कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

लगभग साढ़े चार दर्जन इस्लामिक देशों के संगठन (OIC) के रहते हुए भी इजरायल व अमेरिका ने देश-दुनिया में शरिया प्रेरित इस्लामिक हुकूमत लाने को प्रतिबद्ध शिया मुल्क ईरान को जो खस्ताहाल बना दिए, वह दुनियावी देशों के लिए एक नसीहत के साथ-साथ कूटनीतिक चिंतन का भी विषय है। वहीं, ईरान ने भी इजरायल/अमेरिका और उनके कथित समर्थक विघ्नसन्तोषी ओआईसी के सदस्य देशों में स्थित अमेरिकी/यूरोपीय सैन्य अड्डों के ऊपर ताबड़तोड़ आक्रामक हमले करके यह जतला दिया कि अब्राहम परिवार और मुस्लिम समुदाय के भुलावे में वह नहीं पड़ने वाला!
उधर, चीन, उत्तर कोरिया और रूस का प्रत्यक्ष शह भी ईरान को “बर्बाद” होने से यदि नहीं रोक पाए तो इसके मौलिक कारणों और कूटनीतिक वजहों को गहराई से पड़ताल करके एक एक कर समझने की जरूरत है, ताकि भविष्य की रणनीतिक गलतियों से चेता जा सके। इसलिए पहले यह समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर इस्लामिक देशों के संगठन ने क्यों नहीं दिया ईरान का साथ? इसकी वजहें निम्नलिखित हैं-
पहला यह कि आखिर इस्लाम के झंडाबरदार समझे जाने वाले मुस्लिम देशों की पारस्परिक दुनिया में गहरी आंतरिक फूट क्यों है और उनके आपसी भू-राजनीतिक हित एक दूसरे के विरुद्ध क्यों हैं? क्या शिया-सुन्नी जैसा आंतरिक विभाजन इसकी प्रमुख वजह है, जहां ईरान (शिया बहुल) को सऊदी अरब जैसे सुन्नी देश क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी मानते हैं। आखिर ईरान का हमास, हिजबुल्लाह और हूती जैसे आतंकी गुटों को समर्थन इन देशों के लिए खतरा क्यों पैदा करता है?
दूसरा यह कि क्या ओआईसी (OIC) जैसे मुस्लिम संगठन राजनीतिक व कूटनीतिक बयानबाजी तक ही सीमित रहते हैं, वो भी खासकर भारत और उसके एक केंद्र शासित प्रान्त जम्मू-कश्मीर के विषय में और उसके बाद पाकिस्तान, तुर्की ईरान और सऊदी अरब जैसे चार मजबूत खेमों में बंटे इस्लामिक सदस्य देशों के पारस्परिक हित काफी अलग-अलग हैं। वहीं, इतना भीतरी अंतर्विरोध रहने के बावजूद कभी वो यहूदियों के देश इजरायल को मिटाना चाहते हैं तो कभी हिंदुओं के देश इंडिया/भारत/हिन्दुस्तान को। ईसाई दुनिया से भी इनकी नफरत छिपी नहीं है। लेकिन अपने नापाक उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने जिस क्षद्म युद्ध आतंकवाद का रास्ता चुना, शायद वही अब उनके लिए घातक साबित हो रहा है।
तीसरा यह कि क्या इस्लाम परस्त शासन करने वाला देश ईरान इतना मजबूत हो गया था कि उससे इराक, सऊदी अरब, यूएई, ओमान, कतर, तुर्किये, पाकिस्तान, अफगानिस्तान जैसे कट्टर मुल्कों को खतरा महसूस हो रहा था और इसके लिए सबने खामोशी पूर्वक इजरायल-अमेरिका का साथ दे करके ईरानी धार्मिक तानाशाही खामनेई को निपटवा दिया और ईरान की बर्बादी का ऐसा रास्ता तैयार कर दिया, जो अब उनकी भी परेशानी का सबब बन चुका है।
चौथा यह कि अब्राहम परिवार की एकता यानी अमेरिका समर्थित यहुदी, ईसाई और मुस्लिम देशों की पारस्परिक एकता, जिसके बल पर वह चीन-भारत के बढ़ते वैश्विक कद को निरंतर कतरते रहने की मंशा रखता है, के झांसे में पड़कर सऊदी, यूएई (UAE), कतर, ओमान और जॉर्डन जैसे देशों ने इजरायल/अमेरिका को अपना हवाई क्षेत्र तक दे दिया, क्योंकि उन पर अंतर्राष्ट्रीय अमेरिकी दबाव पड़ा और उससे ये डरकर हिल गए। वहीं इस कूटनीतिक स्थिति का फायदा उठाकर इजरायल-अमेरिका ने अपने चिर शत्रु ईरान को तबाह कर दिया। कल तक जो ईरान पूरे विश्व में शरिया हुकूमत लाने के सपने पाले हुए था, आज वह अपना वजूद बचाने के लिए चीन-रूस की ओर कातर मेमने की तरह निहार रहा है?
