पिहोवा के गोविंदानंद आश्रम में शतचंडी महायज्ञ की पूर्णाहुति, हर माह जेठे रविवार को होता है कन्या पूजन

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नवरात्र दुर्गापूजा उत्सव में संत समाज और श्रद्धालुओं की भागीदारी, जरूरतमंद कन्याओं की सहायता का भी संकल्प

पिहोवा, 27 मार्च (प्रमोद कौशिक/संजीव कुमारी): शिवपुरी रोड स्थित गोविंदानंद आश्रम में नवरात्र दुर्गापूजा उत्सव के उपलक्ष्य में आयोजित शतचंडी महायज्ञ का आज विधिवत पूर्णाहुति के साथ समापन हुआ। महामंडलेश्वर 1008 स्वामी विद्यागिरि जी महाराज एवं श्रीमहंत बंशी पुरी जी महाराज के मार्गदर्शन और आशीर्वाद में, महंत सर्वेश्वरी गिरि जी महाराज के सानिध्य में चल रहे इस महायज्ञ में संत समाज और बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लेकर पूर्णाहुति डाली।

महंत सर्वेश्वरी गिरि जी महाराज ने जानकारी देते हुए बताया कि आश्रम में पिछले कई वर्षों से हर नवरात्र पर धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता है। इसके साथ ही प्रत्येक माह के जेठे रविवार को आश्रम परिसर में कन्या पूजन का विशेष आयोजन होता है, जिसमें सैकड़ों की संख्या में कन्याएं भाग लेकर प्रसाद ग्रहण करती हैं।

उन्होंने बताया कि आश्रम केवल धार्मिक आयोजनों तक सीमित नहीं है, बल्कि जरूरतमंद कन्याओं की समय-समय पर हर संभव सहायता भी करता है। आश्रम के इन सामाजिक कार्यों से क्षेत्र में एक सकारात्मक संदेश प्रसारित हो रहा है।

आश्रम में आयोजित धार्मिक कार्यक्रमों में देश-विदेश से जुड़े श्रद्धालु भी नियमित रूप से भाग लेते हैं, जिससे इसकी पहचान व्यापक स्तर पर बनी हुई है।

पूर्णाहुति के अवसर पर संत महामंडल की संरक्षक एवं अनेक राज्यों में स्थापित मठ-मंदिर-आश्रमों की परमाध्यक्ष महामंडलेश्वर 1008 स्वामी विद्यागिरि जी महाराज, भारत साधुसमाज के अध्यक्ष श्रीमहंत बंशी पुरी महाराज, षडदर्शन साधुसमाज के अध्यक्ष परमहंस ज्ञानेश्वर, महंत विश्वनाथ गिरी, महंत भीम पुरी, महंत तरण दास, महंत विजय पुरी, वैद्य पण्डित प्रमोद कौशिक, महंत राम अवतार दास, स्वामी हरि नारायण गिरि तथा मुख्यमंत्री के राजनीतिक सलाहकार भारत भूषण भारती सहित अनेक संत एवं श्रद्धालु उपस्थित रहे और आरती में भाग लिया।

आस्था के साथ सेवा का संगम:

जहां एक ओर धार्मिक अनुष्ठान समाज को आध्यात्मिक ऊर्जा देते हैं, वहीं कन्या पूजन और जरूरतमंदों की सहायता जैसे कार्य सामाजिक जिम्मेदारी का सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। गोविंदानंद आश्रम का यह प्रयास धार्मिक परंपरा को सामाजिक सरोकार से जोड़ने का एक प्रेरणादायक मॉडल बनकर उभर रहा है।

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Author: Bharat Sarathi

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