मंदिर प्रवेश से लेकर सामाजिक मानसिकता तक—नारी अधिकारों पर सवाल उठाता लेख
चन्द्र प्रभा सूद

महिलाओं को मंदिर में प्रवेश मिलना चाहिए या नहीं—यह आज एक ज्वलंत सामाजिक और वैचारिक मुद्दा बन चुका है। यदि पूजा-अर्चना के लिए महिलाओं को मंदिर में जाने की अनुमति नहीं दी जाती, तो समानता के सिद्धांत के तहत पुरुषों पर भी यही नियम लागू होना चाहिए। स्त्री और पुरुष एक-दूसरे के पूरक हैं, ऐसे में किसी एक को श्रेष्ठ और दूसरे को हीन मानना न केवल अनुचित बल्कि असंवैधानिक भी है।
यह सही है कि शारीरिक रूप से पुरुष अधिक शक्तिशाली हो सकता है, लेकिन आज ज्ञान, विज्ञान, उद्योग और राजनीति—हर क्षेत्र में महिलाएं अपनी क्षमता का लोहा मनवा रही हैं। वे किसी भी दृष्टि से पुरुषों से कमतर नहीं हैं।
पुरुष के जीवन में हर पड़ाव पर स्त्री का योगदान अनिवार्य है—जन्म से लेकर जीवन के हर चरण तक। जहां एक ओर पुरुष के लिए पत्नी के बिना परिवार चलाना कठिन हो जाता है, वहीं स्त्री पति की मृत्यु के बाद भी अपने दायित्वों को बखूबी निभाती है और परिवार को संभाल लेती है।
वेदों और प्राचीन ग्रंथों में कहीं भी ऐसा उल्लेख नहीं मिलता कि महिलाओं को पूजा या धार्मिक स्थलों से वंचित रखा जाए। वैदिक काल में स्त्रियों को समान अधिकार प्राप्त थे और वे हर क्षेत्र में सक्रिय थीं। यह भेदभाव बाद के समय में कुछ संकीर्ण मानसिकता वाले लोगों की देन है, जिन्होंने धर्म की आड़ में समाज में असमानता को बढ़ावा दिया।
हमारे मनीषियों ने स्पष्ट किया है कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए किसी विशेष स्थान या कर्मकांड की आवश्यकता नहीं होती। ईश्वर मनुष्य के भीतर ही वास करता है। यदि स्त्री घर पर रहकर पूजा कर सकती है, तो यही तर्क पुरुषों पर भी लागू होना चाहिए।
आज के आधुनिक युग में भी कई पुरुष महिलाओं की प्रगति को सहज रूप से स्वीकार नहीं कर पाते। वे नहीं चाहते कि स्त्री उनसे आगे निकले। यही कारण है कि कार्यस्थलों पर महिला नेतृत्व को लेकर असहजता देखने को मिलती है और निजी जीवन में भी उनकी स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने की कोशिश होती है।
मंदिर प्रवेश का मुद्दा दरअसल एक प्रतीक मात्र है। इसके पीछे गहरी सामाजिक और मानसिक असमानता छिपी हुई है। कई बार इसे राजनीतिक रूप भी दे दिया जाता है, जिससे मूल मुद्दा पीछे छूट जाता है।
भारतीय संविधान महिलाओं को समानता का अधिकार देता है। ऐसे में जरूरी है कि महिलाएं अपने अधिकारों के प्रति सजग रहें और उन्हें पाने के लिए आगे बढ़ें। साथ ही, यह भी आवश्यक है कि अधिकारों के साथ अपने सामाजिक और पारिवारिक दायित्वों का संतुलन बनाए रखें। नारी मुक्ति के नाम पर उच्छृंखलता न तो समाज के हित में है और न ही स्वयं महिलाओं के।








