पेपर लीक, संवादहीनता और जवाबदेही के संकट के बीच युवाओं के भविष्य तथा लोकतंत्र की संवेदनशीलता पर उठते सवाल।
जब आंदोलन जारी हो, सवाल बढ़ते जाएं और सत्ता का जवाब केवल मौन बनकर रह जाए।
कुमार कृष्णन

लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति यही मानी जाती है कि अंततः जनता की आवाज़ सत्ता तक पहुंचती है। कोई अदालत का दरवाजा खटखटाता है, कोई संसद में सवाल उठाता है और कोई सड़क पर उतरकर विरोध दर्ज कराता है। जब सभी रास्ते बंद दिखाई देते हैं, तब कोई महात्मा गांधी की परंपरा में अनशन का मार्ग चुनता है। अनशन इसलिए नहीं होता कि वह सरकार को भूखा रखना चाहता है, बल्कि इसलिए कि वह उसकी अंतरात्मा को जगाना चाहता है। किंतु संकट तब पैदा होता है, जब सत्ता की अंतरात्मा ही ‘साइलेंट मोड’ पर चली जाए। तब भूख केवल अनशनकारी को लगती है, चिंता केवल उसके परिवार और समर्थकों को होती है, जबकि सत्ता के वातानुकूलित गलियारों में सब कुछ सामान्य बना रहता है।
जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक कई दिनों से आमरण अनशन पर हैं। उनकी सेहत लगातार गिर रही है। चिकित्सक चेतावनी दे रहे हैं कि लंबे उपवास का प्रभाव शरीर के महत्वपूर्ण अंगों पर पड़ सकता है। देश के विभिन्न हिस्सों से लोग चिंता व्यक्त कर रहे हैं। अनेक राजनीतिक नेताओं और सार्वजनिक हस्तियों ने उनसे अनशन समाप्त करने की अपील की है, किंतु जिस सरकार के खिलाफ यह आंदोलन है, उसकी ओर से लगभग पूर्ण मौन दिखाई देता है। ऐसा लगता है मानो नई राजनीतिक संस्कृति का पहला नियम यही हो गया है कि जो असहज सवाल पूछे, उसे अनदेखा कर दिया जाए।
दरअसल, यह आंदोलन केवल एक व्यक्ति या एक संगठन का आंदोलन नहीं है। इसके पीछे वर्षों से जमा होता वह असंतोष है, जिसे देश का युवा वर्ग महसूस कर रहा है। प्रतियोगी परीक्षाओं का बार-बार रद्द होना, पेपर लीक की घटनाओं का लगातार सामने आना और भर्ती प्रक्रियाओं में अनिश्चितता अब अपवाद नहीं, बल्कि व्यवस्था की गंभीर बीमारी बनती जा रही है। लाखों छात्र वर्षों तक तैयारी करते हैं, परिवार कर्ज लेकर कोचिंग और पढ़ाई का खर्च उठाते हैं, लेकिन परीक्षा माफिया और प्रशासनिक लापरवाही उनके सपनों को कुछ ही क्षणों में तोड़ देती है। विडंबना यह है कि हर बार जांच समिति गठित होती है, हर बार दोषियों पर कार्रवाई का आश्वासन दिया जाता है, लेकिन अगली परीक्षा में वही घटनाएं फिर दोहराई जाती हैं। मानो व्यवस्था ने इसे अपनी नियति मान लिया हो।
लोकतंत्र में मंत्री केवल योजनाओं का उद्घाटन करने के लिए नहीं होते। वे सफलताओं का श्रेय लेते हैं तो विफलताओं की जिम्मेदारी भी उन्हीं की होती है। यदि शिक्षा व्यवस्था बार-बार संकट में पड़ रही है, तो यह पूछना स्वाभाविक है कि इसकी जवाबदेही किसकी है। किंतु हमारे यहां जवाबदेही अब नैतिक दायित्व के बजाय राजनीतिक मजबूरी का विषय बन चुकी है। इस्तीफा अब गलती स्वीकार करने का नहीं, बल्कि सत्ता-संतुलन का प्रश्न बन गया है। जब तक कुर्सी पर संकट न आए, तब तक जिम्मेदारी भी मानो अवकाश पर चली जाती है।
