राज्यसभा-विधान परिषद में महिलाओं को आरक्षण से क्यों बाहर रखा गया? आधी आबादी का बड़ा सवाल

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लोकसभा-विधानसभाओं में 33% आरक्षण, लेकिन उच्च सदनों में चुप्पी; प्रतिनिधित्व बनाम राजनीति पर गहराता विवाद

कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

देश की आधी आबादी—महिलाओं—को सशक्त बनाने के नाम पर संसद ने लोकसभा और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण देने का रास्ता तो खोल दिया, लेकिन राज्यसभा और विधान परिषद जैसे उच्च सदनों को इससे बाहर रखकर एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। सवाल उठ रहा है कि क्या यह महज तकनीकी चूक है या इसके पीछे गहरी राजनीतिक रणनीति छिपी है?

मुख्य सवाल जो खड़े हो रहे हैं:
  • क्या महिलाओं की क्षमता और विद्वता पर अब भी संदेह है?
  • क्या आर्थिक और राजनीतिक वर्चस्व वाले वर्गों को ही इन सदनों में प्राथमिकता मिलती है?
  • “जिसकी जितनी आबादी, उसकी उतनी हिस्सेदारी” के तहत 50% आरक्षण क्यों नहीं?
  • पंचायत स्तर पर 50% आरक्षण के बावजूद उच्च सदनों में परहेज क्यों?
आरक्षण पर अलग राय:

भारत सारथी समूह के संपादक ऋषि प्रकाश कौशिक इस पूरी व्यवस्था पर सवाल उठाते हैं। उनका कहना है कि “आरक्षण से योग्यता का क्षरण होता है, और कई बार कम योग्य लोग अवसर पा जाते हैं, जबकि योग्य वंचित रह जाते हैं।”

वे पंचायतों और नगर निकायों का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि कई जगह महिला प्रतिनिधियों के स्थान पर उनके परिवार के पुरुष ही वास्तविक निर्णय लेते हैं। इससे “प्रॉक्सी प्रतिनिधित्व” की समस्या सामने आती है।

कानूनी और राजनीतिक पेच:

महिला आरक्षण से जुड़ा कानून (नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023) केवल लोकसभा और विधानसभाओं पर लागू होता है।

  • राज्यसभा और विधान परिषदें अप्रत्यक्ष चुनाव से बनती हैं
  • इसी कारण इन्हें कानून के दायरे से बाहर रखा गया

परिणामस्वरूप,

  • राज्यसभा में महिलाओं की भागीदारी करीब 13%
  • विधान परिषदों में मात्र 5%

यह आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि उच्च सदनों में महिलाओं की मौजूदगी बेहद सीमित है।

सामाजिक असर और चिंता:

विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि उच्च सदनों में महिलाओं की भागीदारी नहीं बढ़ी, तो

  • नीति-निर्माण में उनका प्रभाव सीमित रहेगा
  • सामाजिक न्याय और समावेशी लोकतंत्र कमजोर होगा
  • पितृसत्तात्मक राजनीति और मजबूत होगी
पंचायत मॉडल: सफलता या सीमित प्रभाव?

73वें संविधान संशोधन के बाद पंचायतों में महिलाओं को 33% (कई राज्यों में 50%) आरक्षण मिला।
सकारात्मक पहलू:

  • महिलाओं की भागीदारी बढ़ी
  • शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा मुद्दों पर संवेदनशील निर्णय

चुनौतियाँ:

  • 60-70% मामलों में “प्रॉक्सी प्रतिनिधित्व”
  • सामाजिक और सांस्कृतिक बाधाएं
  • वास्तविक निर्णय क्षमता सीमित
राजनीतिक गणित भी बड़ा कारण?

विश्लेषकों के अनुसार:

  • राजनीतिक दल अभी जातिगत समीकरण (OBC राजनीति) में उलझे हैं
  • महिला आरक्षण को 50% तक बढ़ाने से नए शक्ति संतुलन बनेंगे
  • इसी कारण उच्च सदनों में आरक्षण पर सहमति नहीं बन पा रही
भविष्य की राह:
  • 2029 के बाद आरक्षण लागू होने की संभावना
  • सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी लंबित
  • उच्च सदनों में आरक्षण के लिए अलग से संवैधानिक संशोधन जरूरी

निष्कर्ष:

राज्यसभा और विधान परिषदों में महिलाओं को आरक्षण से बाहर रखना केवल एक तकनीकी निर्णय नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व के अधूरेपन की कहानी है।
जब तक आधी आबादी को नीति-निर्माण के हर स्तर पर बराबरी का अवसर नहीं मिलेगा, तब तक सशक्तिकरण का दावा अधूरा ही रहेगा।

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Author: Bharat Sarathi

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