अव्यवस्था की गिरफ्त में परीक्षा व परिणाम

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डा.वेदप्रकाश

नीट- यूजी परीक्षा में पेपर लीक का मामला अभी पूरी तरह सुलझा भी नहीं है कि मूल्यांकन की प्रक्रिया में गड़बड़ी को लेकर सीबीएसई पर सवाल उठ रहे हैं। गौरतलब है कि इस बार सीबीएसई ने 12वीं की कक्षा की बोर्ड परीक्षा के मूल्यांकन हेतु नई ऑन स्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) प्रणाली को अपनाया जिसे लेकर देशभर से प्रश्न और छात्रों व अभिभावकों की बेचैनी सामने आ रही है। कहीं दूसरे की कॉपी अपलोड होने का प्रश्न है तो कहीं स्कैन कॉपी के धुंधली होने का। इन सब बातों का असर विद्यार्थियों के परीक्षा परिणाम पर पड़ा है। कई विद्यार्थी ऐसे हैं जिन्होंने आंतरिक परीक्षाओं में लगातार 90 से अधिक अंकों के साथ श्रेष्ठ प्रदर्शन किया है किंतु बोर्ड परीक्षा में वे मुश्किल से पास हो पाए हैं। उनका आत्मविश्वास गिर चुका है।

गणित और भौतिकी की परीक्षाओं में सबसे अधिक गड़बड़ी की बातें सामने आ रही हैं। परीक्षा और मूल्यांकन में पूरा देश परंपरागत प्रणाली पर चल रहा है जिसमें बहुत कम कमियां हैं लेकिन तकनीक आधारित ऑन स्क्रीन मार्किंग प्रणाली समूची मूल्यांकन प्रक्रिया के लिए नई है। बहुत जल्दबाजी में इसे लागू क्यों किया गया? प्रश्न तो यह भी है कि क्या इसके लिए मूल्यांकन करने वाले शिक्षक पूरी तरह से प्रशिक्षित हो पाए थे? आज भी देश में ऐसे अनेक शिक्षक हैं जो कंप्यूटर आधारित तकनीक के इस्तेमाल में बहुत सहज महसूस नहीं करते। फिर मूल्यांकन प्रक्रिया में विद्यार्थी के लिखे उत्तर में बार-बार आरंभ, मध्य और अंत के क्रम को जांचना, विद्यार्थी की हैंडराइटिंग आदि मूल्यांकन को महत्वपूर्ण बनाते हैं लेकिन ऑन स्क्रीन मार्किंग में ऐसे समुचित मूल्यांकन की संभावना बहुत कम रह जाती है। इसे लागू करने हेतु विद्यालय में छोटी कक्षाओं से प्रयास करने अधिक सार्थक होते। 12वीं की परीक्षा विद्यार्थी के करियर के लिए अति विशिष्ट मानी जाती है। वहां एक-एक अंक उसका स्थान निर्धारित करता है। इस बार के ऑन स्क्रीन मार्किंग से तमाम अव्यवस्था सामने आ ही रही हैं। जवाबदेही के प्रश्न पर पूरी तरह मौन क्यों है?

सुप्रीम कोर्ट ने विगत दिनों कहा कि राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी ने पिछले नीट पेपर लीक से कोई सबक नहीं सीखा। गौरतलब है कि एनटीए की लगभग पूरी व्यवस्था निजी एजेंसियों के भरोसे ही चल रही है। कहीं इसके भी कुछ विशेष कारण तो नहीं हैं। क्या देश के विभिन्न सरकारी संस्थान जो देश-दुनिया में शीर्ष पर हैं, क्या उनमें परीक्षाओं के सफल आयोजन करने की क्षमता नहीं है? परीक्षा प्रवेश, पात्रता, नौकरी एवं पदोन्नति हेतु एक आवश्यक और पारदर्शी व्यवस्था मानी जाती है। यह एक ऐसी विधि अथवा प्रणाली है जिसके जरिए अभ्यर्थी अपनी पात्रता सिद्ध करते हुए आगे बढ़ते हैं किंतु आजकल भिन्न-भिन्न प्रकार की परीक्षाएं व्यवस्था की गिरफ्त में दिखाई दे रही हैं। हाल ही में नेशनल टेस्टिंग एजेंसी द्वारा आयोजित नीट- यूजी पेपर लीक मामला देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है जिसमें देशभर के मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश की पात्रता परीक्षा नीट के प्रश्नपत्र लीक होने से पूरी परीक्षा रद्द करनी पड़ी है।

