क्यूबा के साथ रूस के खड़ा होने से ठिठके अमेरिकी पांव, शीतयुद्ध कालीन परिस्थितियों के अंतर्राष्ट्रीय मायने तरोताजा

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कमलेश पांडेय

क्षेत्रफल के हिसाब से दुनिया का सबसे बड़ा देश रूस ने चीन के प्रत्यक्ष और भारत के परोक्ष मदद से सोवियत संघ युगीन शीत युद्ध कालीन प्रतिष्ठा पुनः हासिल करने की ओर बढ़ चुका है। पिछले दिनों बेनेजुएला और ईरान के विरुद्धसख्त कार्रवाई के बाद मनबढ़ अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंफ ने कहा था कि क्यूबा के साथ मैं जो चाहूंगा करूँगा।  इस बात को रूस ने नोट किया और बेनेजुएला और ईरान की गलतियों से सबक लेते हुए खुलकर क्यूबा के बताते पक्ष में उतर आया और अपना तेल टैंकर भेज दिया, जिसके विरुद्ध कार्रवाई करने का अमेरिका साहस इसलिए नहीं दिखा पाया, क्योंकि रूसी मदद से ईरान ने पश्चिम एशिया और अरब-खाड़ी के मध्य पूर्व देशों में अमेरिकी लंगोट खोलने पर उतारू हो चुका है। इससे अमेरिका एक और नया मोर्चा खोलने से परहेज कर गया। इसके वैश्विक मायने अहम हैं।

अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिज्ञ बताते हैं कि क्यूबा के साथ रूस के समर्थन ने अमेरिका को प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप से रोका, लेकिन ट्रंप प्रशासन ने आर्थिक प्रतिबंधों और दबाव से क्यूबा को कमजोर करने की रणनीति अपनाई। यही वजह है कि वैश्विक स्तर पर यह घटना ‘महाशक्ति प्रतिस्पर्धा’ को दर्शाती है, जहां रूस पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती दे रहा है। उल्लेखनीय है कि ट्रंप ने क्यूबा को “विफल राज्य” बताते हुए नियंत्रण की धमकी दी, लेकिन रूस ने क्यूबा के साथ सैन्य सहयोग समझौते को मंजूरी देकर एकजुटता दिखाई। वहीं, जब क्यूबा ऊर्जा संकट से जूझ रहा है, जहां अमेरिकी प्रतिबंधों ने वेनेजुएला से तेल रोक दिया, पर रूस ने खुलकर समर्थन का ऐलान किया। और अपना तेल टैंकर भेज दिया। इससे अमेरिका को सैन्य कार्रवाई से पीछे हटना पड़ा। 

बताते चलें कि रूस ने अक्टूबर 2025 में क्यूबा के सैन्य बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए विशेषज्ञ भेजे, जो शीत युद्ध जैसी स्थिति पैदा करता है। यह कदम अमेरिका के पड़ोस में रूसी प्रभाव को पुनर्जीवित करता है, खासकर यूक्रेन युद्ध के बीच। रूस क्यूबा को “अटूट एकजुटता” का वादा देकर वैश्विक ध्रुवीकरण को तेज कर रहा है। जबकि अमेरिका ने क्यूबा को “आतंकवाद प्रायोजक” सूची में डालकर आर्थिक घुटन बढ़ाई, लेकिन रूसी समर्थन से प्रत्यक्ष आक्रमण टल गया। बहरहाल, ट्रंप का फोकस लैटिन अमेरिका में चीन-रूस को सीमित करना है, जो पश्चिमी गोलार्ध को अमेरिकी प्रभाव क्षेत्र मानता है। इससे कूटनीतिक दबाव बढ़ा लेकिन सैन्य जोखिम से बचा जा सका।

इस अंतर्राष्ट्रीय घटना के वैश्विक प्रभाव स्पष्ट हैं। यह घटना बहुध्रुवीय दुनिया को रेखांकित करती है, जहां रूस लैटिन अमेरिका में पकड़ मजबूत कर अमेरिकी एकाधिकार तोड़ रहा। वहीं, ईरान, वेनेजुएला जैसे देशों के लिए रूस एक उदाहरण बन चुका है। उसके आचरण के साथ ही यह स्पष्ट हो चुका है की भले ही अमेरिका के खिलाफ खड़े होने पर आर्थिक तबाही मचती है, लेकिन रूसी समर्थन उन्हें सुरक्षा देता है। भारत जैसे उभरते देशों के लिए भी यह सबक है और क्षेत्रीय संघर्षों में महाशक्तियों के बीच का संतुलन बनाए रखना जरूरी होता है। वहीं, यह तनाव वैश्विक ऊर्जा बाजार और आपूर्ति श्रृंखलाओं को प्रभावित कर सकता है।

