनकी सूची किसी गटर को साफ करने वाले एसिड से कम नहीं है। वैज्ञानिकों के अनुसार, तंबाकू के धुएं में 7000 से अधिक रसायन होते हैं, जिनमें से कम से कम 70 सीधे तौर पर कैंसर पैदा करते हैं।

रसायनउपयोग / असलियतशरीर पर प्रभाव
निकोटिनकीटनाशकदिमाग को सेकंडों में गुलाम बनाता है
टार (Tar)सड़क बनाने वाला डामरफेफड़ों को काला कर ब्लॉक करता है
कार्बन मोनोऑक्साइडवाहनों का जहरीला धुआंखून में ऑक्सीजन घटाता है
आर्सेनिकचूहे मारने का जहरकोशिकाओं के DNA को नुकसान पहुंचाता है
फॉर्मेल्डिहाइडशव संरक्षण रसायनफेफड़ों और सांस की नली को जलाता है

मात्र एक सिगरेट इंसान की जिंदगी के बेशकीमती मिनट छीन लेती है। यह धीमा जहर फेफड़ों को सड़ाता है, दिल की धमनियों को चोक करता है और अंततः इंसान को तड़पती हुई मौत की ओर धकेल देता है।

पैसिव स्मोकिंग : बिना पिए भी फेफड़े हो रहे हैं राख

यदि आप यह सोचकर निश्चिंत हैं कि आप सिगरेट नहीं पीते, तो सावधान हो जाइए। अगर आपके आसपास कोई धूम्रपान कर रहा है, तो आप भी उतने ही खतरे में हैं। जलती हुई सिगरेट के छोर से निकलने वाले धुएं में अधिक निकोटिन, अधिक कार्बन मोनोऑक्साइड और कई गुना अधिक कैंसरकारी रसायन पाए जाते हैं।

सार्वजनिक स्थानों, दफ्तरों और घरों में धूम्रपान केवल व्यक्तिगत आदत नहीं, बल्कि दूसरों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है। मासूम बच्चों और बुजुर्गों के फेफड़े भी उसी धुएं की कीमत चुका रहे हैं।

विज्ञापन और ग्लैमर का घिनौना खेल

आज बड़े-बड़े फिल्मी सितारे और नामचीन हस्तियां ‘इलायची’ और ‘माउथ फ्रेशनर’ के नाम पर सरोगेट विज्ञापन करके तंबाकू और गुटखा ब्रांड्स को प्रमोट कर रहे हैं। चमकदार पैकिंग और ग्लैमरस प्रचार के पीछे करोड़ों युवाओं को नशे की गिरफ्त में धकेलने का कारोबार छिपा है।

‘सबम्यूकस फाइब्रोसिस’ जैसी बीमारी में इंसान का मुंह खुलना बंद हो जाता है और अंततः यह भयानक ओरल कैंसर का रूप ले लेती है। कैंसर वार्डों में कटे हुए जबड़ों और सड़ती जीभ के साथ तड़पते मरीज इस नशे की भयावह सच्चाई का जीवंत प्रमाण हैं।

कानून नाकाफी, दृढ़ संकल्प ही आखिरी रास्ता

सिर्फ सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान प्रतिबंधित करने या टैक्स बढ़ा देने से यह समस्या खत्म नहीं होगी। सरकारों के लिए यह राजस्व का साधन हो सकता है, लेकिन समाज के लिए यह मौत का व्यापार है।

अब जरूरत ‘जन-आंदोलन’ और ‘पारिवारिक चेतना’ की है। माता-पिता को स्वयं उदाहरण बनना होगा। स्कूलों और कॉलेजों में तंबाकू विरोधी अभियान केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि मिशन बनने चाहिए।

नशा छोड़ना केवल शारीरिक चुनौती नहीं, बल्कि मानसिक युद्ध है। इस विश्व तंबाकू निषेध दिवस पर हर नागरिक, विशेषकर युवा पीढ़ी और महिलाओं को यह संकल्प लेना होगा कि वे तंबाकू के इस चंगुल को उखाड़ फेंकेंगे। जिंदगी को धुएं में उड़ाने के बजाय स्वस्थ और सशक्त भविष्य की ओर मोड़ना ही सबसे बड़ा निर्णय है।

याद रखिए — तंबाकू को नहीं छोड़ेंगे, तो तंबाकू आपको कहीं का नहीं छोड़ेगा।

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Author: Bharat Sarathi

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