डॉ घनश्याम बादल

सियासत में समय-समय पर ऐसे प्रतीक उभरते रहे हैं जो शब्द मात्र नहीं, जनभावनाओं के विस्फोट का माध्यम बने हैं। कभी आम आदमी का पार्टी का गठन भी इसी तरीके से हुआ था जैसे हाल के दिनों में विभिन्न आभासी मीडिया मंचों पर चर्चित“कॉकरोच जनता पार्टी” बनी है। अभिजीत दीपके द्वारा गठित कॉकरोच जनता पार्टी ऐसा ही एक राजनीतिक-सामाजिक प्रतीक बनकर सामने आई है।
कॉकरोच जनता पार्टी जैसा नाम भले ही व्यंग्यात्मक लगे, किंतु इसके पीछे छिपी बेचैनी, असंतोष और व्यवस्था-विरोधी मनोवृत्ति को हल्के में नहीं लिया जा सकता। यह केवल एक डिजिटल मज़ाक नहीं, बल्कि उस पीढ़ी का आक्रोश माना जाना चाहिए जो स्वयं को व्यवस्था द्वारा उपेक्षित, अपमानित और अनसुना महसूस कर रही है।
इस पूरी कहानी की शुरुआत उस विवादास्पद टिप्पणी से मानी जा रही है, जिसमें बेरोजगार युवाओं की तुलना “कॉकरोच” से करने वाला विवादित बयान भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत से जुड़ा बताया गया है।15 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट में एक ‘फ्री वोलस’ यानी तुच्छ समझे जाने वाले प्रकरण की सुनवाई के दौरान सामने आई थी। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार मौखिक टिप्पणी में कहा गया था कि कुछ बेरोजगार युवा “कॉकरोच की तरह” विभिन्न क्षेत्रों में घुस जाते हैं, जिनमें पत्रकारिता और आरटीआई एक्टिविज़्म का भी उल्लेख किया गया।
इस कथन के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया हुई। बड़ी संख्या में युवाओं ने इसे पूरे बेरोजगार वर्ग का अपमान माना। हालांकि अगले ही दिन जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्टीकरण जारी करते हुए कहा कि उनकी टिप्पणी को “गलत तरीके से पेश” किया गया। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका आशय समूची युवा पीढ़ी से नहीं था, बल्कि उन लोगों से था जो “फर्जी और नकली डिग्रियों” के सहारे पेशों में प्रवेश करते हैं।
इसी कथित टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर व्यंग्यात्मक प्रतिरोध के रूप में “कॉकरोच जनता पार्टी” का उदय हुआ।
शुरुआत में इसे केवल एक मीम या इंटरनेट ट्रेंड माना गया किंतु कुछ ही दिनों में यह डिजिटल आंदोलन का रूप लेने लगा। रिपोर्टों के अनुसार 24 से 72 घंटों के भीतर हजारों से लेकर लाखों तक लोगों के जुड़ने के दावे सामने आए। कहीं 40 हजार सदस्य बताए गए, कहीं एक लाख से अधिक समर्थकों का उल्लेख हुआ और और अपुष्ट स्रोतों के अनुसार तो अब यह संख्या करोड़ों में पहुंच चुकी है, यह संख्या चाहे वास्तविक सदस्यता हो या सोशल मीडिया की उत्सुकता, परंतु इतना स्पष्ट है कि युवाओं ने इसे अपने आक्रोश की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया है।
भारतीय राजनीति के संदर्भ में इस घटना को समझें तो आज का युवा पारंपरिक राजनीति से ऊब चुका है। वह लंबी वैचारिक बहसों से अधिक प्रत्यक्ष अनुभवों पर विश्वास करता है। बेरोजगारी, परीक्षा-पत्र लीक, अवसरों की कमी, बढ़ती प्रतिस्पर्धा और आर्थिक वह सामाजिक तथा व्यक्तिगत असुरक्षा ने उसके भीतर गहरी निराशा वह एक बड़ा शून्य पैदा कर दिया है। उसे लगता है कि सत्ता, न्याय व्यवस्था या राजनीतिक दल उसकी पीड़ा को समझने के बजाय उसका उपहास कर रहे हैं, तब व्यंग्य उसका प्रतिरोध का हथियार बन सामने आता है।
“कॉकरोच जनता पार्टी” इसी व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति की उपज है। यह उस पीढ़ी की सोच है जो आज कह रही है कि यदि व्यवस्था हमें “कॉकरोच” समझती है, तो हम उसी शब्द को प्रतिरोध के प्रतीक में बदल देंगे।
