दो टूक : भारत के सामने मंड़रा रहा तेल गैस और खाद्यान्न का संकट

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राजेश श्रीवास्तव

पश्चिम एशिया में ईरान पर अमेरिका-इज़राइल हमले के बाद बढ़ते युद्ध पर भारत ने अभी तक खामोशी ओढ़ रखी थी लेकिन अब स्थिति मुखर होने को आ गयी है क्योंकि भारत के सामने बड़ा संकट मुंह बाये खड़ा है। यह बात दूसरी है कि भारत अभी भी बच-बचा कर निकलने की रणनीति पर चल रहा है। कल अमेरिका ने जब भारत को रूस से तेल खरीदने की 3० दिन की मोहलत दी तो भारत खामोश रहा लेकिन जब विपक्ष ने हंगामा काटा तो करीब 2० घंटे बाद भारत ने अपना मुंह खोला कि हमको किसी की इजाजत की जरूरत नहीं है, हमें जहां से सस्ता तेल मिलेगा, वहां से खरीदेंगे लेकिन भारत ने अभी भी साफ नहीं किया है कि वह रूस से अभी कितना तेल खरीद रहा है।

वहीं भारत में महंगाई भी सिर उठाने लगी है। रसोई गैंस के घरेलू और कामर्शियल सिलेंडरों में आशातीत बढ़ोतरी के चलते अब आम आदमी इस युुद्ध की तपिश से झुलसने लगा है। भारत के सामने केवल महंगी गैस ही नहीं बल्कि तेल के दामों में भी बढ़ोत्तरी की आंशका बलवती होती दिख रही है। इसी के चलते खाद्यान्न संकट भी गहरायेगा, यह निश्चित दिखायी पड़ रहा है।

ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच चल रहे युद्ध के चलते पश्चिम एशिया के हालात बिगड़ सकते हैं। इस युद्ध का असर तेल और गैस आपूर्ति पर असर पड़ रहा है। कई देशों को खाद्य असुरक्षा और महंगाई का सामना करना पड़ सकता है। यूक्रेन और रूस युद्ध के समय भी स्थिति बिगड़ी थी। ईरान-इजरायल युद्ध के चलते पश्चिम एशिया के हालात की वजह से तेल और गैस आपूर्ति पर असर पड़ रहा है। इसका नतीजा मार्केट पर दिखने लगा है लेकिन, इसके बीच एक और संकट गहरा रहा है – उर्वरक आपूर्ति में कमी। अगर यह बाधा लंबे समय तक जारी रहती है तो दुनिया को खाद्य असुरक्षा और महंगाई का सामना करना पड़ सकता है।

पश्चिम एशिया दुनिया का एक बड़ा उर्वरक उत्पादक क्षेत्र है। वैश्विक यूरिया निर्यात का लगभग 35% होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरता है। इसी रास्ते से दुनिया का 45% सल्फर भी ट्रांसपोर्ट होता है। यूरिया सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला फर्टिलाइजर है, जिसकी वजह से दुनिया का करीब आधा अनाज पैदा होता है। होर्मुज पर ईरान की पहरेदारी के चलते शिपमेंट का आना-जाना बंद है और हर बीतते दिन के साथ सप्लाई चेन टूट रही है। करीब 4 साल पहले, जब यूक्रेन और रूस युद्ध शुरू हुआ था, तब भी इसी तरह की सिचुएशन बनी थी। उस वक्त दो बड़े झटके लगे थे – गेहूं की आपूर्ति में कमी और फर्टिलाइजर्स की कीमतों में तेज उछाल। यूक्रेन और रूस मिलकर गेहूं का करीब 3०% ग्लोबल एक्सपोर्ट करते हैं, जिस पर उस समय एकदम से रोक लग गई थी हालांकि तब जल्द ही रूस से दोनों चीजों का निर्यात जारी रहा। वहीं, भारत जैसे देशों ने गेहूं निर्यात बढ़ा दिया। लेकिन, इस बार सीधे समुद्री मार्ग बाधित होने से स्थिति दूसरी है।

ईरान ने जिस तरह से दूसरे अरब देशों में मौजूद फैसिलिटीज को निशाना बनाया है उससे भी असर पड़ा है। समुद्र के रास्ते होने वाले यूरिया के कुल व्यापार की हिस्सेदारी लगभग 1०% है। इसके एक कॉम्प्लेक्स पर दो दिन पहले ड्रोन अटैक हुआ था जिसके बाद कंपनी ने सल्फर, अमोनिया और यूरिया का प्रॉडक्शन रोक दिया है। ईरान और सऊदी अरब की सप्लाई भी प्रभावित हुई है। फर्टिलाइजर मार्केट शुरू से बेहद संवेदनशील रहा है। चीन जैसे मुल्क अपनी जरूरत को देखते हुए ग्लोबल सप्लाई को प्रभावित करते हैं। नैचुरल गैस भी बड़ा फैक्टर है, जिसकी जरूरत फर्टिलाइजर प्रॉडक्शन में पड़ती है और जिसमें कमी आई है। भारत ने पिछले साल अप्रैल से नवंबर के बीच रेकॉर्ड 7० लाख टन यूरिया आयात किया था। देश अपनी जरूरत का करीब 4०% फर्टिलाइजर पश्चिम एशिया से मंगाता है, यानी उसके लिए स्थिति ज्यादा गंभीर है। अगर किसानों को समय से उर्वरक नहीं मिले, तो असर पहली फसल के साथ ही नजर आने लगेगा। 

