“संगीत, लोकगीत और पारंपरिक नृत्यों से सजी शाम, वरिष्ठ नागरिकों ने उत्साह से मनाया फसल उत्सव”

हिसार।
“बैसाखी आई है,
फसल पकी देखो,
खुशियों को लाई है…”
इन्हीं पंक्तियों की जीवंत अनुभूति उस समय साकार हो उठी, जब वानप्रस्थ सीनियर सिटीजन क्लब में बैसाखी का पावन पर्व अत्यंत हर्षोल्लास, उत्साह और गरिमामय वातावरण में मनाया गया। रंग-बिरंगे परिधानों, मधुर संगीत और जोशपूर्ण प्रस्तुतियों ने पूरे प्रांगण को उत्सवधर्मी ऊर्जा से सराबोर कर दिया।

कार्यक्रम का शुभारंभ क्लब के महासचिव डॉ. जे. के. डांग द्वारा सभी सदस्यों के हार्दिक स्वागत से हुआ। अपने संबोधन में उन्होंने बैसाखी के सांस्कृतिक, धार्मिक और कृषि महत्व पर प्रकाश डालते हुए इसे रबी की फसल की खुशी, किसानों के परिश्रम और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक बताया। साथ ही उन्होंने सन् 1699 में गुरु गोबिंद सिंह द्वारा खालसा पंथ की स्थापना का उल्लेख करते हुए इस दिन के ऐतिहासिक महत्व को भी रेखांकित किया।

मंच संचालन डॉ. दवीना अमर ठकराल ने अत्यंत प्रभावशाली ढंग से किया। उन्होंने बैसाखी की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि यह पर्व केवल फसल उत्सव नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, आस्था, परिश्रम और एकता का प्रतीक है। कार्यक्रम के दौरान उन्होंने महान गायिका आशा भोंसले के निधन पर श्रद्धांजलि अर्पित कर दो मिनट का मौन भी रखवाया।
सांस्कृतिक कार्यक्रम की शुरुआत श्रीमती सुषमा गांधी द्वारा प्रस्तुत भजन
“देह शिवा वर मोहे इहे, शुभ कर्मन ते कबहूं न टरौं…”
से हुई, जिसने वातावरण को भक्तिमय बना दिया। इसके पश्चात राज्य प्रसिद्ध गायक डॉ. सैनी ने
“ओए तू रात खड़ी थी छत पे नी, मैं समझा कि चाँद निकला…”
प्रस्तुत कर दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया।

डॉ. कमलेश एवं डॉ. अजीत कुकड़ेजा के युगल गीत “अज सारे छड्ड जंजाल कुड़े…” ने तालियों की गूंज बटोरी, वहीं श्रीमती वीना अग्रवाल और डॉ. एस. एस. धवन ने पंजाबी गीतों के माध्यम से माहौल को और रंगीन बना दिया। हरियाणवी लोकधुन में डॉ. दीप पूनिया ने
“सोने बरगी फसल हमारी…”
प्रस्तुत कर ग्रामीण जीवन की सजीव झलक पेश की।
कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण रहा भंगड़ा प्रदर्शन। श्रीमती राजरानी मल्हान एवं डॉ. सुदेश गांधी ने
“तेरी कनक दी राखी मुंडिया…”
पर जोशीला नृत्य प्रस्तुत कर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इसके बाद राजरानी मल्हान के निर्देशन में समूह भंगड़ा—
“आई बैसाखी सोनियो…”
ने पूरे वातावरण को ऊर्जा और उल्लास से भर दिया। ढोल की थाप पर कई सदस्य स्वयं को रोक नहीं पाए और मंच के साथ जुड़कर नृत्य करने लगे।
समापन की ओर बढ़ते हुए श्री अजीत सिंह ने रागनी “रै जब सिंगारण लागी…” प्रस्तुत की, जिसमें डॉ. आर.पी.एस. खरब, डॉ. मनवीर एवं डॉ. अजीत कुंडू का सराहनीय सहयोग रहा।
कार्यक्रम के दौरान डॉ. दवीना ठकराल ने टप्पों और माहियों के माध्यम से बैसाखी का उल्लास जीवंत बनाए रखा—
“नच ले भांगड़ा पाईए,
खुशियों दे गीत सुनाईए…”
अंत में क्लब के प्रधान डॉ. एस. के. अग्रवाल ने बैसाखी के महत्व पर प्रकाश डालते हुए सभी आयोजकों—विशेषकर डॉ. दवीना ठकराल, डॉ. एम. एस. चौहान, श्री अशोक खट्टर एवं सभी प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया।
कार्यक्रम का समापन पारंपरिक व्यंजनों के साथ हुआ, जिसने इस उत्सव को और भी यादगार बना दिया।








