व्यंग्य : गैस की कमी बनाम अधिकता

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इष्ट देव सांकृत्यायन

पता नहीं किन लोगों को भारत में गैस की कमी दिखाई दे रही है। किसी के घर चूल्हा नहीं जल पा रहा तो किसी के होटल में। वह भी उस युग में जबकि मूली बारहमासी हो गई है। भारत के भीतर काम चलाने भर के लिए गैस तो यहीं फेसबुक से पर्याप्त मात्रा में मिल जाएगी। यहाँ इतने बुद्धिजीवी हैं, खासकर साहित्यकार-पत्रकार और विश्वविद्यालय आचार्य वर्ग के बुद्धिजीवी। आप एक बार किसी अच्छे संदर्भ में नाम भर ले लीजिए भाजपा, संघ, मोदी या योगी का… सऊदी अरब के कुएँ भी भाग खड़े होंगे। कभी इस्लामी आतंकवाद की चर्चा करके देखिए। वही गैस तुरंत पेट्रोल में बदल जाएगी।

किताबों के नाम पर इतने पैम्फलेट्स का हवाला दिया जाएगा कि तन-मन तो छोड़िए, आत्मा तक का दाह संस्कार हो जाएगा। थीसिस के नाम पर पैम्फलेट लिखने की जो महान परंपरा अंग्रेजों ने डाली थी, उसे महात्मा जी के चेलों ने तो निभाया ही, अपने को पार्टी विद डिफरेंस कहने वाले डॉक्टर जी के चेले भी पूरी शिद्दत से निभा रहे हैं।

इस पार्टी विद डिफरेंस के लाभार्थी वर्ग के सामने एक बार मोदी की आलोचना करके देख लीजिए। आपको पता चल जाएगा कि आर्य भले बाहर से न आए हों और चाहे भले ही वेदों का अस्तित्व लाखों साल पुराना हो लेकिन हिंदू तो इस देश में केवल और केवल मोदी के कारण आया। मोदी के पहले न तो सवर्ण था और न ही हिंदू था। यह तो आप जानते ही हैं कि राम को मोदी लाए। अगर गैस से भी पतला कोई फॉर्म होता हो द्रव्य का तो वह भी शर्म से मिट्टी-मिट्टी ही जाएगा उनके तथ्यरोधी तर्कों के सामने।

जो इस या उस गिरोह में न हो, उसे तो बुद्धिजीवी माना नहीं जा सकता। वो बौद्धिक मजदूर भले हो, बुद्धिजीवी नहीं हो सकता और जो बुद्धिजीवी है, उससे आप कभी तथ्य और तर्क की उम्मीद करके देख लीजिए। उससे भी कम पड़े तो रेडियो का कान उमेठिए और मन की बात सुन लीजिए। तन से चाहे चमड़ी पूरी उधड़ गई हो और अब भीतर हड्डी खुरची जा रही हो पर बातों से ही आपके मन पर इतने कंबल डाल दिए जाएंगे कि आपको अपने अस्तित्व पर संदेह होने लगेगा। कहीं ऐसा तो नहीं कि मैं कंबल ही हूँ। उसके बाद जो गैस बनेगी… भाई साहब, अकेले आपकी गैस से पूरे देश का काम चल जाएगा।

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Author: Bharat Sarathi

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