जेलों में मौतें,आत्महत्याएं,अव्यवस्थाएं -सलाखों के पीछे भी असुरक्षित जीवन?- सुप्रीम कोर्ट का नोटिस

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राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग का स्वतःसंज्ञान-जेल व्यवस्था, मानवाधिकार और न्याय प्रणाली पर वैश्विक प्रश्नचिन्ह

ज़ेलों में विचाराधीन कैदी-न्याय से पहले सजा?क्या हम वास्तव में न्याय कर रहे हैं या एक और अन्याय को जन्म दे रहे हैं?

सजा का उद्देश्य प्रतिशोध नहीं, बल्कि सुधार और पनर्वास होना चाहिए।सलाखों के पीछे भी सेफ नहीं?यह प्रश्न हमें आत्ममंथन करने के लिए मजबूर करता है

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर आधुनिक लोकतांत्रिक समाज में जेलों का उद्देश्य केवल अपराधियों को दंडित करना नहीं, बल्कि उन्हें सुधारना और पुनर्वास के लिए तैयार करना भी होता है। किंतु जब यही जेलें भय, बीमारी और उपेक्षा का केंद्र बन जाएं, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है क्या हम वास्तव में न्याय कर रहे हैं या एक और अन्याय को जन्म दे रहे हैं? “सलाखों के पीछे भी सेफ नहीं?” यह केवल एक भावनात्मक प्रश्न नहीं, बल्कि एक कठोर वास्तविकता का दर्पण है।अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के अनुसार कैदियों से उनकी स्वतंत्रता छीनी जा सकती है, परंतु उनके जीवन, स्वास्थ्य और गरिमा का अधिकार नहीं। फिर भी भारत सहित दुनिया के कई देशों में जेलों की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। संयुक्त राष्ट्र के “नेल्सन मंडेला नियम” स्पष्ट रूप से कैदियों के मानवीय व्यवहार, स्वास्थ्य सुविधाओं और सम्मानजनक जीवन की गारंटी देते हैं, लेकिन व्यवहारिक धरातल पर इन सिद्धांतों और वास्तविकता के बीच गहरी खाई दिखाई देती है।

जेलों में भीड़: एक गंभीर संरचनात्मक संकट

भारत की जेल व्यवस्था की सबसे बड़ी समस्या है—क्षमता से अधिक भीड़। कई राज्यों में जेलों की ऑक्यूपेंसी दर 150% से 200% तक पहुंच चुकी है। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में यह समस्या अत्यंत गंभीर है।इस भीड़ का प्रमुख कारण है विचाराधीन कैदियों की अत्यधिक संख्या। आंकड़ों के अनुसार लगभग 73.5% कैदी ऐसे हैं जिनका अभी दोष सिद्ध नहीं हुआ है और वे केवल न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार कर रहे हैं। यह स्थिति न्यायिक प्रणाली की धीमी गति और लंबित मामलों का प्रत्यक्ष परिणाम है।

विचाराधीन कैदी: न्याय से पहले सजा?

विचाराधीन कैदी वे होते हैं जिन्हें अदालत ने अभी दोषी नहीं ठहराया है, फिर भी वे वर्षों तक जेल में बंद रहते हैं। यह स्थिति “निर्दोषता की धारणा” के सिद्धांत के विपरीत है।कई बार ऐसा भी होता है कि कोई व्यक्ति अपनी संभावित सजा से अधिक समय जेल में बिता देता है। यह न केवल उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता पर भी गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।यह स्थिति हमें सोचने पर मजबूर करती है—क्या हम न्याय दे रहे हैं, या न्याय के नाम पर अन्याय को संस्थागत बना रहे हैं?

स्वास्थ्य सेवाएं और मौतें: एक मानवीय संकट

जेलों में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति अत्यंत दयनीय है। लगभग 30-40% चिकित्सा पद खाली हैं। कई जगहों पर 200 कैदियों पर केवल एक डॉक्टर उपलब्ध है।

भीड़भाड़ और अस्वच्छता के कारण टीबी, एचआईवी और हेपेटाइटिस जैसी बीमारियां तेजी से फैलती हैं। वर्ष 2024 के पहले नौ महीनों में न्यायिक हिरासत में 1,558 मौतें दर्ज की गईं—यह आंकड़ा केवल संख्या नहीं, बल्कि एक गंभीर मानवीय संकट का संकेत है।

इन मौतों के पीछे प्रमुख कारण हैं बीमारियां, आत्महत्याएं और चिकित्सा सुविधाओं की कमी।