विशेषज्ञों का अनुमान है कि उत्पादन 5०% तक कम हो सकता है और इसके नतीजे युद्ध से ज्यादा भयावह होंगे।

तीन मार्च को वैश्विक रेटिग एजेंसी फिच की इकाई बीएमआई ने ‘इंडिया आउटलुक’ रिपोर्ट में कहा कि पश्चिम एशिया में जारी युद्ध से कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि, माल ढुलाई लागत महंगी होने और आपूर्ति श्रृंखला के टूटने जैसे चिताजनक हालातों से भारत के निर्यात और निवेश पर असर होगा। रिपोर्ट के अनुसार, यदि कच्चे तेल की कीमतों में 1० प्रतिशत की वृद्धि होती है, तो भारत की जीडीपी में लगभग ०.3 से ०.6 प्रतिशत तक कमी आ सकती है और निर्यात क्षेत्र की चुनौतियां बढ़ सकती हैं। इस स्थिति को देखते हुए सरकार ने निर्यात से जुड़े मंत्रालयों, निर्यातक संगठनों व शिपिग कंपनियों के प्रतिनिधियों के साथ विशेष बैठक कर निर्यातकों को सहयोग देने के लिए बहुमंत्रालयी सहायता डेस्क स्थापित की और पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति व भंडार की निगरानी के लिए चौबीसों घंटे काम करने वाला कंट्रोल रूम भी बनाया गया है।

ईरान ने वैश्विक शिपिग मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य बंद कर दिया है। इस मार्ग से दुनिया के लगभग 2० प्रतिशत कच्चे तेल और तरल प्राकृतिक गैस की आपूर्ति होती है। इस मार्ग के बाधित होने से वैश्विक ऊर्ज़ा आपूर्ति प्रभावित हो रही है। भारत का लगभग 4० प्रतिशत कच्चा तेल इसी मार्ग से होकर आता है। भारत कच्चे तेल की अपनी जरूरतों का 85 प्रतिशत से अधिक आयात करता है। पांच मार्च को कच्चे तेल की कीमत करीब 83 डॉलर प्रति बैरल के मूल्य पर पहुंच गई। युद्ध के लंबा खिचने पर कच्चे तेल की कीमत 1०० डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती है और इससे पेट्रोल, डीजल व अन्य पेट्रोलियम उत्पाद महंगे होने लगेंगे। चूंकि इस युद्ध से सीधे तौर पर जुड़े हुए अमेरिका, इस्राइल और ईरान सहित युद्ध से प्रभावित पश्चिम एशियाई और यूरोपीय देश भी भारत के प्रमुख निर्यात बाजार हैं, ऐसे में भारत के निर्यातकों की चिताएं बढ़ गई हैं। पश्चिम एशिया जाने वाला माल भारत के घरेलू बंदरगाहों पर जमा होने लगा है। शिपिग कंपनियां चालक दल, कार्गो और जहाजों की सुरक्षा को देखते नए निर्यात आदेश नहीं ले रही हैं। ऐसे में खासतौर से पश्चिम एशिया के देशों में निर्यात घटने की आशंका है।

भारत ने इस वित्तीय वर्ष 2०25-26 में अप्रैल से दिसंबर की अवधि में पश्चिम एशिया के 13 देशों को करीब 5० अरब डॉलर मूल्य की वस्तुओं का निर्यात किया, जो कुल निर्यात का करीब 15 फीसदी है। इन देशों में भारत से होने वाले निर्यात प्रभावित होते हुए दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में भारत को द्बिपक्षीय और मुक्त व्यापार समझौतों का लाभ उठाते हुए निर्यात को आगे बढ़ना होगा। हाल के महीनों में भारत ने कई देशों के साथ व्यापार समझौते किए हैं। भारत को निर्यात बढ़ाने के लिए चिह्नित किए गए करीब 2०० देशों में निर्यात की नई रणनीति के साथ आगे बढ़ना होगा। उम्मीद करें कि सरकार ईरान और इस्राइल-अमेरिका के विस्तारित होते हुए युद्ध की चुनौतियों से निपटने और निर्यात को बेहतर करेगी। 

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Author: Bharat Sarathi

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