हाँ, मैं गरीब किसान के रूप में कॉकरोच हूँ

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खेत, कर्ज और उम्मीद के बीच पिसते किसान की त्रासदी पर तीखा व्यंग्य

डॉ. शैलेश शुक्ला

हाँ, मैं गरीब किसान के रूप में कॉकरोच हूँ। मैं वही जीव हूँ जो हर साल मरता भी है और हर साल फिर खेत में उग आता है। मौसम मुझे मारता है, सरकार मुझे समझाती है, बैंक मुझे धमकाता है, साहूकार मुझे निचोड़ता है, मंडी मुझे लूटती है और समाज मुझे “अन्नदाता” कहकर भाषणों में अमर कर देता है। मैं इस देश का सबसे सम्मानित अपमान हूँ। मंचों पर मेरा जयघोष होता है और वास्तविक जीवन में मेरी जेब में बस मुड़े हुए नोट, खाद का बिल और कर्ज की पर्चियाँ रहती हैं। मैं वह आदमी हूँ जो पूरे देश का पेट भरता है, लेकिन रात में अपने घर में रोटी गिनकर खाता है। और फिर भी मैं जिंदा हूँ। इसलिए नहीं कि मैं मजबूत हूँ, बल्कि इसलिए कि मैं कॉकरोच हूँ — हर आपदा के बाद भी जिंदा बच जाने वाला जीव।

पहले मैं किसान था। अब मैं मौसम विभाग, बैंक, सरकारी योजना, खाद की दुकान, बिजली विभाग, बीमा कंपनी, मोबाइल के कृषि संदेश, मंडी दलाल और चुनावी घोषणा पत्रों के बीच फँसा हुआ एक जीवित प्रयोग हूँ। मेरे दादा बैलों से खेती करते थे। मेरे पिता कर्ज लेकर खेती करते थे। और मैं मोबाइल पर मौसम देखकर कर्ज लेकर खेती करता हूँ। प्रगति देख रहे हैं न? बस आत्महत्या का तरीका आधुनिक हो गया है।

सुबह जब मैं खेत में जाता हूँ तो धरती मुझे माँ नहीं लगती, किस्तों पर ली गई जिम्मेदारी लगती है। ऊपर सूरज ऐसे चमकता है जैसे बिजली विभाग का बकाया नोटिस। खेत में खड़ी फसल को देखकर मैं खुश नहीं होता, डर जाता हूँ। क्योंकि फसल जितनी बड़ी होगी, उतना बड़ा डर होगा — कहीं ओलावृष्टि न आ जाए, कहीं बारिश न रुक जाए, कहीं बारिश ज्यादा न हो जाए, कहीं बीमारी न लग जाए, कहीं मंडी में भाव न गिर जाए। किसान इस देश का शायद इकलौता आदमी है जो अच्छी फसल देखकर भी घबराता है।

कॉकरोच की सबसे बड़ी विशेषता होती है कि वह हर हालत में जीवित रहता है। बिल्कुल मेरी तरह। सूखा पड़े — मैं जीवित। बाढ़ आए — मैं जीवित। फसल चौपट हो जाए — मैं जीवित। सरकार मुआवजा घोषित करे और पैसा रास्ते में ही मर जाए — मैं फिर भी जीवित। मेरी पूरी जिंदगी “अगले सीजन” के भरोसे चलती है। किसान वर्तमान में नहीं जीता। वह हमेशा अगले मौसम में जीता है। और यही उसकी सबसे बड़ी त्रासदी है।

मुझे सबसे अधिक हास्य सरकारी घोषणाओं में आता है। नेता मंच से कहता है — “किसानों की आय दोगुनी होगी।” मैं ताली बजाता हूँ क्योंकि रोऊँगा तो लोग कहेंगे नकारात्मक आदमी है। हर साल कोई नई योजना आती है। योजना का नाम इतना लंबा होता है कि उतने में आधा खेत नापा जा सकता है। अधिकारी कहते हैं — “ऑनलाइन आवेदन कीजिए।” अब उन्हें कौन समझाए कि गाँव में नेटवर्क ढूँढ़ना कई बार पानी ढूँढ़ने से कठिन होता है। और यदि किसी तरह आवेदन हो भी जाए तो पता चलता है कि खाते में २००० रुपये आए हैं। उतने में तो आजकल खाद की दुकान वाला मुस्कुराता भी नहीं।

