ऊर्जा आत्मनिर्भरता, किसानों की आय और पर्यावरण के दावों के बीच एथेनॉल मिश्रण नीति पर उठे माइलेज, जल संकट और उपभोक्ता हितों से जुड़े सवाल।
डॉ. घनश्याम बादल

भारतीय राजनीति में कई बार ऐसा हुआ है कि जो नीति कल तक विकास का प्रतीक बताई जाती है, वही आज सवालों के घेरे में खड़ी दिखाई देती है। पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण की नीति भी कुछ ऐसी ही बहस का विषय बन चुकी है। जिस योजना को केंद्र सरकार ने ऊर्जा आत्मनिर्भरता, किसानों की समृद्धि और हरित अर्थव्यवस्था की आधारशिला बताया था, उसी पर अब वाहन निर्माता, उपभोक्ता संगठन, पर्यावरणविद् और विपक्ष गंभीर प्रश्न उठा रहे हैं। सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस बहस के केंद्र में स्वयं सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी के हालिया बयान आ गए हैं।
एक समय गडकरी एथेनॉल को भारत का “भविष्य का ईंधन” बताते नहीं थकते थे। उनका कहना था कि किसान केवल अन्नदाता नहीं, बल्कि “ऊर्जादाता” भी बन सकते हैं। वे लगातार फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों, एथेनॉल आधारित अर्थव्यवस्था और आयातित तेल पर निर्भरता कम करने की वकालत करते रहे किंतु हाल के सार्वजनिक वक्तव्यों में उन्होंने यह स्वीकार किया कि इथेनॉल की वजह से गाड़ियों की माइलेज पर असर पड़ेगा और 2023 के पहले बनी हुई गाड़ियों के इंजन इसके पूर्णतया अनुकूल नहीं हैं। उन्होंने यह भी माना कि यदि एथेनॉल उत्पादन का आधार केवल गन्ना और अधिक पानी वाली फसलें रहेंगी तो इससे जल संकट और कृषि असंतुलन जैसी समस्याएँ पैदा हो सकती हैं। आलोचक इसे गडकरी का “यू-टर्न” कह रहे हैं जबकि सरकार इसे नीति के व्यावहारिक पुनर्मूल्यांकन के रूप में प्रस्तुत कर रही है।
भारत में एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम की शुरुआत वर्ष मुख्य रूप से 2003 में हुई. वैसे एथेनॉल 0.6% तो 2001 से ही पेट्रोल में मिलाया जा रहा था। पहले 5 प्रतिशत, फिर 10 प्रतिशत और अब 20 प्रतिशत मिश्रण तक पहुँचने का सफर सरकार की महत्वाकांक्षी ऊर्जा नीति का हिस्सा रहा है।
कानूनी रूप से यह प्रक्रिया पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय, पर्यावरण मंत्रालय, सड़क परिवहन मंत्रालय, भारतीय मानक ब्यूरो तथा तेल विपणन कंपनियों के तकनीकी मानकों के अनुरूप अधिसूचनाओं के माध्यम से लागू की जाती है अर्थात यह केवल राजनीतिक घोषणा नहीं बल्कि एक व्यापक नियामकीय व्यवस्था का परिणाम है लेकिन प्रश्न यह है कि क्या भारत ने इस नीति के सामाजिक और आर्थिक दुष्प्रभावों का पर्याप्त आकलन किया?
सरकार का दावा है कि एथेनॉल मिश्रण से विदेशी मुद्रा की बचत होगी, कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटेगी, किसानों को गन्ने और मक्का का बेहतर मूल्य मिलेगा तथा कार्बन उत्सर्जन कम होगा। सुनने में यह तर्क आकर्षक लगते हैं लेकिन इनके समानांतर कई असुविधाजनक प्रश्न भी हैं, जिनका उत्तर अभी तक स्पष्ट नहीं है।
सबसे बड़ा प्रश्न पानी का है। भारत पहले ही भूजल संकट झेल रहा है। गन्ना उन फसलों में है जो अत्यधिक पानी मांगती हैं। ऐसे में यदि ईंधन नीति का आधार भी गन्ना बनेगा तो क्या यह जल संकट को और गहरा नहीं करेगा? क्या ऊर्जा आत्मनिर्भरता की कीमत जल असुरक्षा होगी?
