जितनी जल्दी अमेरिका, भारत के कूटनीतिक संदेशों को समझ लेगा, उसकी तिलमिलाहट दूर हो जाएगी!

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

कमलेश पांडेय

वैश्विक सम्बन्धों को नया आयाम देने वाले रायसीना डायलॉग 2026 में अमेरिकी उप विदेश मंत्री क्रिस्टोफर लैंडौ के एक बेबाक से अब यह बात साफ हो चुकी है कि जब भारत के दोस्त अमेरिका जैसे हों, तो उसे बर्बाद होने के लिए चीन जैसे आस्तीन के सांपों की भी जरूरत नहीं पड़ेगी। तब शायद यूरोप और रूस मिलकर भी भारत को न बचा पाएं। ऐसा इसलिए कि जो जहर ब्रिटेन और अमेरिका जैसे साम्राज्यवादी देशों के दिलोदिमाग में भरा हुआ है, उससे न तो ब्रिटेन का कल्याण हुआ, न ही अमेरिका का होगा। हां, इनकी क्षुद्र चालों से भारतीय उपमहाद्वीप और अरब-खाड़ी देशों में भयंकर धार्मिक कलह पैदा होगी। हालांकि भारत सरकार भी इन विदेशों हरामखोर चालों से सावधान है और जो जवाबी कूटनीतिक मोर्चेबंदी करती जा रही है, वैसी बानगी अतीत में कभी नहीं दिखती। इसलिए भारत का भविष्य उज्ज्वल है। वह वीर भोग्या वसुंधरा की तर्ज पर वसुधैव कुटुम्बकम और सर्वे भवंतु सुखिनः की राह पर अग्रसर है। समकालीन कलह के लिए अमेरिका-यूरोप की साम्राज्यवादी शह-मात के खेल जिम्मेदार हैं। इसमें जिस तरह से अरब व खाड़ी देश पिस रहे हैं, यूक्रेन से लेकर ईरान तक बर्बादी ही बर्बादी नजर आ रही है, वह भारतीय कूटनीति के लिए एक अलग ही चुनौती पैदा करती जा रही है। लेकिन हमारी जेन-जेड पीढ़ी इतनी जांबाज और कार्यकुशल है कि निकट भविष्य में एक मजबूत भारत का डंका पीट देगी और दुनिया के मुल्क देखते रह जाएंगे।

कहना न होगा कि जिस तरह से रायसीना डायलॉग 2026 में अमेरिकी उप विदेश मंत्री क्रिस्टोफर लैंडौ ने अपने बेबाक अंदाज में कहा कि अमेरिका, भारत को चीन जैसी आर्थिक सुविधाएं नहीं देगा, क्योंकि इससे चीन प्रतिद्वंद्वी बन गया। उनका तातपर्य यह कि चीन के अभूतपूर्व विकास का दंश झेल रहा अमेरिका अब यह कभी नहीं चाहेगा कि भारत भी उसी वैश्विक स्थिति को प्राप्त करे। हालांकि, हमारे दिग्गज

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने इसका तगड़ा जवाब देते हुए स्पष्ट किया कि भारत का उदय (अभ्युदय) अपनी आंतरिक शक्ति और क्षमताओं से होगा, न कि दूसरों की गलतियों पर निर्भर रहकर। इसे अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक बयानबाजी में नहले पर दहले की तरह लिया गया और इसपर गंभीर बहस छिड़ी हुई है।

अमेरिकी उपविदेश मंत्री क्रिस्टोफर लैंडौ ने रायसीना संवाद में चेतावनी दी कि अमेरिका भारत को वह आर्थिक लाभ नहीं देगा जो उसने चीन को दिए थे, क्योंकि इससे चीन वैश्विक प्रतिद्वंद्वी बन गया। उनका यह बयान भारत-अमेरिका आर्थिक संबंधों पर सवाल उठाता प्रतीत होता है। भारतीय विदेश मंत्री जयशंकर ने उनके ईर्ष्यालु बयान के दो दिन बाद दो टूक शब्दों में साफ-साफ कहा कि, “देशों का उत्थान खुद तय होता है। भारत का उदय हमारी ताकत से निर्धारित होगा, न कि दूसरों की गलतियों से।” उन्होंने हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की केंद्रीय भूमिका पर जोर दिया, और इशारा किया कि यहां सहयोग करने वालों को ही अधिक लाभ मिलेगा। यह वैचारिक घटना मार्च 2026 के रायसीना डायलॉग से जुड़ी है, जहां जयशंकर ने भारत की स्वतंत्र नीतियों को रेखांकित किया। यह रूस, चीन, यूरोपीय-संघ, अरब-खाड़ी देशों, जापान-कोरिया, आशियान देशों, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका के देशों, दक्षिण अमेरिका के देशों और कनाडा आदि को वह बेवाक कूटनीतिक संदेश है जो वैश्विक संघर्षों में भारतीय उपमहाद्वीप के प्रभुत्वशाली देश भारत के अंतरराष्ट्रीय महत्व को उजागर करता है। अमेरिका जैसे देश भारत की गुटनिरपेक्षता और रणनीतिक स्वायत्तता की अडिग नीति बौखलाहट दिखा रहे हैं, जो खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे वाली कहावत को चरितार्थ करते हैं।