कॉकरोच अँधेरे में पलता है। किसान आश्वासनों में। चुनाव के समय अचानक पूरा देश किसानमय हो जाता है। नेता खेत में उतरता है। साफ जूते पहनकर कीचड़ में फोटो खिंचवाता है। हाथ में हल पकड़ता है मानो अभी ट्रैक्टर को संस्कृत पढ़ाने वाला हो। पत्रकार पूछता है — “आप किसानों के लिए क्या करेंगे?” नेता कहता है — “किसान देश की रीढ़ है।” और मैं सोचता हूँ — इस देश की रीढ़ इतनी झुक चुकी है कि अब सीधी होने के बजाय टूटने लगी है।

मंडी मेरे जीवन का सबसे बड़ा व्यंग्य है। सालभर खेत में जान तोड़ो, फिर मंडी जाओ और वहाँ पता चले कि तुम्हारी फसल का भाव उतना है जितने में शहर में लोग एक शाम पिज्जा खा लेते हैं। दलाल मुझे ऐसे देखता है जैसे मैं गेहूँ नहीं, अपनी मजबूरी बेचने आया हूँ। वह कहता है — “भाव गिर गया है।” मैं पूछता हूँ — “क्यों?” वह कहता है — “बाजार ऐसा है।” यह “बाजार” भी बड़ा रहस्यमय जीव है। जब किसान बेचता है तब भाव गिर जाता है, और जब वही गेहूँ शहर में पहुँचता है तब महँगाई बढ़ जाती है। बीच का पैसा कहाँ जाता है? शायद उसी जगह जहाँ से चुनावी वादे बनते हैं।

धीरे-धीरे मैंने समझ लिया कि किसान की सबसे बड़ी फसल अनाज नहीं, धैर्य होती है। क्योंकि इस देश में हर आदमी किसान पर निर्भर है, लेकिन किसान किसी पर भरोसा नहीं कर सकता। बीज वाला कहेगा — “उत्तम उत्पादन।” खाद वाला कहेगा — “रिकॉर्ड पैदावार।” बैंक वाला कहेगा — “सरकारी योजना है।” नेता कहेगा — “हम किसानों के साथ हैं।” और अंत में खेत में खड़ा किसान अकेला रह जाएगा — आसमान की तरफ देखते हुए।

मुझे सबसे ज्यादा हँसी तब आती है जब शहर वाले कहते हैं — “गाँव का जीवन कितना शांत होता है।” आ जाइए कभी जून की दोपहर में खेत पर। जब बिजली नहीं होती, नलकूप बंद होता है, सिर पर कर्ज होता है और बादल मोबाइल की राजनीति की तरह आते-जाते रहते हैं। तब समझ आएगा कि गाँव की शांति वास्तव में थकान होती है।

कॉकरोच को मारना कठिन होता है। किसान को उससे भी कठिन। क्योंकि किसान मरता भी है तो खबर बनकर दो दिन जीवित रहता है। फिर देश अगले विवाद में व्यस्त हो जाता है। समाचार चैनल पर बहस बदल जाती है। नेता नया मुद्दा पकड़ लेता है। लेकिन गाँव में वही बूढ़ी माँ बैठी रहती है जिसकी आँखों में बैंक का नोटिस और बेटे की तस्वीर साथ-साथ तैरती रहती है।

मुझे सबसे अधिक दर्द बीमा योजना पर आता है। प्रीमियम कट जाता है। फसल खराब हो जाती है। अधिकारी आता है। फोटो खींची जाती है। सर्वे होता है। फाइल बनती है। और अंत में खाते में इतना पैसा आता है कि लगता है सरकार मेरा मजाक उड़ा रही है या सांत्वना दे रही है। एक बार मेरे पड़ोसी को पूरे सीजन की बर्बादी पर इतना मुआवजा मिला कि उसने दुख में हँसना शुरू कर दिया। गाँव वालों ने कहा — “पागल हो गया।” मैंने कहा — “नहीं, सरकारी सहायता प्राप्त किसान हो गया।”

