परिसीमन के बहाने सत्ता साधने की कोशिश नाकाम, महिला आरक्षण के नाम पर राजनीतिक भ्रम फैलाने का आरोप
बादल सरोज

नई दिल्ली। लोकसभा ने 17 अप्रैल की शाम एक ऐसे संशोधन विधेयक को खारिज कर दिया, जिसे विपक्ष ने देश के संघीय ढांचे और लोकतांत्रिक संतुलन के लिए खतरा बताया। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के बीच बुलाए गए विशेष सत्र में केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तुत 131वां संशोधन विधेयक, लोकसभा की सीटों के परिसीमन से जुड़ा था, जिसमें सदन की कुल संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव था।
इस प्रस्ताव के तहत राज्यों के लिए 815 और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 35 सीटों का प्रावधान किया गया था। आलोचकों का कहना था कि यह कदम 2001 के 84वें संविधान संशोधन की उस व्यवस्था को दरकिनार करता है, जिसके अनुसार परिसीमन 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के पश्चात ही संभव है। साथ ही, यह 2023 के 106वें संशोधन—महिला आरक्षण कानून—के उस प्रावधान से भी टकराता है, जिसमें आरक्षण को नई जनगणना और परिसीमन के बाद लागू करने की बात कही गई है।
विपक्ष का तर्क: प्रतिनिधित्व या राजनीतिक संतुलन?

विपक्ष का आरोप है कि सरकार की मंशा जन-प्रतिनिधित्व बढ़ाने की नहीं, बल्कि आगामी चुनावों से पहले राजनीतिक समीकरणों को अपने पक्ष में साधने की है। केवल जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण क्षेत्रीय संतुलन को प्रभावित कर सकता है और इससे संघीय ढांचे पर दीर्घकालिक असर पड़ने की आशंका जताई गई।
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि लोकसभा और राज्यसभा के बीच वर्तमान संतुलन (लगभग 2.2:1) बदलकर 3.3:1 होने से राज्यों के प्रतिनिधित्व वाली संस्था राज्यसभा की भूमिका कमजोर हो सकती है।
नारी वंदन बनाम राजनीतिक विमर्श
विधेयक के खारिज होने के बाद सत्तारूढ़ दल ने इसे महिला आरक्षण के विरोध के रूप में प्रस्तुत किया। विपक्ष ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि परिसीमन विधेयक और महिला आरक्षण कानून दो अलग-अलग विषय हैं, जिन्हें मिलाकर पेश किया जा रहा है।
राजनीतिक हलकों में इस मुद्दे पर तीखी बयानबाजी देखने को मिली। सत्ता पक्ष ने जहां इसे महिला सशक्तिकरण के खिलाफ कदम बताया, वहीं विपक्ष ने इसे “भ्रामक प्रचार” करार दिया।
मीडिया की भूमिका पर सवाल
आलेख में मीडिया की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि कुछ मीडिया संस्थानों ने तथ्यों की स्वतंत्र जांच के बजाय राजनीतिक नैरेटिव को ही आगे बढ़ाया। यह लोकतांत्रिक विमर्श की गुणवत्ता के लिए चिंता का विषय बताया गया है।
महिला अधिकारों पर व्यापक बहस की जरूरत
लेख में यह भी कहा गया है कि महिला सम्मान और अधिकारों का मुद्दा केवल विधेयकों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि समाज और राजनीति के व्यापक व्यवहार में भी झलकना चाहिए। महिला सुरक्षा, न्याय और समानता से जुड़े मुद्दों पर ठोस और निरंतर प्रयास आवश्यक हैं।
निष्कर्ष
लोकसभा में इस विधेयक की अस्वीकृति ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि संसद केवल संख्या का खेल नहीं, बल्कि संवैधानिक संतुलन और व्यापक सहमति का मंच है। महिला सशक्तिकरण जैसे महत्वपूर्ण विषयों को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठाकर देखने की जरूरत है, ताकि वास्तविक सुधार सुनिश्चित किए जा सकें।








