डब्ल्यूएचओ ने घोषित की वैश्विक स्वास्थ्य आपातस्थिति, भारत-अफ्रीका फोरम शिखर सम्मेलन स्थगित
संक्रमण की बढ़ती रफ्तार और बड़े शहरों तक पहुंचने से वैश्विक चिंता गहराई, भारत समेत दुनिया अलर्ट मोड पर
एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं

गोंदिया/नई दिल्ली। कोरोना महामारी की विभीषिका से दुनिया अभी पूरी तरह उबर भी नहीं पाई थी कि अब इबोला वायरस का नया प्रकोप वैश्विक चिंता का कारण बनता जा रहा है। अफ्रीका के डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (डीआरसी) और युगांडा में तेजी से फैल रहे इबोला संक्रमण ने अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य एजेंसियों और सरकारों की चिंता बढ़ा दी है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने 17 मई 2026 को इसे “पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी ऑफ इंटरनेशनल कंसर्न” घोषित कर दिया।
इस बीच भारत सरकार और अफ्रीकी संघ ने 28 से 31 मई 2026 तक नई दिल्ली में प्रस्तावित चौथे भारत-अफ्रीका फोरम शिखर सम्मेलन को भी स्थगित कर दिया है। माना जा रहा है कि अफ्रीका में तेजी से बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति और संक्रमण के खतरे को देखते हुए यह निर्णय लिया गया।
एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी ने कहा कि दुनिया की चिंता केवल संक्रमण के फैलाव को लेकर नहीं है, बल्कि इस बार सामने आए इबोला के दुर्लभ “बुंडीबुग्यो स्ट्रेन” को लेकर है, जिसके लिए अभी तक कोई स्वीकृत वैक्सीन या प्रभावी उपचार उपलब्ध नहीं है। वैज्ञानिक समुदाय इसे केवल क्षेत्रीय बीमारी नहीं बल्कि संभावित वैश्विक चुनौती के रूप में देख रहा है।
बड़े शहरों तक पहुंचा संक्रमण, वैश्विक अलर्ट जारी

डब्ल्यूएचओ प्रमुख टेड्रोस एडहानोम घेब्रेयेसस ने चेतावनी दी है कि कांगो और युगांडा में संक्रमण की तेज रफ्तार तथा इसका बड़े शहरों तक पहुंचना गंभीर चिंता का विषय है। विशेष रूप से युगांडा की राजधानी कम्पाला जैसे घनी आबादी वाले क्षेत्रों में संदिग्ध मामलों की मौजूदगी ने खतरे को और बढ़ा दिया है।
हालांकि डब्ल्यूएचओ ने स्पष्ट किया है कि स्थिति अभी महामारी (पेंडेमिक) की श्रेणी में नहीं पहुंची है, लेकिन वायरस की घातक प्रकृति और उच्च मृत्यु दर को देखते हुए पूरी दुनिया को सतर्क रहने की सलाह दी गई है।
क्या है इबोला वायरस?
इबोला कोई नया वायरस नहीं है। वैज्ञानिक रूप से इसे “इबोला ऑर्थोएबोलावायरस” कहा जाता है। इसकी पहचान पहली बार 1976 में अफ्रीका के ज़ैरे (अब डीआरसी) और सूडान में हुई थी। उस समय यह बीमारी अत्यधिक घातक साबित हुई थी।
इसके बाद भी अफ्रीका के कई देशों में समय-समय पर इसके प्रकोप सामने आते रहे। वर्ष 2014-16 में पश्चिमी अफ्रीका में फैले इबोला संकट ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया था, जिसमें हजारों लोगों की मौत हुई थी।
वर्तमान में फैला “बुंडीबुग्यो स्ट्रेन” वायरस का एक दुर्लभ रूप है, जिसके उपचार और नियंत्रण संबंधी संसाधन बेहद सीमित हैं।
कैसे फैलता है संक्रमण?