सोनम वांगचुक स्वयं को गांधीवादी परंपरा का अनुयायी बताते हैं। यह प्रेरक है, लेकिन गांधी के सत्याग्रह को केवल उपवास तक सीमित समझना भूल होगी। गांधी का आंदोलन इसलिए प्रभावी होता था क्योंकि वह सत्ता को नैतिक दबाव में ले आता था। अंग्रेज उपनिवेशवादी थे, फिर भी विश्व जनमत और लोकतांत्रिक दबाव का प्रभाव उन पर पड़ता था। स्वतंत्र भारत की सरकारों ने भी अनेक अवसरों पर आंदोलनों से संवाद का रास्ता चुना, किंतु आज संवाद की जगह ‘नैरेटिव’ ने ले ली है। विरोध करने वाला पहले राष्ट्रविरोधी या राजनीतिक एजेंडे से प्रेरित घोषित किया जाता है, उसके बाद उसकी बात सुनी जाती है—वह भी यदि कभी सुनी जाए तो।
आज का राजनीतिक व्यंग्य यही है कि सरकारें हर मुद्दे पर संवाद की बात करती हैं, बस संवाद विरोध करने वालों से नहीं करतीं। किसानों ने महीनों आंदोलन किया, पहलवानों ने न्याय की मांग की, मणिपुर के लोग अपनी पीड़ा व्यक्त करते रहे और अब छात्र तथा शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग करने वाले युवा सड़कों पर हैं। हर बार सत्ता का पहला हथियार संवाद नहीं, बल्कि मौन बन जाता है। शायद यह मान लिया गया है कि समय सबसे बड़ा पुलिसकर्मी है—कुछ दिन प्रतीक्षा करो, मीडिया किसी अन्य मुद्दे में व्यस्त हो जाएगा, जनता किसी नई बहस में उलझ जाएगी और आंदोलन स्वयं थक जाएगा।
इस पूरी प्रक्रिया में मीडिया की भूमिका भी चर्चा का विषय है। कभी जंतर-मंतर लोकतांत्रिक प्रतिरोध का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता था। अन्ना हजारे के आंदोलन के समय कैमरे चौबीसों घंटे वहीं डटे रहते थे। सत्ता से सवाल पूछना पत्रकारिता का धर्म माना जाता था। आज तस्वीर बदल चुकी है। स्टूडियो में बहसें खूब होती हैं, लेकिन सड़क पर बैठे आंदोलनकारी कैमरों की प्रतीक्षा करते रह जाते हैं। जो आंदोलन टीवी स्क्रीन पर दिखाई नहीं देता, वह धीरे-धीरे राष्ट्रीय विमर्श से भी बाहर हो जाता है। लोकतंत्र का यह नया संस्करण कहीं न कहीं टीआरपी और ट्रेंडिंग हैशटैग से संचालित होता दिखाई देता है।
विडंबना यह भी है कि चर्चा शिक्षा सुधार की कम और इस बात की अधिक हो रही है कि कौन-सा नेता जंतर-मंतर जाएगा और कौन नहीं। मानो देश की परीक्षा व्यवस्था का भविष्य किसी एक राजनीतिक चेहरे की उपस्थिति पर निर्भर हो। भारतीय राजनीति की यह पुरानी बीमारी है कि मुद्दों से अधिक चेहरों को महत्व दिया जाता है। परिणाम यह होता है कि युवाओं के भविष्य से जुड़ा मूल प्रश्न पीछे छूट जाता है।