अतीत पर नजर दौड़ाएं तो क्यूबा संकट के बाद रूस के समर्थन से अमेरिका के पीछे हटने वाली यह घटना शीत युद्ध जैसी नई प्रतिस्पर्धा को पुनर्जीवित करती है, लेकिन बहुध्रुवीय दुनिया में इसका स्वरूप बदला हुआ है। यह ऐतिहासिक समानता की पुनरावृत्ति करता है। मसलन, 1962 के क्यूबा मिसाइल संकट की तरह, रूस का क्यूबा में सैन्य सहयोग अमेरिका के पड़ोस में चुनौती पैदा करता है, जो द्विध्रुवीय तनाव को याद दिलाता है। बता दें कि तब पहले सोवियत मिसाइलों ने परमाणु युद्ध का खतरा बढ़ाया था, और अब ऊर्जा संकट और प्रतिबंधों के बीच रूस की एकजुटता अमेरिका को प्रत्यक्ष कार्रवाई से रोकती है।  इससे शीत युद्ध की “प्रॉक्सी” रणनीति फिर उभरती है।

वहीं, बदलाव की दिशा भी स्पष्ट है। शीत युद्ध के चरम में अमेरिका-सोवियत सीधे टकराव था, लेकिन अब रूस कमजोर होते हुए भी लैटिन अमेरिका में पैठ बढ़ा रहा है, जो अमेरिकी वर्चस्व को कमजोर करता है। ट्रंप की आक्रामकता के बावजूद आर्थिक दबाव पर जोर देना, सैन्य टकराव से बचने का संकेत है, इसलिए शीत युद्ध की तुलना में अब और अधिक सतर्कता की जरूरत है। अन्यथा वैश्विक प्रभाव तय है। क्योंकि यह नया “शीत युद्ध 2.0” बहुध्रुवीय है, जहां चीन-रूस गठजोड़ अमेरिकी एकाधिकार को अपनी कुशल रणनीतियों से तोड़ रहे हैं। यही वजह है कि जहां परमाणु जोखिम घटा, लेकिन साइबर, ऊर्जा और आर्थिक युद्ध बढ़े। खास बात यह कि भारत जैसे देशों के लिए यह अवसर तटस्थता बनाए रखकर लाभ उठाने का है और भारत यही कर रहा है। यह घटना शीत युद्ध को आधुनिक संदर्भ देती है, जहां प्रभाव क्षेत्रीय संघर्ष अब वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को हिलाते हैं। 

आपको पता होना चाहिए कि क्यूबा मिसाइल संकट (1962) ने परमाणु हथियार नीतियों को मौलिक रूप से बदल दिया, क्योंकि दोनों महाशक्तियों को परस्पर सुनिश्चित विनाश (MAD) की वास्तविकता से रूबरू कराया। इसने प्रत्यक्ष टकराव के जोखिम को कम करने के लिए कूटनीति और संचार पर जोर दिया। इससे तात्कालिक बदलाव यह आया कि संकट के बाद मॉस्को-वाशिंगटन हॉटलाइन स्थापित हुई, जो आपातकालीन संवाद सुनिश्चित करती थी। वहीं,1963 में परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (PTBT) पर हस्ताक्षर हुए, जिसने वायुमंडलीय परीक्षण रोके। तब अमेरिका ने क्यूबा पर आक्रमण न करने का वादा किया, जबकि सोवियत ने मिसाइलें हटाईं और तुर्की से अमेरिकी मिसाइलें गुप्त रूप से हटीं। 

