हाँ, मैं छोटे दुकानदार के रूप में कॉकरोच हूँ

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डॉ. शैलेश शुक्ला

हाँ, मैं छोटे दुकानदार के रूप में कॉकरोच हूँ। मैं वही आदमी हूँ जिसकी दुकान में टँगी ट्यूबलाइट से ज्यादा उसकी आँखें जलती रहती हैं। मेरा संसार 8 बाई 10 की उस दुकान में कैद है जहाँ ऊपर भगवान की तस्वीर, नीचे उधारी की कॉपी और बीच में मेरा अधूरा जीवन रखा रहता है। मैं न उद्योगपति हूँ, न कारोबारी सम्राट। मैं बस वह आदमी हूँ जो सुबह शटर उठाकर उम्मीद खोलता है और रात को हिसाब देखकर फिर से चिंता बंद कर देता है।

मेरी दुकान कोई व्यापारिक साम्राज्य नहीं, रोजमर्रा की साँस लेने की मशीन है। यहाँ साबुन भी बिकता है, बिस्कुट भी, बच्चों की टॉफी भी और मेरी नींद भी। ग्राहक आते हैं, सामान लेते हैं, मुस्कुराते हैं, चले जाते हैं। लेकिन उनके जाने के बाद जो बचता है, वह है बिजली का बिल, जीएसटी का डर, बाजार का दबाव और ऑनलाइन बिक्री का भूत।

कॉकरोच की सबसे अद्भुत कला होती है — बड़े-बड़े हमलों के बाद भी किसी कोने में बचा रहना। मैं भी वही हूँ। पहले बड़े शोरूम आए। फिर मॉल आए। फिर ऐप आए। फिर घर बैठे सामान आने लगा। हर बार लोगों ने कहा — “अब छोटे दुकानदार खत्म हो जाएँगे।” लेकिन मैं अब भी गली के मोड़ पर बैठा हूँ। थोड़ा दुबला हो गया हूँ, थोड़ा ज्यादा चिंतित हो गया हूँ, लेकिन अभी जिंदा हूँ।

सुबह मेरी दुकान खुलती नहीं, मेरी चिंता जागती है। सबसे पहले झाड़ू लगती है, फिर माल सजता है, फिर दिनभर ग्राहकों का नाटक शुरू होता है। कोई आएगा, आधे घंटे तक 20 तरह के साबुन पूछेगा, फिर सामने वाली दुकान से खरीद लेगा। कोई 5 रुपये की चीज के लिए 50 रुपये का ज्ञान देगा। और कुछ लोग तो ऐसे होते हैं जो दुकान में घुसते ही मान लेते हैं कि दुकानदार जन्म से ठग होता है।

मुझे सबसे ज्यादा मनोरंजन तब मिलता है जब ग्राहक कहता है — “भाई, ऑनलाइन तो सस्ता मिल रहा है।” मैं मन ही मन सोचता हूँ — “तो भाई, ऑनलाइन से ही ले लो, मेरे पास क्यों आए हो?” लेकिन मैं मुस्कुरा देता हूँ। क्योंकि छोटे दुकानदार की सबसे बड़ी पूँजी उसका धैर्य होता है। यदि उसने गुस्सा कर दिया तो ग्राहक अगली बार सामने वाली दुकान पर चला जाएगा।

मेरे जीवन का सबसे बड़ा व्यंग्य यह है कि मैं पूरे मोहल्ले की जरूरतें पूरी करता हूँ, लेकिन मेरी अपनी जरूरतें हमेशा उधार में चलती हैं। किसी के घर चीनी खत्म हो जाए — मेरी दुकान। रात में दवा चाहिए — मेरी दुकान। छुट्टा चाहिए — मेरी दुकान। मोबाइल रिचार्ज — मेरी दुकान लेकिन महीने के अंत में जब मैं थोक व्यापारी को भुगतान करने जाता हूँ, तब मेरी जेब मेरी तरफ देखकर हँसती है।

छोटे दुकानदार का सबसे स्थायी ग्राहक “उधार” होता है। यह ऐसा प्राणी है जो हर मोहल्ले में पाया जाता है। लोग कहते हैं — “भाई, कल दे देंगे।” वह “कल” कई बार अगले त्योहार तक नहीं आता। लेकिन यदि एक दिन दुकानदार ने पैसे माँग लिए तो वही ग्राहक समाज में घोषणा कर देगा — “बहुत पैसों का घमंड हो गया है।”

मेरी दुकान केवल सामान बेचने की जगह नहीं, मोहल्ले का सामाजिक मंच भी है। यहाँ राजनीति पर बहस होती है, क्रिकेट पर निर्णय होता है, पड़ोसियों की चर्चा होती है और देश की अर्थव्यवस्था का विश्लेषण भी। मजेदार बात यह है कि जो आदमी 10 रुपये का नमकीन उधार लेकर जाता है, वही विश्व अर्थव्यवस्था सुधारने की सलाह भी देता है।

कॉकरोच अँधेरे में छिपकर बच निकलता है। मैं टैक्स, लाइसेंस, निरीक्षण और बढ़ती लागत के बीच किसी तरह साँस लेता हूँ। हर कुछ महीने में नया नियम आ जाता है। कभी बिल का प्रारूप बदलिए, कभी पंजीकरण करवाइए, कभी मशीन लगाइए। मैं सोचता हूँ कि मेरी दुकान किराने की है या सरकारी परीक्षा केंद्र?

