सुधारों की राह देखते सरकारी स्कूल

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डा.वेदप्रकाश

निजी स्कूल, कॉलेज और शिक्षण संस्थान खुशहाल और अधिकांश सरकारी स्कूल, कॉलेज और शिक्षण संस्थान बदहाल ऐसा क्यों? शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा यह राज्यों के विषय हैं। राष्ट्रीय राजधानी सहित देश के विभिन्न राज्यों में सरकारी शिक्षा व्यवस्था भिन्न-भिन्न रूपों में बदहाली का शिकार हो चुकी है। देश के सरकारी स्कूल सुधारों की राह देख रहे हैं। आज जब देश विश्व गुरु भारत का संकल्प लेकर आगे बढ़ रहा है और शिक्षा मंत्रालय भी लगातार नई-नई योजनाओं की घोषणा कर रहा है, क्या ऐसे में इन सरकारी स्कूलों की दशा सुधर पाएगी? शिक्षा व्यवस्था किसी भी समाज एवं राष्ट्र की नींव है। भारत जिस प्रकार कृषि प्रधान देश है ठीक उसी प्रकार यह सरकारी स्कूल अथवा शिक्षा प्रधान भी है। अधिकांशत देश के महानगरों और कुछ कस्बों में ही निजी स्कूल हैं। गांव- देहात और दूरदराज क्षेत्र में रहने वाले करोड़ों विद्यार्थी सरकारी स्कूलों पर ही निर्भर हैं। उनके पास न तो आर्थिक संपन्नता है और न ही ऐसे दूसरे संसाधन हैं कि वे निजी स्कूलों का रुख कर सकें। क्या प्रत्येक बच्चे तक समुचित शिक्षा की पहुंच के बिना विकसित भारत का संकल्प पूरा हो सकता है? क्या ऐसे विद्यार्थियों के लिए सरकारी स्कूलों में बेहतर सुविधाएं नहीं होनी चाहिए?

विगत दिनों सरकारी स्कूलों से संबंधित दो महत्वपूर्ण समाचार पढ़े। पहला समाचार शिक्षा मंत्रालय की संसदीय समिति की 349 वीं और 363 वीं रिपोर्ट से संबंधित था, जिसमें शिक्षकों के खाली पदों को समयबद्ध तरीके से भरने की बार-बार सिफारिश की गई है। आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2024- 25 में प्राथमिक स्कूलों के स्वीकृत 45,46,395 पदों में से 5,72,682 पद रिक्त हैं। इसी प्रकार वर्ष 2024-25 में माध्यमिक स्कूलों के स्वीकृत 24, 29,365 पदों में से 3,99,980 पद रिक्त हैं। इसके साथ ही यह भी सामने आया कि उत्तर प्रदेश में 2.17 लाख, बिहार में 1.92 लाख, बंगाल में 55 हजार, झारखंड में 72 हजार, मध्यप्रदेश में 55 हजार, हरियाणा में 15 हजार और जम्मू कश्मीर में 13 हजार पद रिक्त हैं। सामान्यत: इन प्रदेशों के अतिरिक्त राष्ट्रीय राजधानी सहित अन्य प्रदेशों में भी प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर शिक्षकों के हजारों पद रिक्त पड़े हैं। अनेक स्थानों पर अतिथि व संविदा शिक्षक काम कर रहे हैं। गौरतलब यह भी है कि केंद्र सरकार राज्यों को स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए 41,249 करोड़ रुपये वित्त वर्ष 2025-26 में राज्यों को आवंटित कर चुका है। क्या सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के खाली पद शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट और बच्चों को शिक्षा के अधिकार से वंचित नहीं कर रहे हैं? यदि ऐसा है तो फिर इसके जिम्मेदार राज्यों और संबंधित अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं होती?

