जलियांवाला बाग हत्याकांड : ब्रिटिश औपनिवेशक बर्बरता का प्रतीक

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जलियांवाला बाग हत्याकांड की स्मृति 13 अप्रैल पर विशेष….

प्रदीप कुमार वर्मा

भारतीय स्वाधीनता संग्राम के दौरान मां भारती के सपूतों ने अपनी शहादत दी। इसके अलावा इतिहास के पन्नों पर कई दर्दनाक दास्तान भी दर्ज हैं। जलियांवाला बाग हत्याकांड  भी एक ऐसी ही घटना है,जो ब्रिटिश औपनिवेशक बर्बरता का प्रतीक थी। आज से करीब 107 साल पहले 13 अप्रैल 1919 को पंजाब के जलियांवाला बाग में ब्रिटिश हुकूमत के अफसर द्वारा शांतिपूर्ण तरीके से सभा कर रहे लोगों का सामूहिक नरसंहार किया गया। मानव समाज के लिए दुर्भाग्यपूर्ण इस घटना को आज भी दुनिया जलियांवाला बाग हत्याकांड  के नाम से जानती है। आज भी जलियांवाला बाग में शहीदों पर चलाई गई गोलियों के निशान देखे जा सकते हैं, जिन्हें उनकी याद में संरक्षित किया गया है। आज भी जलियांवाला बाग में वह कुंआ मौजूद है, जिसमें अपनी जान बचाने के लिए लोग कूद गए थे और उसे शहीदी कुंआ कहते हैं। आज देश और दुनिया जलियांवाला बाग हत्याकांड की बरसी के मौके पर स्मृति दिवस मन कर शहीदों को नमन कर रही है।       

पंजाब के जलियांवाला बाग में हुए सामूहिक हत्याकांड की पृष्ठभूमि में रॉलेट एक्ट एक महत्वपूर्ण कारण के रूप में जाना जाता है। वर्ष 1919 लाया गया रोलेट एक्ट एक ऐसा कठोर कानून था जिसे ब्रिटिश सरकार ने भारत में बढ़ते राष्ट्रवादी आंदोलनों को दबाने के लिए लागू किया था। इस कानून के तहत किसी भी व्यक्ति को बिना मुकदमा चलाए गिरफ्तार किया जा सकता था। आरोपित व्यक्ति को वकील रखने का अधिकार नहीं मिलता था। मुकदमे गुप्त रूप से चलाए जाते थे। इसके साथ ही प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सख्त नियंत्रण लगाया गया। कुल मिलाकर यह कानून ब्रिटिश शासन को यह शक्ति देता था कि वह किसी भी भारतीय को बिना ठोस सबूत के जेल में डाल सके। यही बजह थी कि रॉलेक्ट एक्ट ब्रिटिश शासन की दमनकारी नीति का प्रतीक बन गया। इसने भारतीयों को यह एहसास दिलाया कि अब स्वतंत्रता के लिए संगठित संघर्ष ही एकमात्र रास्ता है।       

इसके बाद भारत मे रॉलेक्ट एक्ट का तीव्र विरोध शुरू हो गया। इसी क्रम में 13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के दिन पंजाब के अमृतसर के जलियांवाला बाग में हजारों लोग शांतिपूर्ण सभा कर रहे थे। इसी दौरान ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड डायर लगभग 50 सैनिकों के साथ वहाँ पहुँचा और बिना किसी चेतावनी के भीड़ पर अंधाधुंध गोलियाँ चलाने का आदेश दे दिया। करीब 10 मिनट तक चली इस फायरिंग में सैकड़ों लोग मारे गए और हज़ारों घायल हुए। लोग बचने के लिए इधर-उधर भागे, लेकिन संकरी निकासी और ऊँची दीवारों के कारण फँस गए, जबकि कई लोग कुएँ में कूद गए। यह घटना ब्रिटिश शासन की क्रूरता का प्रतीक बनी और इसने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को और अधिक तेज कर दिया। ब्रिटिश सरकार के मुताबिक इस हत्याकांड में केवल 379 लोग ही मारे गए थे जबकि वास्तविक रूप में यह गिनती एक हजार से ज्यादा मानी जाती है।        

इसके साथ ही करीब सौ लोगों के शव कुएं से बरामद हुए थे जिसमें से 7 हफ्ते का एक मासूम बच्चा भी था जिससे समूची अंग्रेज सरकार शर्मसार हो गई। हत्याकांड के बाद, अमृतसर में दो महीने तक कर्फ्यू लगा रहा और लोगों को मार्शल लॉ के तहत यातनाएं दी गईं। इस घटना के चलते रविंद्र नाथ टैगोर ने भी 1915 में दी गयी नाइटहुड की उपाधि वापस कर दी थी। जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड का 12 वर्ष की उम्र के भगत सिंह के बाल मन पर गहरा असर डाला और इसकी सूचना प्राप्त होते ही भगत सिंह अपने स्कूल से 12 मील पैदल चलकर जालियांवाला बाग़ पहुंच गए थे। इस हत्याकांड के बाद महात्मा गांधी ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ वर्ष 1920 में देशव्यापी असहयोग आंदोलन की शुरुआत की। इस हत्याकांड के बाद में आम भारतीय का अंग्रेजों पर से भरोसा पूरी तरह उठ चुका था और भारतीय स्वाधीनता आंदोलन की लहर अपने चरम पर पहुंच गई।         

जलियांवाला बाग हत्याकांड की जांच को लेकर वर्ष 1919 में ही विलियम हंटर की अगुवाई में बनाए गए कमीशन द्वारा जनरल डायर के अपराधों की जांच पड़ताल शुरू की गई। इसी दौरान 8 मार्च 1920 को कमीशन ने अपनी रिपोर्ट को सार्वजनिक किया तथा 23 मार्च 1920 को जनरल डायर को दोषी करार देते हुए उसको सेवानिवृत्त किया गया। जलियांवाला बाग की घटना औपनिवेशक बर्बरता का प्रतीक थी। कालांतर में ब्रिटिश सरकार ने बहुत बाद में जाकर 2013 में तात्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन की यात्रा के दौरान इस हत्याकांड को ‘शर्मनाक’ घटना के रूप में वर्णित किया। जलियांवाला बाग एक प्रमुख राष्ट्रीय स्मारक के रूप में आज भी मौजूद है। यहाँकी दीवारों पर गोलियों के निशान और शहीदों का कुआं आज भी वहाँ के दर्दनाक इतिहास को याद दिलाते हैं। हर साल 13 अप्रैल को देश और दुनिया से लोग इस स्मारक पर शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए लोग पहुँचते हैं।

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Author: Bharat Sarathi

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