यह प्रश्न केवल सरकार से नहीं, विपक्ष और आंदोलनकारी नेतृत्व से भी पूछा जाना चाहिए। क्या शिक्षा सुधार को लेकर व्यापक राजनीतिक और सामाजिक सहमति बनाने का प्रयास हुआ है? क्या छात्र संगठनों, सामाजिक समूहों और विभिन्न राजनीतिक दलों को एक साझा मंच पर लाने की कोशिश की गई है? लोकतंत्र में नैतिक शक्ति जितनी आवश्यक है, राजनीतिक परिपक्वता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। केवल सोशल मीडिया की लोकप्रियता से राष्ट्रीय आंदोलन नहीं बनते; उन्हें समाज के विविध वर्गों को साथ जोड़ना पड़ता है।
यदि युवा स्वयं को व्यवस्था द्वारा अपमानित और उपेक्षित महसूस करते हैं, तो उनका आक्रोश किसी न किसी रूप में सामने आएगा। किंतु किसी भी आंदोलन की सफलता उसके प्रतीकों से नहीं, बल्कि उसकी संगठन क्षमता, रणनीति और व्यापक सामाजिक समर्थन से तय होती है। आंदोलन को यह समझना होगा कि वर्तमान दौर की राजनीति पहले की सरकारों से भिन्न है। यहां विरोध को स्वीकार करने के बजाय उसे हाशिए पर डाल देने की रणनीति अधिक दिखाई देती है। ऐसे में आंदोलनों को भी अपने तरीके और रणनीतियां बदलनी होंगी।
सबसे बड़ा प्रश्न फिर वहीं लौटता है—क्या सरकार युवाओं की पीड़ा सुनने को तैयार है? क्या वह परीक्षा सुधार के लिए समयबद्ध योजना प्रस्तुत करेगी? क्या वह यह भरोसा दिलाएगी कि अगली पीढ़ी का भविष्य किसी पेपर लीक माफिया के हाथों गिरवी नहीं रहेगा? यदि इन प्रश्नों का उत्तर नहीं मिलता, तो लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूंजी—जनविश्वास—धीरे-धीरे क्षीण होती जाएगी।
सरकारें केवल बहुमत से नहीं चलतीं, विश्वास से भी चलती हैं। विश्वास का निर्माण प्रचार अभियानों से नहीं, बल्कि जवाबदेही और संवेदनशीलता से होता है। जिस दिन नागरिक को यह महसूस होने लगे कि उसकी आवाज़ सत्ता तक नहीं पहुंच रही, उसी दिन लोकतंत्र के संकट की शुरुआत हो जाती है। चुनाव जीत लेना लोकतंत्र की अंतिम मंजिल नहीं है। असली कसौटी यह है कि सरकार अपने सबसे कमजोर, सबसे असहमत और सबसे असुविधाजनक नागरिक की बात सुनने का धैर्य रखती है या नहीं।
सोनम वांगचुक का जीवन किसी राजनीतिक जिद का विषय नहीं बनना चाहिए। लोकतंत्र किसी नागरिक की मृत्यु पर अपनी संवेदनशीलता सिद्ध नहीं करता, बल्कि उसे जीवित रखते हुए संवाद स्थापित करने में अपनी ताकत दिखाता है। सरकार को चाहिए कि वह आंदोलनकारियों से बातचीत करे, शिक्षा व्यवस्था में सुधार का स्पष्ट रोडमैप प्रस्तुत करे और जवाबदेही सुनिश्चित करे। वहीं आंदोलनकारियों को भी अपने संघर्ष को व्यापक सामाजिक एकजुटता में बदलना होगा।
अंततः यह संघर्ष किसी एक व्यक्ति, दल या संगठन का नहीं, बल्कि उन करोड़ों युवाओं का है जिनके सपने हर पेपर लीक के साथ टूटते हैं। यह उस लोकतंत्र की लड़ाई है, जो केवल मतदान तक सीमित नहीं रह सकता। यदि सरकार की अंतरात्मा सचमुच ‘साइलेंट मोड’ पर है, तो उसे जगाने की जिम्मेदारी केवल एक अनशनकारी की नहीं, बल्कि पूरे समाज की है। क्योंकि जब शिक्षा व्यवस्था बीमार होती है, तब उसका उपचार केवल शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी नहीं रह जाता, बल्कि वह पूरे लोकतंत्र की परीक्षा बन जाता है।