सबसे दुखद दृश्य तब होता है जब पूरा दिन दुकान पर बैठने के बाद बिक्री कम होती है। शाम को शटर गिराते समय ऐसा लगता है जैसे दिन नहीं, उम्मीद बंद कर रहा हूँ। घर पहुँचते ही पत्नी पूछती है — “आज कैसा रहा?” और मैं हमेशा एक ही जवाब देता हूँ — “बस चल रहा है।” छोटे दुकानदार का पूरा जीवन इसी “चल रहा है” में निकल जाता है।

मुझे सबसे अधिक विडंबना तब लगती है जब बड़े-बड़े उद्योगपति “स्थानीय व्यापार बचाओ” जैसे विज्ञापन देते हैं। भाई, आप पहले हमारा ग्राहक तो मत खाइए। शहर में अब हर तीसरे मोड़ पर विशाल बाजार खुल गया है। वहाँ रोशनी ज्यादा है, संगीत चलता है, छूट के बोर्ड लगे हैं। मेरी दुकान में बस मैं बैठा हूँ और पुराना पंखा घूम रहा है।

मेरी पीठ अब लगातार बैठने से दुखती है। आँखें हिसाब-किताब से कमजोर हो गई हैं लेकिन दुकान बंद नहीं कर सकता क्योंकि यह दुकान केवल कमाई नहीं, पहचान भी है। मोहल्ले में लोग मुझे नाम से कम, दुकान से ज्यादा जानते हैं — “अरे वही जनरल स्टोर वाला।”

छोटे दुकानदार की पत्नी भी आधी दुकानदार होती है। वह घर से हिसाब देखती है। बच्चों को संभालती है। कई बार दुकान पर बैठती भी है। यदि मैं खाना खाने घर गया तो वही ग्राहकों को सामान देगी लेकिन समाज उसे “घर पर रहने वाली” कहेगा। गरीब और मध्यम वर्ग की औरतों के श्रम का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं होता।

मुझे सबसे अधिक हँसी तब आती है जब लोग कहते हैं — “दुकानदार तो बहुत कमाते हैं।” यदि इतना ही कमाते होते तो आधी रात तक दुकान पर बैठे मच्छर नहीं मार रहे होते। लोग हमारी दुकान की बिक्री देखते हैं, बचत नहीं। उन्हें लगता है कि जो पैसा गल्ले में गया, वह सब मालिक का हो गया। कोई यह नहीं देखता कि किराया, बिजली, माल, टैक्स और उधारी सब उसी गल्ले में मुँह खोले बैठे हैं।

त्योहार हमारे लिए खुशी कम, परीक्षा ज्यादा होते हैं। माल भरना है। सजावट करनी है। भीड़ सँभालनी है। नकली नोटों से बचना है। और यदि त्योहार के बाद बिक्री कम हो गई तो महीनों तक घाटा उठाना है। लोग दीपावली पर रोशनी खरीदते हैं, दुकानदार कई बार उसी रोशनी के नीचे चिंता में डूबा बैठा रहता है।

मेरे बच्चे अब दुकान पर बैठना नहीं चाहते। वे कहते हैं — “इसमें भविष्य नहीं है।” और सच कहूँ तो मैं उन्हें रोक भी नहीं पाता। मैंने पूरी जिंदगी गल्ले के पीछे बैठकर काट दी। सुबह दुकान, रात दुकान, त्योहार दुकान, बीमारी दुकान। यह जीवन व्यापार कम, स्थायी कैद ज्यादा लगता है।

सबसे अजीब क्षण तब आता है जब कोई ग्राहक 2 रुपये के लिए बहस करता है और फिर बाहर जाकर ३०० रुपये की कॉफी पी लेता है। इस देश में गरीब आदमी की मेहनत सबसे ज्यादा मोलभाव झेलती है।

मेरी दुकान में रखा हर सामान मेरी चिंता से जुड़ा होता है। तेल की कीमत बढ़ी तो ग्राहक नाराज़। दाल महँगी हुई तो ग्राहक नाराज़। साबुन छोटा हुआ तो ग्राहक नाराज़। जैसे पूरी अर्थव्यवस्था का ठेका मैंने ले रखा हो। छोटे दुकानदार को इस देश में ग्राहक और बाजार — दोनों के बीच पिसना पड़ता है।

आज मैं पूरे होशोहवास में कहता हूँ — हाँ, मैं छोटे दुकानदार के रूप में कॉकरोच हूँ। मैं धूल भरे रैक, उधारी की कॉपियों, टूटते मुनाफे, झिलमिलाती ट्यूबलाइटों और चौबीसों घंटे खुली चिंता के बीच टिका हुआ जीव हूँ। मैं हर दिन अपना शटर उठाता हूँ जैसे युद्ध शुरू कर रहा हूँ। मैं मुस्कुराकर ग्राहकों को सामान देता हूँ और भीतर से धीरे-धीरे घिसता जाता हूँ।

रात को जब बाजार खाली होने लगता है, आखिरी ग्राहक भी चला जाता है, मैं गल्ला गिनता हूँ, उधारी की कॉपी बंद करता हूँ और शटर नीचे खींचता हूँ, तब लोहे की वह आवाज मुझे किसी जेल के दरवाजे जैसी लगती है। मैं इस बाजारवादी युग की चमकदार अर्थव्यवस्था के कोनों में बचा हुआ एक छोटा दुकानदार कॉकरोच हूँ।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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