इतिहास साक्षी है कि उपहास से जन्मे कई प्रतीक बाद में गंभीर राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बने हैं। कभी “आम आदमी” शब्द भी व्यंग्य में प्रयुक्त होता था, किंतु बाद में वही एक बड़े राजनीतिक आंदोलन का आधार बना।
यह पूरा घटनाक्रम मुख्यतः उस आभासी मंच की उपज है जिसे हम सोशल मीडिया के नाम से जानते हैं । पहले राजनीतिक दल ज़मीन से उठते थे, फिर मीडिया तक पहुंचते थे। अब डिजिटल प्लेटफॉर्म पर पहले पहचान बनती है और बाद में वास्तविक राजनीतिक संभावना तैयार होती है। फेसबुक,टेलीग्राम,इंस्टाग्राम, एक्स और रील संस्कृति ने राजनीति को मनोरंजन, व्यंग्य और त्वरित प्रतिक्रिया के मिश्रण में बदल दिया है। यही कारण है कि “कॉकरोच जनता पार्टी” का नाम सुनते ही लोगों में जिज्ञासा उत्पन्न हुई और वह वायरल हो गया।
हालांकि इस पूरे आंदोलन को लेकर कई प्रश्न भी हैं। क्या यह वास्तविक राजनीतिक संगठन है अथवा केवल डिजिटल असंतोष का बुलबुला मात्र है? क्या इसके पीछे कोई संगठित राजनीतिक रणनीति है? क्या यह किसी दल विशेष के विरोध या समर्थन का अप्रत्यक्ष माध्यम है? इन प्रश्नों के स्पष्ट उत्तर अभी उपलब्ध नहीं हैं। यदि एक और समय तलाश किया जाए तो नेपाल में जेन जी के माध्यम से सत्ता का परिवर्तन अभी-अभी हमने होता देखा है। यद्यपि भारत में ऐसे आंदोलन को सत्ता परिवर्तन का प्रतीक मान लेना बहुत जल्दबाजी होगी।
कुछ रिपोर्टों में कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके के पुराने राजनीतिक संबंधों की भी चर्चा हुई है, किंतु किसी दल के प्रत्यक्ष नियंत्रण के प्रमाण सामने नहीं आए हैं।
फिर भी इस घटना को केवल मज़ाक कहकर खारिज करना भूल होगी।
याद रहना चाहिए कि लोकतंत्र में व्यंग्य हमेशा जनभावनाओं का संकेतक रहा है। जब जनता सीधे विरोध करने में असहज महसूस करती है, तब हास्य और कटाक्ष उसकी भाषा बन जाते हैं। कार्टून, नुक्कड़ नाटक, कविताएं और व्यंग्य लेख भी इसीतरह लंबे समय से राजनीतिक प्रतिरोध के साधन रहे हैं। “कॉकरोच जनता पार्टी” उसी परंपरा का डिजिटल संस्करण प्रतीत होती है।
इस पार्टी के भविष्य को लेकर दो संभावनाएं दिखाई देती हैं। पहली यह कि यह कुछ सप्ताह या महीनों का इंटरनेट ट्रेंड बनकर समाप्त हो जाएगी क्योंकि सोशल मीडिया की दुनिया में अनेक आंदोलन तीव्र गति से उठते हैं और उतनी ही तेजी से गायब भी हो जाते हैं। दूसरी संभावना अधिक महत्वपूर्ण है—यदि यह मंच युवाओं की वास्तविक समस्याओं को संगठित रूप से उठाने लगे, तो यह एक वैकल्पिक राजनीतिक-सामाजिक दबाव समूह बन सकता है। और इसमें दो राय नहीं की दक्षिणपंथी, वामपंथी और मध्यमार्गी राजनीति के बीच आज एक ऐसे प्रेशर ग्रुप की आवश्यकता तो है।
यह भी उल्लेखनीय है कि इस प्रकार के आंदोलनों का उदय लोकतंत्र के स्वास्थ्य का संकेत भी है और चेतावनी भी। यदि मुख्यधारा की राजनीति युवा वर्ग की पीड़ा को गंभीरता से नहीं लेगी, तो असंतोष व्यंग्य, कटाक्ष और अराजक डिजिटल अभियानों में परिवर्तित होता जाएगा इसकी प्रबल संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता है।
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सहनशीलता और आत्मसुधार की क्षमता रही है। इसलिए सत्ता, विपक्ष, न्यायपालिका और समाज सभी को इस घटना को केवल हास्य के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक मनोविज्ञान के दस्तावेज़ की तरह पढ़ना चाहिए।