कॉकरोच गंदगी में जीवित रहता है। किसान विरोधाभासों में। टीवी पर कहा जाता है — “देश कृषि प्रधान है।” और उसी देश में किसान का बेटा खेती छोड़कर शहर भागना चाहता है। गाँव में अब बच्चे किसान नहीं बनना चाहते। क्योंकि उन्होंने अपने पिता को खेत में झुकते हुए देखा है, बैंक में हाथ जोड़ते हुए देखा है, मंडी में अपमानित होते देखा है। वे समझ चुके हैं कि इस देश में किसान का सम्मान केवल भाषणों में उगता है।

धीरे-धीरे खेती भी जुआ बन गई है। फर्क बस इतना है कि जुए के अड्डे में आदमी हारकर घर बेचता है और खेती में आदमी घर बचाने के लिए खुद को बेच देता है। बीज महँगा। डीजल महँगा। खाद महँगी। मजदूरी महँगी। लेकिन फसल का भाव तय करेगा कोई और। वाह अर्थव्यवस्था! जोखिम मेरा, नियंत्रण किसी और का।

मुझे सबसे अधिक हास्य तब आता है जब शहर में कोई अभिनेता मिट्टी में पैर रखकर कहता है — “मैं भी किसान का बेटा हूँ।” उसके पीछे १० कैमरे चलते हैं। इधर असली किसान खेत में गिर जाए तो उसे उठाने वाला भी मुश्किल से मिलता है। किसान अब देश का वास्तविक नागरिक कम और भावनात्मक प्रतीक ज्यादा बन चुका है।

मेरे घर की हालत भी किसी सरकारी योजना जैसी है — बाहर से उम्मीद, भीतर से दरार। बच्चे फीस माँगते हैं। पत्नी कहती है — “इस बार छत ठीक करा लो।” बूढ़े पिता दवा माँगते हैं। और मैं आसमान देखता हूँ। किसान का कैलेंडर तारीख से नहीं, मौसम से चलता है। उसकी खुशी मानसून पर निर्भर करती है और उसका भविष्य बादलों की मर्जी पर।

मुझे सबसे अधिक डर अपने बूढ़े हाथों से लगता है। क्योंकि ये हाथ अब मिट्टी से ज्यादा कर्ज उठाते हैं। पहले किसान खेत देखकर गर्व करता था। अब किसान बैंक संदेश देखकर डरता है। मोबाइल बजता है तो लगता है फिर कोई किश्त बाकी है। यह आधुनिक खेती है — खेत में फसल से पहले चिंता उगती है।

मैं मानता हूँ कि खेती केवल दुख नहीं है। खेत में पहली हरियाली देखकर जो सुख मिलता है, वह शहर के वातानुकूलित दफ्तरों में नहीं मिलता। बारिश की पहली बूंद जब सूखी मिट्टी पर गिरती है तो उसकी खुशबू में जीवन होता है। लेकिन दुख यह है कि इस जीवन को जीने वाला आदमी सबसे अधिक असुरक्षित है।

आज मैं पूरी ईमानदारी से स्वीकार करता हूँ — हाँ, मैं गरीब किसान के रूप में कॉकरोच हूँ। मैं सूखे खेतों, फटे कुर्तों, कर्ज की रसीदों, मंडी की धूल, सरकारी वादों और आसमान की बेरुखी के बीच जीवित रहने वाला जीव हूँ। मैं हर साल टूटता हूँ और हर साल फिर बोवाई कर देता हूँ। मैं हर धोखे के बाद भी उम्मीद लगा लेता हूँ। और सबसे बड़ा व्यंग्य यह है कि पूरा देश मेरे नाम पर राजनीति करता है, लेकिन मेरे घर का चूल्हा अब भी मौसम के भरोसे जलता है।

रात में जब गाँव सो जाता है, दूर कहीं कुत्ते भौंक रहे होते हैं, खेत अँधेरे में पड़े रहते हैं, बिजली फिर चली जाती है, और मैं चारपाई पर लेटे-लेटे अगले मौसम का हिसाब लगा रहा होता हूँ — तब कभी-कभी सचमुच लगता है कि मैं इंसान नहीं रहा।

मैं इस कृषि प्रधान देश की दरारों में जीवित रहने वाला एक थका हुआ, कर्ज में डूबा, उम्मीद से चिपका हुआ गरीब किसान कॉकरोच बन चुका हूँ।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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