धीतेन्द्र कुमार शर्मा

राष्ट्रीय कार्यक्रमों में तैनात कार्मिकों को धमकाना शायद हमारे प्रशासनिक तंत्र की एक स्थायी प्रवृत्ति बनती जा रही है। कुछ माह पूर्व मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान देश के कई राज्यों में बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) पर अत्यधिक कार्यदबाव और तनाव की शिकायतें सामने आई थीं। उन घटनाओं की प्रतिध्वनि अभी शांत भी नहीं हुई थी कि अब जनगणना-2027 के कार्य में भी प्रशासनिक दबाव और पुलिसीय चेतावनियों की खबरें उठने लगी हैं।
देशभर में राष्ट्रीय जनगणना-2027 का कार्य युद्धस्तर पर चल रहा है। राजस्थान सहित विभिन्न राज्यों में शिक्षक और अन्य सरकारी कार्मिक घर-घर जाकर प्रगणना कार्य कर रहे हैं। इसी बीच जयपुर के जगतपुरा-झालाना क्षेत्र से ऐसी खबरें सामने आईं कि जनगणना ड्यूटी पर अनुपस्थित रहने वाले शिक्षकों को पुलिस थाने से फोन कर एफआईआर दर्ज करने की चेतावनी दी गई। बताया गया कि संबंधित जोन उपायुक्त ने शिक्षकों की सूची थाने को भेजी थी। हालांकि बाद में प्रशासनिक अधिकारियों ने यह कहा कि उद्देश्य केवल “डराना” था, वास्तविक एफआईआर दर्ज नहीं की जा रही।
यह प्रश्न यहीं से खड़ा होता है कि क्या प्रशासन की कार्यशैली अब समझाइश और संवाद के बजाय भय और दबाव पर आधारित होती जा रही है?
कुछ समय पहले कोटा जिले के रामगंजमंडी क्षेत्र से भी इसी प्रकार की शिकायतें सामने आई थीं, जहां जनगणना कार्य में लगे शिक्षकों को थाने से फोन आने की चर्चाएं थीं। भले ही औपचारिक कार्रवाई सामने न आई हो, लेकिन कार्मिकों में भय और असहजता का वातावरण अवश्य बना।
इसमें कोई संदेह नहीं कि जनगणना एक अत्यंत महत्वपूर्ण राष्ट्रीय कार्यक्रम है। इसके लिए जनगणना अधिनियम-1948 में स्पष्ट प्रावधान किए गए हैं। कार्य में असहयोग या आदेशों की अवहेलना पर दंडात्मक कार्रवाई का अधिकार भी प्रशासन को प्राप्त है। अधिनियम की धारा 11 के तहत दंड के प्रावधान मौजूद हैं। इसलिए पुलिस की भूमिका पूरी तरह गैरकानूनी नहीं कही जा सकती।
किन्तु मूल प्रश्न कानून का नहीं, प्रशासनिक संवेदनशीलता का है।
जो शिक्षक और कर्मचारी जनगणना कार्य में लगे हैं, वे अपनी नियमित जिम्मेदारियों के अतिरिक्त यह अतिरिक्त दायित्व निभा रहे हैं। भीषण गर्मी, पारिवारिक दायित्व और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां भी उनके सामने हो सकती हैं। ऐसे में यदि किसी कार्मिक की अनुपस्थिति पर बिना उसकी परिस्थितियां समझे सीधे थाने से फोन कर एफआईआर की चेतावनी दी जाए, तो यह किसी भी सामान्य नागरिक को मानसिक तनाव में डाल सकता है।
प्रशासन को यह समझना होगा कि अनुशासन और भय में अंतर होता है। अनुशासन संवाद, विश्वास और सहयोग से आता है, जबकि भय केवल अस्थायी दबाव पैदा करता है। राष्ट्रीय कार्यक्रमों को सफल बनाने के लिए कार्मिकों में सम्मान और सहभागिता की भावना आवश्यक है, न कि दंड का डर।
ऐसे मामलों में प्राथमिकता समझाइश और संवाद को मिलनी चाहिए। पुलिस की भूमिका अंतिम विकल्प होनी चाहिए, प्रथम प्रतिक्रिया नहीं। कानून की मंशा भी यही है कि जानबूझकर कर्तव्य से विमुख होने वालों पर कार्रवाई हो, न कि हर अनुपस्थित कर्मचारी को अपराधी की तरह देखा जाए।
जनगणना का कार्य अभी लंबा चलेगा। ऐसे में राज्य और केंद्र सरकारों को चाहिए कि वे जिलास्तरीय प्रशासन और जनगणना अधिकारियों के लिए स्पष्ट एडवाइजरी जारी करें। कार्मिकों की व्यावहारिक कठिनाइयों और मानवीय पक्ष को ध्यान में रखते हुए कार्य संचालन किया जाए।
ध्यान रखना होगा कि जनगणना केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक राष्ट्रीय उत्सव है। इसे उत्सव की भावना से संचालित करना ही उचित होगा। डर और दबाव पर आधारित कार्यशैली किसी भी स्वस्थ प्रशासन की पहचान नहीं हो सकती।








