दान की महत्ता धन से नहीं, भावना की पवित्रता से तय होती है : पं. अमर चन्द भारद्वाज
निष्काम एवं गुप्त दान ही सनातन संस्कृति में सर्वोत्तम माना गया

गुरुग्राम। आचार्य पुरोहित संघ के अध्यक्ष एवं दा पावर ऑफ ह्यूमन राइट्स फाउंडेशन के राष्ट्रीय मीडिया सचिव कथावाचक पंडित अमर चन्द भारद्वाज ने कहा कि भारतीय सनातन संस्कृति एवं धर्मशास्त्रों में दान को अत्यंत पुण्यकारी, पापों का नाश करने वाला तथा मानव जीवन को पवित्र एवं कल्याणकारी बनाने वाला बताया गया है। उन्होंने कहा कि दान का वास्तविक महत्व केवल धन, वस्तु अथवा सामग्री देने में नहीं, बल्कि दाता की भावना, विनम्रता, श्रद्धा एवं निष्काम भाव में निहित होता है।
पंडित अमर चन्द भारद्वाज ने कहा कि यदि दान अहंकार, प्रसिद्धि, यश, सम्मान, फोटो, पोस्टर, बैनर अथवा समाज में नाम चमकाने के उद्देश्य से किया जाए, तो उसका आध्यात्मिक महत्व अत्यंत सीमित रह जाता है। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में दान के तीन प्रकार—सात्त्विक, राजसिक एवं तामसिक—का वर्णन किया है। गीता के अनुसार जो दान बिना किसी प्रत्युपकार की इच्छा के, योग्य पात्र को, उचित समय एवं स्थान पर केवल कर्तव्य समझकर दिया जाए, वही सात्त्विक दान कहलाता है और वही ईश्वर को प्रिय होता है।
उन्होंने कहा कि आज के समय में अनेक लोग धार्मिक आयोजनों, मंदिरों, कथाओं, भंडारों एवं सेवा कार्यों में दान देकर बड़े-बड़े पोस्टर, बैनर एवं विज्ञापन लगवाते हैं, जिससे समाज में उनकी प्रसिद्धि बढ़े। शास्त्रों के अनुसार ऐसा दान मनुष्य को लौकिक यश और सम्मान तो दिला सकता है, किंतु उसका आध्यात्मिक पुण्य क्षीण हो जाता है, क्योंकि उसमें प्रदर्शन और अहंकार का भाव सम्मिलित हो जाता है।
कथावाचक पंडित अमर चन्द भारद्वाज ने कहा कि संत-महात्माओं ने सदैव “गुप्त दान महादान” का संदेश दिया है। अर्थात ऐसा दान जिसमें केवल भगवान और दाता ही जानें, वही सर्वोत्तम माना गया है। इसी भाव को लोक में इस प्रकार कहा जाता है कि “दाहिने हाथ से दान करो तो बाएँ हाथ को भी पता न चले।” यद्यपि यह प्रत्यक्ष शास्त्रीय श्लोक नहीं है, किंतु इसका भाव अत्यंत उच्च एवं दिव्य है।
उन्होंने कहा कि विभिन्न पुराणों एवं धर्मग्रंथों में अहंकार को भक्ति और पुण्य का सबसे बड़ा शत्रु बताया गया है। भगवान वस्तु का मूल्य नहीं, बल्कि भक्त का भाव देखते हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने अपने बालसखा सुदामा द्वारा प्रेमपूर्वक अर्पित अल्प सामग्री को अत्यंत प्रसन्न होकर स्वीकार किया, जबकि दिखावे और गर्व से किया गया दान मनुष्य के पुण्य को कम कर देता है।
उन्होंने समाज से अपील करते हुए कहा कि दान सदैव निष्काम भाव, श्रद्धा एवं विनम्रता से करना चाहिए। अन्नदान, विद्यादान, गौसेवा, रोगियों एवं असहायों की सहायता, धर्म एवं सत्संग की सेवा जैसे कार्य अत्यंत पुण्यकारी हैं, परंतु इनमें भी गुप्त एवं निष्काम दान को सर्वोत्तम माना गया है।
पंडित अमर चन्द भारद्वाज ने कहा कि दान का उद्देश्य केवल पीड़ित मानवता की सेवा एवं भगवान को प्रसन्न करना होना चाहिए, न कि स्वयं का प्रचार-प्रसार। वास्तव में दान की महत्ता धन की मात्रा में नहीं, बल्कि भावना की पवित्रता में होती है। थोड़ा सा निष्काम एवं गुप्त दान भी ईश्वर को अत्यंत प्रिय होता है, जबकि अहंकार एवं प्रदर्शन से किया गया बड़ा दान भी आध्यात्मिक दृष्टि से श्रेष्ठ नहीं माना जाता।
उन्होंने अंत में कहा कि “दिखावे का दान संसार को प्रसन्न कर सकता है, किंतु गुप्त एवं निष्काम दान भगवान को प्रसन्न करता है, और जब भगवान प्रसन्न हो जाते हैं तो मनुष्य का जीवन स्वयं धन्य हो जाता है।”









