सिर्फ प्रतिनिधित्व नहीं, वास्तविक सशक्तिकरण जरूरी — कड़े कानून, प्रशिक्षण और पारदर्शिता से ही मिलेगा समाधान
-एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

गोंदिया/नई दिल्ली, 13 अप्रैल 2026 – महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को सशक्त बनाने के उद्देश्य से पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 (106वां संविधान संशोधन) को भारतीय लोकतंत्र का ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है। यह अधिनियम लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित करता है।
लेकिन इस ऐतिहासिक पहल के साथ एक बड़ा सवाल भी खड़ा हो गया है—क्या यह कानून वास्तव में महिलाओं को सशक्त बनाएगा या केवल उनकी संख्या बढ़ाकर वंशवाद और प्रॉक्सी नेतृत्व को बढ़ावा देगा?
प्रॉक्सी नेतृत्व: लोकतंत्र के लिए चुनौती
आलोचकों का मानना है कि ग्रामीण और कई शहरी क्षेत्रों में “सरपंच पति” जैसी प्रवृत्ति पहले से मौजूद है, जहां निर्वाचित महिला प्रतिनिधि के स्थान पर उनके पति या पुरुष रिश्तेदार वास्तविक निर्णय लेते हैं।
एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी का कहना है कि यदि इस प्रवृत्ति को रोकने के लिए सख्त प्रावधान नहीं किए गए, तो यह अधिनियम अपने मूल उद्देश्य से भटक सकता है।
यह स्थिति न केवल महिला सशक्तिकरण को कमजोर करती है, बल्कि लोकतंत्र की मूल भावना — “जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता का शासन” — के साथ भी समझौता है।
सरकार की पहल, लेकिन और सख्ती जरूरी

पंचायती राज मंत्रालय द्वारा “प्रॉक्सी सरपंच को ना कहें” अभियान शुरू किया गया है, जिसका उद्देश्य महिला प्रतिनिधियों को वास्तविक अधिकार दिलाना है।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इसी तरह के सख्त प्रावधान नारी शक्ति वंदन अधिनियम में भी शामिल किए जाने चाहिए।
जरूरी सुधार: केवल आरक्षण नहीं, सशक्तिकरण भी
लेख में पांच महत्वपूर्ण सुधार सुझाए गए हैं:
1. प्रॉक्सी नेतृत्व को अपराध घोषित किया जाए
यदि किसी महिला प्रतिनिधि के अधिकारों का प्रयोग कोई अन्य व्यक्ति करता है, तो अयोग्यता, जुर्माना और कारावास जैसी सजा का प्रावधान होना चाहिए।

2. क्षमता निर्माण (कैपेसिटी बिल्डिंग)
महिला प्रतिनिधियों को प्रशासनिक, वित्तीय और विधायी प्रशिक्षण दिया जाए, ताकि वे आत्मनिर्भर होकर निर्णय ले सकें।
3. डिजिटल पारदर्शिता और निगरानी
बैठकों और निर्णयों की ऑनलाइन रिकॉर्डिंग से प्रॉक्सी हस्तक्षेप को रोका जा सकता है।
4. राजनीतिक दलों की जवाबदेही
उम्मीदवार चयन में पारिवारिक प्रभाव की बजाय योग्यता और सामाजिक योगदान को प्राथमिकता दी जाए।
5. सामाजिक मानसिकता में बदलाव
महिला नेतृत्व को प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि वास्तविक रूप में स्वीकार करने की आवश्यकता है।
लागू होने में समय, लेकिन तैयारी अभी जरूरी
यह अधिनियम तत्काल लागू नहीं होगा। इसके लिए जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होना आवश्यक है, जिसके बाद अनुमानतः 2029 के आम चुनावों से यह प्रभावी हो सकता है।

यही समय है जब इसके ढांचे को मजबूत किया जाए, ताकि यह केवल “संख्यात्मक प्रतिनिधित्व” तक सीमित न रह जाए।
निष्कर्ष: अधूरा सफर, पूरी जिम्मेदारी
16 से 18 अप्रैल 2026 को प्रस्तावित संसद का विशेष सत्र इस दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
यदि इस अधिनियम में प्रॉक्सी नेतृत्व रोकने, पारदर्शिता बढ़ाने और महिलाओं को वास्तविक शक्ति देने के प्रावधान नहीं जोड़े गए, तो यह कानून अपने उद्देश्य से भटक सकता है।
आज सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या हम केवल महिलाओं की संख्या बढ़ाना चाहते हैं, या उन्हें वास्तविक नेतृत्व देना चाहते हैं?
-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यम सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र