विशेषज्ञों के अनुसार इबोला वायरस मुख्य रूप से संक्रमित जंगली जानवरों से इंसानों में पहुंचता है। फ्रूट बैट यानी चमगादड़ों को इसका प्राकृतिक वाहक माना जाता है।
इसके बाद यह वायरस संक्रमित व्यक्ति के खून, लार, पसीना, उल्टी, मल या अन्य शारीरिक तरल पदार्थों के संपर्क से फैलता है। संक्रमित व्यक्ति की देखभाल करने वाले परिजन, स्वास्थ्यकर्मी और अंतिम संस्कार से जुड़े लोग सबसे अधिक जोखिम में रहते हैं।
दूषित मेडिकल उपकरण, संक्रमित सुई और संक्रमित जंगली जानवरों के मांस के सेवन से भी संक्रमण तेजी से फैल सकता है।
बेहद खतरनाक हैं लक्षण
इबोला वायरस के लक्षण 2 से 21 दिनों के भीतर दिखाई देते हैं। शुरुआत तेज बुखार, सिरदर्द, कमजोरी और मांसपेशियों में दर्द से होती है। इसके बाद उल्टी, दस्त, पेट दर्द और त्वचा पर चकत्ते जैसे लक्षण उभरते हैं।
गंभीर मामलों में शरीर के अंदरूनी अंगों में रक्तस्राव शुरू हो जाता है तथा मुंह, नाक और मसूड़ों से खून आने लगता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार विभिन्न स्ट्रेनों में इसकी मृत्यु दर 30 प्रतिशत से लेकर 90 प्रतिशत तक देखी गई है। वर्तमान बुंडीबुग्यो स्ट्रेन में भी मृत्यु दर 30 से 50 प्रतिशत के बीच आंकी जा रही है।
130 से अधिक मौतें, वास्तविक आंकड़े ज्यादा होने की आशंका
कांगो और युगांडा में सैकड़ों संदिग्ध मामले सामने आए हैं और 130 से अधिक मौतों की पुष्टि हो चुकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि दूरदराज क्षेत्रों में सीमित स्वास्थ्य सुविधाओं और कमजोर रिपोर्टिंग व्यवस्था के कारण वास्तविक आंकड़े इससे कहीं अधिक हो सकते हैं।
अंतरराष्ट्रीय यात्रा नेटवर्क से जुड़े शहरों तक संक्रमण पहुंचने से दुनिया की चिंता और बढ़ गई है।
वैक्सीन और उपचार का अभाव सबसे बड़ी चुनौती
डब्ल्यूएचओ ने कहा है कि वर्तमान स्ट्रेन के लिए न तो कोई स्वीकृत वैक्सीन उपलब्ध है और न ही कोई सुनिश्चित उपचार। हालांकि कुछ प्रायोगिक दवाओं और वैक्सीन पर शोध जारी है, लेकिन वे अभी व्यापक उपयोग के लिए तैयार नहीं हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संक्रमण को शुरुआती चरण में नियंत्रित नहीं किया गया तो यह वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।
भारत पूरी तरह सतर्क
भारत सरकार ने भी स्थिति को गंभीरता से लेते हुए स्वास्थ्य मंत्रालय और नागरिक उड्डयन विभाग के माध्यम से विशेष एडवाइजरी जारी की है।
दिल्ली समेत देश के प्रमुख अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर प्रभावित देशों से आने वाले यात्रियों की विशेष स्क्रीनिंग शुरू कर दी गई है। मेडिकल टीमों को अलर्ट पर रखा गया है तथा यात्रा इतिहास की जांच की जा रही है।
सरकार ने निर्देश दिए हैं कि यदि प्रभावित देशों से आने वाले किसी व्यक्ति में 21 दिनों के भीतर बुखार, उल्टी, मांसपेशियों में दर्द या ब्लीडिंग जैसे लक्षण दिखाई दें तो तुरंत स्वास्थ्य विभाग को सूचित किया जाए।
केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव की अध्यक्षता में उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक भी आयोजित की गई, जिसमें सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को तैयार रहने के निर्देश दिए गए। अस्पतालों में आइसोलेशन वार्ड, लैब टेस्टिंग और आपातकालीन चिकित्सा सुविधाओं की समीक्षा की गई।
स्वास्थ्य मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि 22 मई 2026 तक भारत में इबोला का कोई मामला सामने नहीं आया है और स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है।
केवल स्वास्थ्य नहीं, आर्थिक और सामाजिक संकट भी
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इबोला का यह प्रकोप अनियंत्रित होता है तो इसका प्रभाव केवल स्वास्थ्य क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा। कोरोना महामारी की तरह यह वैश्विक अर्थव्यवस्था, रोजगार और सामाजिक व्यवस्था पर भी गंभीर असर डाल सकता है।
अफ्रीका के कई देशों में पहले से मौजूद गरीबी, कमजोर स्वास्थ्य सेवाएं और राजनीतिक अस्थिरता इस चुनौती को और गंभीर बना सकती हैं।
जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय असंतुलन भी वजह
विशेषज्ञों का मानना है कि जंगलों की कटाई, जलवायु परिवर्तन और मानव गतिविधियों के विस्तार से ऐसे वायरसों के उभरने की संभावना बढ़ रही है।
जब इंसान वन्यजीवों के प्राकृतिक आवासों में अधिक हस्तक्षेप करता है, तो वायरसों के जानवरों से इंसानों तक पहुंचने का खतरा बढ़ जाता है। कोरोना, निपाह, सार्स और अब इबोला इसी पारिस्थितिक असंतुलन की चेतावनी माने जा रहे हैं।
वैश्विक सहयोग ही सबसे बड़ा समाधान
विशेषज्ञों का कहना है कि कोरोना महामारी से मिले सबक को गंभीरता से लागू करने की आवश्यकता है। वैश्विक स्वास्थ्य एजेंसियों, सरकारों और वैज्ञानिक समुदाय के बीच समन्वय, त्वरित निगरानी, सीमाओं पर सतर्कता और जनता में जागरूकता ही इस संकट को नियंत्रित करने का सबसे प्रभावी तरीका हो सकता है।
अफवाहों और भय के बजाय वैज्ञानिक तथ्यों और सावधानियों पर आधारित दृष्टिकोण अपनाना समय की सबसे बड़ी जरूरत है।
निष्कर्ष
फिलहाल भारत में स्थिति नियंत्रण में है और संक्रमण का कोई मामला सामने नहीं आया है, लेकिन वैश्विक स्तर पर बढ़ती चिंता यह संकेत दे रही है कि दुनिया को इस खतरे को हल्के में नहीं लेना चाहिए।
इबोला का वर्तमान संकट एक बार फिर यह याद दिला रहा है कि वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा केवल किसी एक देश की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरी मानवता की साझा जिम्मेदारी है।
-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र