ज्ञात हो कि इस परीक्षा में देश- विदेश के लगभग 22 लाख 79 हजार छात्र शामिल हुए थे। अब इन परीक्षार्थियों को मजबूरन यह परीक्षा दोबारा देनी पड़ेगी। क्या यह इन परीक्षार्थियों और देश के बहुमूल्य संसाधनों से खिलवाड़ नहीं है? यह परीक्षा देश-विदेश के 565 शहरों में लगभग साढे पांच हजार परीक्षा केंद्रों पर आयोजित हुई थी। एनटीए परीक्षार्थियों से फॉर्म फीस के रूप में क्रमश: 1700,1600 और 1000 रुपये वसूल कर चुकी है। इस अरबों रुपये धनराशि का प्रयोग परीक्षा आयोजन हेतु किया गया। इसके अतिरिक्त भी भिन्न-भिन्न प्रकार के खर्चो को सरकार वहन करती है। जिसमें परीक्षा केंद्रों का शुल्क, सुपरिटेंडेंट, इनविजीलेटर, ऑब्जर्वर की व्यवस्था, रहने की व्यवस्था, खाने-पीने की व्यवस्था, परीक्षा आयोजन में लगने वाली स्टेशनरी, फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी, सुरक्षा व्यवस्था, परीक्षा आयोजन से जुड़े हुए लोगों का आवागमन आदि ऐसे सैकड़ों खर्चे हैं जिनकी पूर्ति केवल फॉर्म फीस से होना संभव नहीं है। पुन: परीक्षा का अर्थ है कि संस्था को अब दोबारा अरबों रुपया खर्च करना पड़ेगा। क्या यह देश की आर्थिकी पर अनावश्यक बोझ नहीं है? दूसरा पक्ष यह है कि नीट जैसी महत्वपूर्ण परीक्षा के लिए परीक्षार्थी दो-तीन साल की कोचिंग अथवा स्वयं कड़ी मेहनत करता है। कोचिंग की दृष्टि से एक विद्यार्थी के ऊपर 8 से 10 लाख रुपए का खर्च आता है। देश के दिल्ली, नोएडा,कोलकाता, बेंगलुरु और कोटा जैसे शहरों में तो बड़े-बड़े कोचिंग संस्थान खुले हुए हैं जहां हर वर्ष हजारों करोड़ का कारोबार होता है। इन शहरों से बड़े-बड़े पूंजीपत्तियों के अलग-अलग प्रकार के कारोबार परीक्षा तंत्र के सहारे ही चल रहे हैं। नीट पेपर लीक में इन कोचिंग सेंटरों और प्रश्न पत्र तैयार करने वाले लोगों की संलिप्तता भी सामने आ चुकी है। इससे तो यह भी स्पष्ट होता है कि यह गोरखधंधा लंबे समय से चल रहा है। प्रश्न यह भी है कि बड़ी और महत्वपूर्ण प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्न पत्र राजस्थान, हरियाणा और मध्यप्रदेश जैसे राज्यों से ही क्यों लीक होते हैं?

विदित हो कि एनटीए की स्थापना वर्ष 2017 में शिक्षा मंत्रालय के उच्च शिक्षा विभाग के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्था के रूप में की गई जिसका उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में पारदर्शी, निष्पक्ष और कंप्यूटर आधारित परीक्षाएं आयोजित करना है। यह संस्था प्रमुख रूप से जेईई, नीट- यूजी, यूजीसी नेट पात्रता व फैलोशिप और सीयूईटी जैसी महत्वपूर्ण परीक्षाएं आयोजित करती है। यह भी सत्य है कि वर्ष 2017 से 2026 तक यह संस्था पेपर लीक, अव्यवस्था और समय पर परिणाम घोषित न करने के कारण विवादों में ही रही है। कंप्यूटर आधारित परीक्षाएं आयोजित करने के नाम पर अधिकांशत: निजी संस्थानों और दूरदराज के क्षेत्रों को परीक्षा केंद्र बनाया जाता है। ऐसे केंद्रों पर कई जगह तो मूलभूत सुविधाएं भी नहीं हैं। अकुशल कर्मचारियों और अपर्याप्त संसाधनों में परीक्षाएं आयोजित होती हैं। परीक्षार्थी ऐसी अव्यवस्थाओं का विरोध करते रहे हैं।

गौरतलब है कि विगत कई वर्षों में राज्य और राष्ट्रीय स्तर की शिक्षक भर्ती परीक्षा, कांस्टेबल भर्ती परीक्षा, सहायक इंजीनियर भर्ती परीक्षा, यूजीसी नेट राष्ट्रीय पात्रता एवं फैलोशिप परीक्षा और अब नीट- यूजी पेपर लीक जैसे दर्जनों मामले सामने आ चुके हैं। क्या हम अतीत की गलतियों से सीखकर एक समुचित लीक प्रूफ और भ्रष्टाचार मुक्त परीक्षा तंत्र विकसित नहीं कर सकते? ज्ञात हो कि नीट- यूजी परीक्षा 2024 में गड़बड़ियों को लेकर लगे गंभीर आरोपों के बाद सुप्रीम कोर्ट ने एनटीए में सुधार के लिए जरूरी कदम उठाने के निर्देश दिए थे। इसके बाद शिक्षा मंत्रालय ने इसरो के पूर्व प्रमुख डा. के.राधाकृष्णन की अगुवाई में एक हाई पावर कमेटी गठित की थी। अक्टूबर 2024 में कमेटी ने एनटीए को परीक्षा में सुधार के लिए कई अहम सुझाव दिए थे। कमेटी ने कहा था कि- प्रश्न पत्रों को डिजिटल माध्यम से परीक्षा के पहले केंद्रों तक पहुंचाया जाए जिसे परीक्षा आरंभ होने से पूर्व विशेष कोड के जरिए खोला जा सके।