दूसरा प्रश्न आम उपभोक्ता से जुड़ा है। एथेनॉल की ऊष्मीय क्षमता पेट्रोल से कम होती है। अनेक ऑटोमोबाइल विशेषज्ञों का मानना है कि ई20 ईंधन से पुराने वाहनों में माइलेज घट सकता है और कुछ इंजन भागों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। नई ई20-अनुकूल गाड़ियों में यह समस्या कम हो सकती है, लेकिन देश की करोड़ों पुरानी गाड़ियों का क्या होगा? क्या उनके मालिकों को नई तकनीक अपनाने की अप्रत्यक्ष कीमत चुकानी पड़ेगी?
यहीं विपक्ष सरकार पर सबसे तीखा हमला करता है। उसका आरोप है कि सरकार ने पहले रसोई गैस, फिर पेट्रोल-डीजल और अब एथेनॉल नीति के माध्यम से उपभोक्ता पर अतिरिक्त बोझ डाला है। विपक्ष का कहना है कि यदि माइलेज कम होगा तो आम आदमी अधिक ईंधन खरीदेगा और अंततः बचत सरकार की होगी, उपभोक्ता की नहीं। विपक्ष यह भी पूछ रहा है कि यदि नीति इतनी ही लाभकारी है तो सरकार स्वतंत्र वैज्ञानिक संस्थाओं द्वारा व्यापक माइलेज और इंजन परीक्षण रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं करती?
सरकार इन आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताती है। उसका कहना है कि ब्राज़ील और अमेरिका जैसे देशों ने वर्षों से एथेनॉल मिश्रण को सफलतापूर्वक अपनाया है। भारत भी ऊर्जा सुरक्षा के लिए यही रास्ता अपना रहा है। सरकार यह भी कहती है कि एथेनॉल उद्योग ने किसानों को हजारों करोड़ रुपये का अतिरिक्त बाजार उपलब्ध कराया है और चीनी मिलों के बकाये के भुगतान में भी मदद मिली है।
फिर भी कुछ असहज करने वाले प्रश्न बने हुए हैं। यदि एथेनॉल इतना ही सस्ता और प्रभावी है तो पेट्रोल की खुदरा कीमतों में अपेक्षित कमी क्यों दिखाई नहीं देती? यदि आयात बिल कम हो रहा है तो उसका लाभ उपभोक्ता तक किस रूप में पहुँचा? यदि पर्यावरण संरक्षण ही लक्ष्य है तो फिर इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, हाइड्रोजन और सार्वजनिक परिवहन पर समान गति से निवेश क्यों नहीं दिखाई देता?
दरअसल समस्या एथेनॉल नहीं, बल्कि नीति के संतुलन की है। भारत जैसे जल-संकटग्रस्त देश में ऊर्जा नीति को केवल आर्थिक लाभ के आधार पर नहीं आँका जा सकता। उसे जल, कृषि, पर्यावरण, उपभोक्ता और तकनीक—इन पाँचों कसौटियों पर एक साथ खरा उतरना होगा।
सरकार को चाहिए कि वह एथेनॉल को राजनीतिक उपलब्धि के बजाय वैज्ञानिक नीति के रूप में प्रस्तुत करे। माइलेज, इंजन प्रदर्शन, जल उपयोग और लागत पर सभी अध्ययन सार्वजनिक किए जाएँ। दूसरी ओर विपक्ष को भी केवल विरोध के लिए विरोध करने के बजाय व्यवहारिक विकल्प प्रस्तुत करने चाहिए।
लोकतंत्र में किसी भी नीति की सफलता केवल उसके घोषित उद्देश्य से नहीं, बल्कि उसके वास्तविक परिणामों से तय होती है। एथेनॉल का यह ‘टी-20’ भी उसी कसौटी पर परखा जाएगा।
यदि इससे किसान समृद्ध हों, पर्यावरण सुरक्षित रहे, जल संकट न बढ़े और आम आदमी की जेब पर अतिरिक्त बोझ न पड़े तो यह भारत की बड़ी उपलब्धि होगी। लेकिन यदि ऊर्जा आत्मनिर्भरता की कीमत पानी, उपभोक्ता और कृषि संतुलन को चुकानी पड़ी, तो इतिहास इसे दूरदर्शी निर्णय नहीं बल्कि जल्दबाज़ी में खेला गया एक महँगा दांव भी कह सकता है।
साथ ही, उपभोक्ता के सामने शुद्ध पेट्रोल और एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल को, अपनी आवश्यकता के अनुसार इच्छित प्रतिशत में खरीदने का विकल्प भी उपलब्ध होना चाहिए।