दूसरा समाचार हाल ही में आई नीति आयोग की रिपोर्ट से संबंधित है, जिसमें यह स्पष्ट हुआ है कि विगत दो दशकों में सरकारी स्कूलों में दाखिले में 22 प्रतिशत की गिरावट आई है। वर्ष 2005 में जहां 71 प्रतिशत दाखिले सरकारी स्कूलों में होते थे वहीं 2024-25 में यह आंकड़ा घटकर 49.24 प्रतिशत रह गया है। रिपोर्ट यह भी कहती है कि अब सभी माध्यमिक संस्थानों में प्राइवेट स्कूलों की हिस्सेदारी 44.01 प्रतिशत हो गई है जो निजी शिक्षा की ओर अभिभावकों के झुकाव को दर्शाता है। उपर्युक्त दोनों समाचार जहां एक ओर सरकारी स्कूलों की बदहाली को व्यक्त कर रहे हैं वहीं दूसरी ओर राज्य स्तर पर शासन-प्रशासन की लापरवाही को भी उजागर करते हैं। आंकड़े यह भी बताते हैं कि देश में लगभग एक लाख सरकारी स्कूल ऐसे हैं जो केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। क्या यह स्थिति चिंताजनक नहीं है? सर्वविदित यह भी है कि देश में अनेक सरकारी स्कूल ऐसे हैं जहां आज भी शौचालय, पीने का पानी, विद्यार्थियों के बैठने की समुचित व्यवस्था, भवन एवं स्कूल तक जाने का रास्ता जैसी मूलभूत सुविधाएं भी नहीं हैं। सत्य यह भी है कि सरकारी स्कूलों के लाखों शिक्षक समय-समय पर मतदान, मतदाता सूची पुनरीक्षण, जनगणना एवं विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों एवं अभियानों में लगा दिए जाते हैं। क्या ऐसे में उनकी अध्ययन-अध्यापन की गतिविधियां प्रभावित नहीं होती हैं? सरकारी स्कूलों में महीनों तक पुस्तक वितरण, वर्दी वितरण, भोजन वितरण, सरकारी योजनाओं के पैसों के वितरण आदि से संबंधित औपचारिकताओं के कार्य चलते रहते हैं। क्या ऐसे में अध्ययन-अध्यापन का समुचित काम प्रभावित नहीं होता?

शैक्षिक सत्र शुरू हुए एक महीने से अधिक समय बीत चुका है लेकिन पाठ्य पुस्तकों की मांग और आपूर्ति के हिसाब से एनसीईआरटी की अब तक केवल आधी पुस्तकें ही छपी हैं। यद्यपि एनसीईआरटी ने नए पाठ्यक्रम ढांचे को बहुत पहले मंजूरी दे दी थी, जिसके तहत कक्षा 3 से 9 तक की संशोधित पाठ्य पुस्तकें सही समय पर आ जानी चाहिए थी। लेकिन अब तक आधी पुस्तकें ही छाप पाना समुचित योजना और कार्य प्रणाली पर प्रश्न चिन्ह लगाता है। दूसरी ओर निजी स्कूलों में निजी प्रकाशकों की महंगी पुस्तकों पर निर्भरता बढ़ रही है। वहां कोई ऐसा प्रशासनिक आदेश लागू नहीं होता की निजी स्कूल भी एनसीईआरटी की पुस्तकों का अनिवार्य रूप से प्रयोग करेंगे। इस सब के बीच बच्चों के साथ-साथ अभिभावक भी पिस रहे हैं। सरकारी स्कूलों की महंगी फीस, महंगी वर्दी, महंगी किताबें, महंगी वाहन व्यवस्था इन सभी का मिला-जुला तंत्र निजी स्कूलों, पूंजीपतियों और पूंजी को लगातार दोगुना- चौगुना बना रहे हैं। वहीं शिक्षकों की कमी व मूलभूत आवश्यकताओं के अभाव में सरकारी स्कूल बदहाली के शिकार हैं। कभी-कभी जब मामला अधिक बढ़ जाता है तो राष्ट्रीय राजधानी जैसे स्थानों पर निजी स्कूलों को लेकर कुछ दिखावटी फरमान आते हैं। दो-चार दिन बाद फिर स्थिति यथावत बन जाती है।