दूसरा, नीट- यूजी को भी दो चरणों में आयोजित किया जाए जिससे समुचित प्रबंध किया जा सके। तीसरा, परीक्षा के लिए निजी केंद्रों की जगह सरकारी विद्यालयों को ही परीक्षा केंद्र बनाया जाए। चौथा नेशनल टेस्टिंग एजेंसी में संविदा या ठेके पर काम करने वाले कर्मचारियों की जगह फुल टाइम कर्मचारियों की तैनाती की जाए क्योंकि विभिन्न महत्वपूर्ण परीक्षाओं के आयोजन में हर स्तर पर निजी एजेंसियां शामिल हैं। कुछ अन्य सुझाव भी कमेटी ने दिए थे। प्रश्न यह भी है कि कमेटी के सुझावों को लागू क्यों नहीं किया गया? परीक्षाओं में अव्यवस्था परीक्षा तंत्र और नीति निर्धारण से जुड़े लोगों की अक्षमता भी व्यक्त करती है।

किसी भी परीक्षा के पेपर लीक का मामला बहुत गंभीर है। इससे राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर सरकार और संस्थाओं की साख धूमिल होती है। क्या इसके लिए भी जीरो टॉलरेंस नहीं होना चाहिए? गौरतलब है कि भारत सरकार द्वारा पेपर लीक और परीक्षा में होने वाली धांधली को रोकने के लिए एक सख्त कानून के रूप में सार्वजनिक परीक्षा अधिनियम 2024 लागू किया गया जिसमें परीक्षाओं में अनुचित साधनों के प्रयोग पर तीन से पांच वर्ष की जेल और 10 लाख तक के जुर्माने का प्रविधान है। तो वहीं पेपर लीक के संगठित गिरोह के लिए 10 वर्ष तक की सजा और एक करोड़ तक का जुर्माना आदि सम्मिलित हैं। इस प्रकार के कृत्य को संज्ञेय और गैर जमानती अपराध माना गया है लेकिन क्या इस प्रकार के अपराधियों के लिए यह सजा पर्याप्त है? और कितने लोगों को ऐसी सजा मिल पाती है? भारतीय दंड संहिता में ऐसे अपराधों के लिए जहां दंड के प्रविधान लिखे हैं, वहीं न्याय व्यवस्था में इनसे बचने के लिए भी विभिन्न प्रविधान हैं।

लीक होने के बाद एक पेपर लाखों रुपए में बेचा जाता है। क्या यह कठिन परिश्रम कर रहे बच्चों के परिश्रम से खिलवाड़ नहीं है? क्या पेपर लीक करने वाले लाखों परिवारों को हानि नहीं पहुंचा रहे हैं? क्या ऐसे लोगों को गंभीरतम अपराध की श्रेणी में रखकर कठोर दंड और भारी जुर्माने का प्रविधान नहीं होना चाहिए? नीट- यूजी पेपर लीक मामले में सीबीआई ने देशव्यापी छापे मारकर कुछ लोगों को गिरफ्तार किया है। स्पष्ट तौर पर यह संगठित अपराध का मामला है जिसकी जड़ें कई प्रदेशों में फैली हुई हैं। किसी भी पेपर लीक मामले में सामान्यतः होता यही है कि जल्दी-जल्दी कुछ गिरफ्तारियां होती हैं। मामला कुछ दिन समाचार पत्रों और मीडिया की सुर्खियां बनता है और फिर रफा दफा हो जाता है। ध्यान रहे पेपर लीक की ऐसी घटनाएं सरकार,युवाशक्ति और जनता के समय और संसाधनों की बर्बादी है। ऐसी स्थिति में छात्रों को तो मानसिक परेशानी झेलना ही पड़ती है उनके साथ-साथ उनके परिजन भी शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से परेशानी उठाते हैं।

एनटीए का गठन तो पारदर्शी और निष्पक्ष परीक्षाएं आयोजित करने के लिए हुआ था लेकिन लगातार बढ़ती अव्यवस्थाएं और पेपर लीक के मामले यह बता रहे हैं कि एनटीए की पूरी संरचना ही प्रश्नों के घेरे में है। यदि ऑन स्क्रीन मार्किंग व्यवस्था में खामियां मिल रही हैं तो क्या इन प्रश्न पत्रों की पहले से चली आ रही मूल्यांकन पद्धति से पुनर्मूल्यांकन नहीं होना चाहिए? यह भी आवश्यक है कि पेपर लीक और अब मूल्यांकन प्रक्रिया की गंभीरता से जांच हो और फिर भरोसेमंद अधिकारियों को जिम्मेदारी सौंपकर परीक्षा तंत्र को पारदर्शी और भरोसेमंद बनाया जाए।

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Author: Bharat Sarathi

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