अदालत में सख्ती, समाज से संवाद: न्याय पालिका की बदलती छवि

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अमरपाल सिंह वर्मा 

हमारे देश में न्यायपालिका की पहचान लंबे समय तक आम जन से एक निश्चित दूरी से निर्मित होती रही है। जब एक न्यायाधीश के जीवन की कल्पना करते हैं तो उनके अदालत तक सीमित होने, सामाजिक आयोजनों से लगभग अनुपस्थित और आम नागरिकों से औपचारिक दूरी बनाकर रहने की तस्वीर उभरती है। यह दूरी किसी व्यक्तिगत अहंकार का नहीं बल्कि एक सुविचारित न्यायिक परंपरा का हिस्सा रही है। माना जाता रहा है कि जज जितना कम दिखेगा, उसका फैसला उतना ही निष्पक्ष रहेगा। जितना कम बोलेगा, उतनी ही स्पष्टता से वह न्याय मांगती आवाजों को सुनेगा लेकिन समय के साथ यह धारणा बदल रही है।

वर्तमान में राजस्थान के धौलपुर में पदस्थ जिला न्यायाधीश संजीव मागो इस बदलती तस्वीर के फ्रेम में एक ठोस उदाहरण के रूप में नजर आते हैं। उनकी अदालत से आए निर्णय यह स्पष्ट करते हैं कि न्यायिक अनुशासन, सख्ती और कानून के अनुपालन में कोई ढील नहीं है। जहां दोष सिद्ध हुआ, वहां सजा भी उसी अनुपात में दी गई चाहे वह अल्पावधि की सजा हो या कठोरतम दंड। अदालत के भीतर उनका व्यक्तित्व उसी पारंपरिक न्यायिक कसौटी पर खरा उतरता है जिसकी समाज अपेक्षा करता है लेकिन अदालत के बाहर वही न्यायाधीश एक अलग ही दृश्य रचते नजर आते हैं। सुबह स्टेडियम में आम लोगों के साथ दौड़ लगाते हुए कभी युवाओं के साथ, कभी बच्चों के बीच। फिटनेस को जीवन का सहज हिस्सा बनाते हुए, बिना किसी औपचारिकता के। मंच पर बैठकर हार्मोनियम के साथ शास्त्रीय गायन, शेर-ओ-शायरी, गजलों की भावपूर्ण प्रस्तुति और कभी-कभी नृत्य के दृश्य, जो सार्वजनिक मंचों और सोशल मीडिया पर दिखाई देते हैं। यह सब जजों की उस पारंपरिक  छवि से मेल नहीं खाता जिसमें जज को गंभीर, मौन और लगभग अदृश्य माना गया है। सवाल यह नहीं है कि कोई न्यायाधीश गाता है, दौड़ता है या नृत्य करता है बल्कि यह है कि क्या न्यायपालिका की गरिमा केवल दूरी से ही सुरक्षित रह सकती है या फिर वह संयमित सार्वजनिक उपस्थिति के साथ भी कायम रह सकती है?

अब तक न्यायाधीशों को यही इशारा मिलता रहा है कि वे सामाजिक गतिविधियों से दूरी बनाए रखें, आम लोगों के साथ संपर्क को सीमित रखें और सार्वजनिक मंचों पर न्यूनतम नजर आएं। इसका उद्देश्य किसी भी प्रकार के पक्षपात, अपेक्षा या दबाव की संभावना को कम से कम करना ही था।  माना जाता था कि जज भी आखिर इंसान ही हैं और यदि वह आम लोगों के साथ ज्यादा घुले-मिलेंगे, दोस्ताना संबंध बनाएंगे तो कभी इसकी कीमत न्याय को चुकानी पड़ सकती है। इसी वजह से पिछले कई दशकों में हमने जजों को कभी जन संलिप्त भाव में नहीं देखा लेकिन बदलते सामाजिक परिदृश्य में सवाल उठता है कि अगर संलिप्त न होने से यदि निष्पक्ष रहने में मदद मिलती है तो क्या जरूरत से निर्लिप्तता न्यायपालिका को समाज से दूर नहीं कर देती?

वर्तमान में भले ही अदालतें आम जन के लिए न्याय पाने का आखिरी सहारा हैं लेकिन एक मायने में अदालतों में तारीख-दर-तारीख, कठिन भाषा और न्याय की धीमी गति आम नागरिक के लिए पैसे और समय की फिजूलखर्ची का प्रतीक भी बन चुकी है। ऐसे में यदि कोई न्यायाधीश अपने सार्वजनिक आचरण से यह संकेत देता है कि वह समाज से कटा हुआ नहीं है तो क्या उसे न्याय पालिका के हितों के विरुद्ध माना जाए? जज संजीव मागो की सार्वजनिक छवि इसी प्रश्न को जन्म देती है। वह न केवल सार्वजनिक रूप से बल्कि सोशल मीडिया पर भी बराबर सक्रिय हैं। इससे उनकी पहचान उनके निर्णयों से कम और उनके आचरण से अधिक बनती दिखाई देती है। यह उस व्यक्ति की सामाजिक स्वीकृति है जो कठोर न्यायिक फैसले लेने के बावजूद मानवीय और रचनात्मक जीवन जीता है।

एक जज का यह बदलाव सभी को सहज लगे, यह आवश्यक नहीं है। कुछ लोग इसे न्यायिक मर्यादा की पारंपरिक सीमाओं का अतिक्रमण मान सकते हैं तो कुछ इसे नई न्याय पालिका के आत्म विश्वास का संकेत भी समझ सकते हैं। यानी एक ऐसी संस्था, जो अब समाज से संवाद करने से नहीं हिचकती है। संवाद समाज को समझने का माध्यम है जबकि हस्तक्षेप यकीनन न्याय को प्रभावित कर सकता है। यदि कोई न्यायाधीश सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहते हुए भी अपने निर्णयों में पूरी तरह निष्पक्ष और कठोर बना रहता है तो इसे विरोधाभास नहीं बल्कि संतुलन का उदाहरण ही कहा जाएगा।  जज संजीव मागो का सार्वजनिक आचरण यह सोचने के लिए बाध्य करता है कि क्या न्यायपालिका को केवल एक निर्जीव संस्था के रूप में ही देखा जाना चाहिए या फिर उसे संवेदनशील, अनुशासित और सामाजिक यथार्थ से जुड़ा हुआ भी स्वीकार किया जा सकता है?

जज संजीव मागो के रूप में भले ही आज एक चेहरा दिखाई देता हो लेकिन संभव है कि न्यायपालिका के भीतर ऐसे और भी न्यायाधीश हों जो पारंपरिक ‘दूरी’ की छवि से आगे बढक़र संयमित संवाद के माध्यम से समाज को समझना चाहते हों। यदि आने वाले समय में न्यायाधीश अदालत के भीतर कानून के प्रति उतने ही सख्त रहें, जितने अब तक रहे हैं और अदालत के बाहर समाज से सीमित लेकिन संतुलित संपर्क बनाए रखें तो यह परिवर्तन न्यायपालिका की कमजोरी नहीं बल्कि उसकी सामाजिक समझ का विस्तार होगा। ऐसा संतुलन अपनाने से न्यायपालिका की गरिमा कम नहीं होगी बल्कि उसके प्रति आम नागरिक के भरोसे को और गहरा करेगी।   

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Author: Bharat Sarathi

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