इस घटना का रणनीतिक प्रभाव यह हुआ कि यह MAD को व्यावहारिक सिद्धांत बना दिया, जहां दोनों पक्ष जानते थे कि परमाणु युद्ध में कोई विजेता नहीं होगा। लिहाजा अमेरिका ने “लचीली प्रतिक्रिया” नीति अपनाई, जबकि सोवियत ने पहली हड़ताल पर कम जोर दिया। इससे NPT (1968) और SALT वार्ताओं का आधार बना। इसका दीर्घकालिक परिणाम यह हुआ कि शीत युद्ध प्रॉक्सी संघर्षों तक सीमित हो गया, और प्रत्यक्ष परमाणु टकराव टला। वहीं परमाणु हथियारों का उपयोग अस्वीकार्य मानदंड स्थापित हुआ। इससे वैश्विक अप्रसार व्यवस्था मजबूत हुई।यह संकट परमाणु कूटनीति का प्रतीक बन गया। 

मॉस्को-वाशिंगटन हॉटलाइन ने क्यूबा संकट के बाद महाशक्तियों के बीच तत्काल संचार सुनिश्चित कर गलतफहमियों से परमाणु युद्ध का खतरा कम किया। यह शीत युद्ध की कूटनीति में क्रांतिकारी बदलाव साबित हुई, जिसने संकट प्रबंधन को मजबूत किया। इसकी स्थापना का उद्देश्य यह था कि 20 जून 1963 को स्थापित यह टेलीप्रिंटर लिंक वाशिंगटन को मॉस्को से जोड़ता था, क्योंकि क्यूबा संकट में मैसेज पहुंचने में 12 घंटे लगे थे।  इसका लक्ष्य आकस्मिक युद्ध रोकना था, जो दोनों नेताओं को सीधे संवाद की सुविधा देता था। पहले टेलीटाइप से शुरू होकर बाद में डिजिटल रूप में अपग्रेड हुआ। 

इसका प्रमुख प्रभाव यह हुआ कि हॉटलाइन ने संकट स्थिरता बढ़ाई, जैसे 1967 के अरब-इजरायल युद्ध और 1973 यॉम किप्पुर संकट में तनाव कम किया। यह अन्य देशों के बीच भी हॉटलाइन समझौतों का मॉडल बनी, जैसे फ्रांस के साथ। वहीं परमाणु कूटनीति में विश्वास निर्माण का प्रतीक बनी। जहां तक वैश्विक परिणाम की बात है तो गलतफहमी आधारित युद्धों की संभावना घटी, शीत युद्ध प्रॉक्सी संघर्षों तक सीमित रहा। यह आज भी अमेरिका-रूस के बीच सक्रिय, आधुनिक संकटों (जैसे यूक्रेन) में उपयोगी साबित हुआ। परमाणु अप्रसार और संवाद की वैश्विक मानदंड स्थापित किए। यह हॉटलाइन परमाणु युग की संचार क्रांति का प्रतीक है। 

देखा जाए तो मॉस्को-वाशिंगटन हॉटलाइन (1963) के बाद कई नए संचार समझौते हुए, जो महाशक्तियों के बीच गलतफहमियों से परमाणु संकट रोकने के लिए बने। इनका प्रभाव शीत युद्ध से आगे आधुनिक कूटनीति तक फैला। इससे जुड़े प्रमुख समझौते हुए।1967 में दूसरी हॉटलाइन स्थापित हुई। उपग्रह-आधारित प्रणाली जो मौसम और तकनीकी खराबी से प्रभावित न हो। वहीं,1971 में आपात संचार व्यवस्था बनी। परमाणु संकट में तत्काल संपर्क के लिए संशोधित समझौता हुआ। वहीं, 1988 में गोर्बाचेव-रीगन समझौता हुआ, जिसके तहत डिजिटल लिंक को क्रिप्टेड बनाया गया। वहीं अन्य देशों के समझौते हुए।क्योंकि हॉटलाइन मॉडल ने वैश्विक स्तर पर प्रभाव डाला। अमेरिका-चीन हॉटलाइन (1998, 2008 में अपग्रेड)। भारत-पाकिस्तान हॉटलाइन (1989 के बाद DGMO स्तर पर)। भारत-चीन सीमा हॉटलाइन (2021 में स्थापित) हुए। इसका दीर्घकालिक प्रभाव यह हुआ कि परमाणु संकट प्रबंधन का वैश्विक मानक बना, जो यूक्रेन संकट (2022+) में भी सक्रिय रहा। साइबर युग में सुरक्षित संचार प्रोटोकॉल विकसित हुए। द्विपक्षीय तनाव वाले देशों में विश्वास निर्माण को बढ़ावा दिया गया। ये समझौते परमाणु युग की कूटनीति के आधार बने। 

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Author: Bharat Sarathi

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