डॉ. घनश्याम बादल

देश में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतें अब केवल आर्थिक बहस का विषय नहीं रह गई हैं, बल्कि यह आम आदमी की रोजमर्रा की पीड़ा का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुकी हैं। सुबह दफ्तर जाने वाला कर्मचारी, खेत में डीजल पंप चलाने वाला किसान, मालवाहक वाहन चालक हो या रसोई गैस सिलेंडर उठाने वाली गृहिणी — सब इस बढ़ती महंगाई की सीधी मार झेल रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इस महंगाई का वास्तविक कारण क्या है? क्या केवल अंतरराष्ट्रीय बाजार जिम्मेदार है, या फिर केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा लगाया जाने वाला भारी कर भी जनता की कमर तोड़ने में बराबर का दोषी है?
भारत अपनी आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से मंगाता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का असर भारत पर पड़ना स्वाभाविक है। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में तनाव, डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी और वैश्विक आपूर्ति संकट जैसे कारण अक्सर सरकार और तेल कंपनियों द्वारा गिनाए जाते हैं, लेकिन यह पूरी सच्चाई नहीं है।
यदि केवल अंतरराष्ट्रीय कीमतें ही कारण होतीं, तो जब वैश्विक बाजार में कच्चा तेल सस्ता हुआ था तब जनता को उतनी राहत क्यों नहीं मिली? आखिर क्यों पेट्रोल-डीजल पर कर बढ़ाकर सरकारों ने अपनी आय बढ़ा ली? यहीं से शुरू होती है पेट्रोल-डीजल की “टैक्स पॉलिटिक्स”।

भारत में एक लीटर पेट्रोल की कीमत में सबसे बड़ा हिस्सा करों का होता है। मई 2026 के औसत आंकड़ों के अनुसार केवल दिल्ली में लगभग 102 रुपये प्रति लीटर बिक रहे पेट्रोल में केंद्र सरकार का उत्पाद शुल्क लगभग 19 से 20 रुपये प्रति लीटर है, जबकि राज्य सरकार का मूल्य वर्धित कर और अन्य शुल्क मिलाकर लगभग 16 से 18 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच जाता है। यानी दिल्ली की जनता से कुल मिलाकर लगभग 35 से 38 रुपये प्रति लीटर कर वसूला जा रहा है। महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु और बिहार जैसे राज्यों में यह वसूली 40 रुपये प्रति लीटर से भी अधिक पहुंच जाती है। डीजल पर भी केंद्र और राज्य मिलाकर लगभग 28 से 32 रुपये प्रति लीटर तक कर लेते हैं। अर्थात यदि कोई व्यक्ति 100 रुपये का पेट्रोल खरीद रहा है तो उसमें एक-तिहाई से अधिक राशि केवल करों के रूप में सरकारों की जेब में जा रही है।
यही कारण है कि जनता बार-बार पूछती है कि आखिर पेट्रोल और डीजल को अब तक जीएसटी के दायरे में क्यों नहीं लाया गया? जवाब स्पष्ट है — क्योंकि पेट्रोलियम पदार्थ केंद्र और राज्य दोनों सरकारों के लिए सबसे बड़ी “नकदी मशीन” बन चुके हैं। यदि इन्हें जीएसटी में शामिल कर दिया गया, तो बेहिसाब कर वसूली सीमित हो जाएगी।
विडंबना यह है कि जब कीमतें बढ़ती हैं तो केंद्र सरकार राज्य सरकारों के वैट को जिम्मेदार बताती है और राज्य सरकारें केंद्र के उत्पाद शुल्क को दोष देती हैं, लेकिन दोनों में से कोई भी अपनी आय में कटौती करने को तैयार नहीं दिखाई देता। जनता के लिए राहत केवल चुनावी मौसम में कुछ रुपये घटाने तक सीमित रह जाती है। उसके बाद फिर वही महंगाई लौट आती है।
अब बात तेल कंपनियों की। Indian Oil Corporation, Bharat Petroleum और Hindustan Petroleum जैसी सरकारी तेल कंपनियां यह दावा करती हैं कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा होने के कारण उन्हें नुकसान उठाना पड़ता है, लेकिन दूसरी ओर इनके वित्तीय आंकड़े कुछ अलग कहानी कहते हैं। वर्ष 2024-25 में इन प्रमुख तेल कंपनियों ने संयुक्त रूप से लगभग 77 हजार करोड़ रुपये से अधिक का शुद्ध लाभ दर्ज किया था। इंडियन ऑयल ने अकेले लगभग 39 हजार करोड़ रुपये का लाभ कमाया, जबकि भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम ने भी हजारों करोड़ रुपये का मुनाफा दिखाया।
ऐसे में जनता का प्रश्न स्वाभाविक है — यदि कंपनियां इतने बड़े मुनाफे में हैं तो फिर “घाटा” आखिर कहां है?