छत्तीसगढ़ का मामला: एक राज्य, कई सवाल

छत्तीसगढ़ की जेलों में पिछले चार वर्षों में 285 कैदियों की मौत का मामला देश को झकझोर देने वाला है। इनमें से 90 मौतें केवल 2022 में हुईं और 66 मौतें जनवरी 2025 से जनवरी 2026 के बीच दर्ज की गईं।इस पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने स्वतः संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार से रिपोर्ट मांगी है। आयोग ने भीड़भाड़, डॉक्टरों की कमी और प्रशासनिक लापरवाही को संभावित कारण बताया है। यदि ये आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन माना जाएगा।

न्यायपालिका की सक्रियता: सुधार की दिशा में कदम

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को जेलों की स्थिति पर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने जेलों की क्षमता, भीड़भाड़ और विशेष रूप से महिला कैदियों की स्थिति पर जानकारी मांगी है।यह कदम दर्शाता है कि न्यायपालिका इस मुद्दे को गंभीरता से ले रही है। महिला कैदियों और उनके बच्चों की स्थिति पर ध्यान देना एक सकारात्मक और मानवीय पहल है।

मानसिक स्वास्थ्य और आत्महत्याएं: अदृश्य संकट

जेलों में मानसिक स्वास्थ्य एक बड़ा लेकिन अक्सर अनदेखा मुद्दा है। भीड़भाड़, पारिवारिक दूरी, सामाजिक कलंक और अनिश्चित भविष्य कैदियों को मानसिक रूप से कमजोर बना देता है।इसी कारण जेलों में आत्महत्या के मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है। वैश्विक रिपोर्ट्स भी इस बात की पुष्टि करती हैं कि जेलों में मानसिक तनाव और हिंसा एक गंभीर वैश्विक समस्या बन चुकी है।

संचार और मानवीय संपर्क: सुधार की नई दिशा

कैदियों के मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए संचार के साधनों का विस्तार आवश्यक है। इसी दिशा में वीडियो और ऑडियो कॉल के माध्यम से परिवार से संपर्क की अनुमति देने जैसे प्रस्ताव सामने आए हैं।

यह पहल कैदियों को मानसिक रूप से सशक्त बनाए रखने और उनके सामाजिक संबंधों को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। आधुनिक तकनीक जेल सुधार का प्रभावी माध्यम बन सकती है।

सुधार के लिए आवश्यक कदम

(1)जेल सुधार के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण आवश्यक है(2)न्यायिक प्रक्रिया को तेज करना और फास्ट-ट्रैक अदालतों का विस्तार(3)जेलों की क्षमता बढ़ाना और नए सुधार गृहों का निर्माण(4) स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना और डॉक्टरों की भर्ती (5)मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तारकैदियों के लिए शिक्षा और कौशल विकास कार्यक्रम जेल प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना

अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य: एक साझा चुनौती

जेलों की बदहाल स्थिति केवल भारत तक सीमित नहीं है। अमेरिका, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और फिलीपींस जैसे देशों में भी इसी तरह की समस्याएं देखने को मिलती हैं।हालांकि, नॉर्वे जैसे देशों ने जेल सुधार के क्षेत्र में उल्लेखनीय उदाहरण प्रस्तुत किए हैं, जहां कैदियों के पुनर्वास और सम्मानजनक जीवन पर विशेष ध्यान दिया जाता है। यह मॉडल अन्य देशों के लिए प्रेरणास्रोत बन सकता है।

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि न्याय का असली अर्थ जेलें किसी भी सभ्य समाज का दर्पण होती हैं। यदि जेलों में मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा है, तो यह पूरे समाज की विफलता का संकेत है।

सजा का उद्देश्य प्रतिशोध नहीं, बल्कि सुधार और पुनर्वास होना चाहिए। “सलाखों के पीछे भी सेफ नहीं?” यह प्रश्न हमें आत्ममंथन के लिए मजबूर करता है।क्या हम एक ऐसे समाज का निर्माण कर रहे हैं जहां न्याय केवल कागजों तक सीमित है, या हम वास्तव में एक मानवीय और न्यायपूर्ण व्यवस्था की ओर बढ़ रहे हैं?समय आ गया है कि जेल सुधार को प्राथमिकता दी जाए, क्योंकि न्याय केवल अदालतों में नहीं, बल्कि जेलों की दीवारों के भीतर भी सुनिश्चित होना चाहिए।

-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

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Author: Bharat Sarathi

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