ऐसा इसलिए कि रायसीना डायलॉग 2026 में अमेरिकी उप विदेश मंत्री क्रिस्टोफर लैंडौ के बयान पर भारत के विदेश मंत्री जयशंकर ने स्पष्ट किया कि भारत का उदय अपनी आंतरिक शक्ति से होगा। उन्होंने कहा कि देशों का उत्थान खुद तय होता है, न कि दूसरों की गलतियों पर निर्भर। जयशंकर ने जोर देकर कहा कि भारत हिंद महासागर क्षेत्र में केंद्रीय भूमिका निभाएगा, जहां सहयोग करने वालों को अधिक लाभ मिलेगा। उन्होंने अमेरिकी चेतावनी को खारिज करते हुए भारत की स्वतंत्र क्षमताओं पर भरोसा जताया। यह जवाब रायसीना डायलॉग के सत्रों के दौरान आया, जहां जयशंकर ने वैश्विक साझेदारियों पर भारत की रणनीति रेखांकित की।

उल्लेखनीय है कि विदेश मंत्री एस जयशंकर ने 2025 में रूस यात्रा के दौरान एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में दो टूक शब्दों में अमेरिकी विदेश नीति को “पेरप्लेक्सेड” (perplexed)/ (कन्फ्यूजिंग या समझ से परे) कहा। इसका कारण स्पष्ट करते हुए जयशंकर ने बताया कि अमेरिका ने पहले भारत को रूस से तेल खरीदने की अनुमति दी थी ताकि वैश्विक ऊर्जा बाजार स्थिर रहे। लेकिन बाद में उसी रूसी तेल खरीद पर भारत पर टैरिफ लगाने की नीति अपना ली, जो विरोधाभासी लगती है। इसलिए अतिरिक्त टिप्पणी करते हुए उन्होंने जोर दिया कि भारत न तो रूसी तेल का सबसे बड़ा खरीदार है (क्योंकि ऐसा चीन है) और न ही एलएनजी (LNG) का (क्योंकि ऐसे यूरोपीय देश हैं), फिर भी भारत पर विशेष रूप से टारगेट क्यों? यह अमेरिकी नीति उनकी समझ से बाहर थी। 

इस बात में कोई दो राय नहीं कि भारत के प्रति अमेरिका का नजरिया पूरी तरह से नकारात्मक नहीं है, बल्कि दोनों देशों के बीच मजबूत रणनीतिक साझेदारी है, लेकिन व्यापार, भू-राजनीति और घरेलू नीतियों पर मतभेद तनाव पैदा करते हैं। इससे व्यापारिक विवाद पैदा होते हैं। ट्रंप प्रशासन ने भारत के रूसी तेल खरीद पर जो 25% टैरिफ लगाया था, उसे भारत ने अपनी संप्रभुता का उल्लंघन बताया। चूंकि अमेरिका भारत से डेयरी और कृषि उत्पादों पर टैरिफ कम करने की मांग करता रहा है, लेकिन भारत ने अपने स्थानीय हितों की रक्षा की है, इसलिए अमेरिकी बौखलाहट स्वाभाविक है। 

जहां तक भू-राजनीतिक मतभेद की बात है तो भारत के रूस और ईरान से रक्षा व ऊर्जा संबंध अमेरिका को चिंतित करते हैं, जिसके कारण प्रतिबंधों की धमकियां दी गईं। वहीं ऐतिहासिक रूप से 1974-98 के परमाणु परीक्षणों पर अमेरिका ने कड़े प्रतिबंध लगाए थे। उसकी मानवाधिकार चिंताएं भी गैरवाजिब हैं क्योंकि अमेरिकी रिपोर्ट्स में भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों, पत्रकारों और असहमतियों पर ‘गंभीर उल्लंघन’ की आलोचना की गई। वहीं खालिस्तानी मुद्दे और आंतरिक राजनीति पर भी बयानबाजी ने तनाव बढ़ाया। इससे अमेरिका को कुछ नहीं हासिल होने वाला है क्योंकि उसके यूरोपीय मित्र तक उससे दूर जाने की राह तलाश रहे हैं। भारत-यूरोपीय संघ के नजदीक आने की एक वजह यह भी है। इसकी खिसियाहट में अमेरिका ने बेनेजुएला और ईरान के राष्ट्रपतियों के साथ जो सुलूक किए, उससे उसकी वैश्विक दबंगई भले बढ़ी, लेकिन भारत में एक कहावत है कि हर गुंडा 12 वर्षों के उत्पात के बाद मारा जाता है। शायद रूस-चीन का शह पाकर मुस्लिम देशों का संघ ओआईसी भी अमेरिका के साथ कुछ यही करें। यह उसके लिए बहुत बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण घटना होगी और इससे यूरोपीय वैभव लौट सकता है। भारत के लिए यह न तो सुखद न ही दुःखद स्थिति होगी।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

Leave a Comment

और पढ़ें

error: Content is protected !!