दरअसल तेल कंपनियां जिस “घाटे” की बात करती हैं, उसका संबंध मुख्यतः “अल्प वसूली” से होता है। इसका अर्थ यह है कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल अचानक महंगा हो जाता है और सरकार राजनीतिक कारणों से खुदरा कीमतें तुरंत नहीं बढ़ाती, तब कंपनियां कुछ समय तक कम कीमत पर ईंधन बेचती हैं। कंपनियों का कहना होता है कि इससे उनकी लागत और बिक्री मूल्य के बीच अंतर पैदा होता है। लेकिन यह भी सच है कि जब बाजार स्थिर होता है या कीमतें कम होती हैं, तब यही कंपनियां भारी मुनाफा भी कमाती हैं।
आलोचक कहते हैं कि घाटे का तर्क कई बार आधा सच होता है, क्योंकि कंपनियों के मुनाफे, सरकारी लाभांश और कर संग्रह के आंकड़े यह दिखाते हैं कि अंततः इस पूरे तंत्र का भार आम आदमी पर ही डाला जाता है। सरकारें कहती हैं कि करों से सड़कें बनती हैं, विकास होता है और जनकल्याणकारी योजनाएं चलती हैं। यह बात सही हो सकती है, लेकिन तब सवाल उठता है कि विकास का सबसे बड़ा भार केवल पेट्रोल-डीजल उपभोक्ता ही क्यों उठाए?
पेट्रोल-डीजल की महंगाई का असर केवल वाहन तक सीमित नहीं रहता। परिवहन महंगा होता है तो सब्जियां महंगी हो जाती हैं। डीजल महंगा होता है तो खेती की लागत बढ़ जाती है। मालवाहक वाहनों का किराया बढ़ता है तो बाजार में हर सामान की कीमत बढ़ती है। यानी पेट्रोल-डीजल की हर वृद्धि सीधे आम आदमी की रसोई तक पहुंचती है। यही कारण है कि ईंधन मूल्य वृद्धि वास्तव में “महंगाई की जननी” मानी जाती है।
यदि सरकार वास्तव में जनता को राहत देना चाहती है तो सबसे पहले पेट्रोल-डीजल पर कर व्यवस्था को पारदर्शी बनाना होगा। केंद्र और राज्यों दोनों को अपने करों में संतुलन लाना होगा। पेट्रोलियम पदार्थों को चरणबद्ध तरीके से जीएसटी के दायरे में लाने पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए। साथ ही तेल कंपनियों के लाभ और लागत का सार्वजनिक लेखा परीक्षण होना चाहिए, ताकि जनता को यह स्पष्ट दिखाई दे कि वह किसके लिए कितना भुगतान कर रही है।
आज आम आदमी केवल सस्ता तेल नहीं मांग रहा, बल्कि वह यह जानना चाहता है कि आखिर उसकी मेहनत की कमाई पर सबसे बड़ा अधिकार किसका है — सरकार का, तेल कंपनियों का या उस नागरिक का जो हर दिन बढ़ती महंगाई के बीच अपना जीवन खींचने को मजबूर है?