शिक्षा मंत्रालय लगातार कौशल विकास, तकनीक आधारित शिक्षा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एवं गुणवत्ता आदि के लिए प्रयासरत है लेकिन ऐसे विद्यालय जहां न तो मूलभूत सुविधाएं हैं और न ही शिक्षकों की समुचित संख्या है, क्या वहां पर उपर्युक्त प्रयास अथवा विचार लागू हो पाना संभव है? राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में गुणवत्तापूर्ण, शिक्षा समावेशी, शिक्षा की सार्वभौमिक पहुंच सुनिश्चित करना, ड्रॉपआउट बच्चों की संख्या कम करना एवं तकनीक के उपयोग पर जोर देने जैसे विभिन्न महत्वपूर्ण प्रविधान हैं लेकिन वह धरातल से बहुत दूर दिखाई दे रहे हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में प्रारंभिक शिक्षा एवं स्कूलों को लेकर बाल्यावस्था विकास, खेल आधारित, गतिविधि आधारित और खोज आधारित शिक्षा, उच्चतर गुणवत्ता का बुनियादी ढांचा, शिक्षकों के रिक्त पदों को जल्द से जल्द और समयबद्ध तरीके से भरना, शिक्षक- विद्यार्थी अनुपात सुनिश्चित करना, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, बच्चों के पोषण और स्वास्थ्य पर ध्यान देना जैसे दर्जनों विचार और प्रविधान हैं लेकिन धरातल पर स्थिति अभी भी पूर्ववत ही है, क्या ऐसी सुस्ती राष्ट्रीय शिक्षा नीति के संकल्प और विकसित भारत की गति को कमजोर नहीं कर रही है? अकेले छत्तीसगढ़ के 5 हजार से ज्यादा सरकारी स्कूलों में केवल एक शिक्षक है। उत्तराखंड के 1,655 विद्यालयों में छात्रों के लिए शौचालय नहीं हैं। वहीं 1,728 विद्यालयों में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, क्या ऐसे में उन्नत शिक्षा की बात केवल जुमला नहीं है?

जनसंख्या की दृष्टि से भारत विश्व में प्रथम स्थान पर पहुंच चुका है। आज भी देश के आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान,मध्यप्रदेश, झारखंड ,छत्तीसगढ़, बंगाल एवं बिहार जैसे प्रदेशों में साक्षरता की अनुमानित दर 70 से 75 प्रतिशत ही है। क्या बची हुई लगभग 25 से 30 प्रतिशत निरक्षर आबादी को साक्षर किए बिना भारत विकसित अथवा विश्व गुरु बन सकता है? स्कूली शिक्षा की तस्वीर बदलने अथवा उसमें सुधारों की दृष्टि से केंद्र सरकार की ओर से पीएम श्री स्कूल, समग्र शिक्षा, प्रेरणा, उल्लास, निपुण भारत, विद्या प्रवेश, विद्यांजलि, दीक्षा जैसी विभिन्न योजनाएं आरंभ की गई हैं लेकिन क्या ये योजनाएं दूर दराज क्षेत्रों में पहुंच पा रही हैं? सरकारी स्कूलों की दशा सुधारने के लिए वहां व्यापक स्तर पर आमूलचूल परिवर्तनों और सतत निगरानी की आवश्यकता है। धरातल पर उतरकर यथार्थ को समझना होगा। आज देश के प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल बीमारी अव्यवस्थाओं की बीमारी से ग्रसित हैं। इन स्कूलों में भी अविलंब सुधारों के व्यापक पैमाने बनाकर निरंतर काम करना होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते हैं- हम ऐसी शिक्षा व्यवस्था विकसित करना चाहते हैं जिससे युवाओं को विदेश जाने की जरूरत न पड़े। मध्यम वर्ग को लाखों-करोड़ों रुपए खर्च करने की जरूरत नहीं पड़े। हम ऐसे संस्थान भी बनाना चाहते हैं जो विदेश से लोगों को भारत आने के लिए आकर्षित करें। क्या प्रधानमंत्री जी का यह विचार और संकल्प सरकारी स्कूलों से जुड़े शासन-प्रशासन का संकल्प नहीं बनना चाहिए?

विडंबना यह है कि राजनीतिक लाभ-हानि और संकीर्णताओं के कारण कई प्रदेशों में तो अभी तक राष्ट्रीय शिक्षा नीति भी लागू नहीं हो पाई है। क्या इससे उन प्रदेशों के विद्यार्थियों का अहित नहीं हो रहा है? कई प्रदेशों में जब-जब शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया होती है तब तक वह भिन्न-भिन्न प्रकार के भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती है। इसी प्रकार सरकारी स्कूलों में दाखिलों में भारी गिरावट का बड़ा कारण वहां पर मूलभूत सुविधाओं और शिक्षकों का अभाव है। आपसी खींचतान के कारण अच्छे शिक्षकों के तबादले, गैर शैक्षिक गतिविधियों की अधिकता और सरकारी स्कूलों में बुराई और निजी स्कूलों में अच्छाई का संयोजित नॉरेटिव भी एक बड़ा कारण बन रहा है। ध्यान रहे सबकी शिक्षा तक पहुंच और उन्नत शिक्षा से ही विकसित भारत का संकल्प पूरा होगा।

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Author: Bharat Sarathi

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