पांचवां यह कि ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षा और प्रॉक्सी युद्धनीति के तहत आतंकवादियों को शह देते रहने की नीति ने अरब और खाड़ी स्थित ईरान विरोधी मुस्लिम देशों को इतना भयभीत कर दिया कि उन्होंने ईरान की धृष्टबुद्धि से खुद को अलग कर दिया। यह ठीक है कि OIC ने ईरान पर इजरायली-अमेरिकी हमले की निंदा की, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इससे ईरान अलग-थलग पड़ गया, जबकि फिलिस्तीन मुद्दे पर भी एकता नहीं बनी। वहीं, सऊदी जैसे देश अमेरिका से संबंध बचाने को प्राथमिकता देते हैं। जिसके चलते क्षेत्रीय प्रभाव ईरान के खिलाफ चला गया।
छठा यह कि इजरायल विरोधी पाकिस्तान और तुर्किये तक ने ईरान की हालिया संकट में प्रत्यक्ष सैन्य या मजबूत मदद इसलिए नहीं की क्योंकि उनके अपने रणनीतिक हित, आर्थिक दबाव और क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धाएं प्राथमिकता रहीं। जहां पाकिस्तान ने ईरान पर बाहरी हमले की निंदा करने के साथ नैतिक समर्थन तो दिया, लेकिन सैन्य सहायता से इनकार कर दिया क्योंकि ईरान ने ऐसी कोई मांग ही नहीं की। जबकि उसके परमाणु कार्यक्रम में पहले से ही पाकिस्तान गुप्त मदद (ए.क्यू. खान नेटवर्क के जरिए) करते आया है। इसके बावजूद, पाकिस्तान अमेरिका और सऊदी से संबंध बचाने को प्राथमिकता देता है। भले ही ऐतिहासिक रूप से ईरान ने पाकिस्तान की मदद की, लेकिन अब शिया-सुन्नी विभाजन और अमेरिकी दबाव बाधक हैं। वहीं, तुर्किये के राष्ट्रपति एर्दोगन ने चुप्पी साधी क्योंकि उनका देश नाटो (NATO) सदस्य है और उसके लिए अमेरिका-यूरोप से आर्थिक-रणनीतिक संबंध महत्वपूर्ण हैं। जबकि ईरान से क्षेत्रीय नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा भी रोकती है, जहां तुर्की खुद को इस्लामी दुनिया का केंद्र मानता है। हालांकि आर्थिक कमजोरी ने भी तुर्किये को जोखिम लेने से रोका। सपष्ट है कि मुस्लिम वर्ल्ड के दोनों देश ओआईसी (OIC) जैसे मंचों पर बयानबाजी तक सीमित रहे, लेकिन इजरायल-अमेरिका के खिलाफ एकजुट कार्रवाई करने से दूर रहे, जिससे ओआईसी में ईरान अधिक अलग-थलग हो गया।
सातवां यह कि सऊदी अरब और यूएई ने खुलकर ईरान का विरोध किया क्योंकि शिया-सुन्नी धार्मिक विभाजन, क्षेत्रीय वर्चस्व की होड़ और ईरान की आक्रामक नीतियां उनके लिए बड़ा खतरा बनी हुई हैं। उनके बीच गहरा धार्मिक और वैचारिक टकराव है। सऊदी अरब सुन्नी बहुल देश है और खुद को इस्लाम का केंद्र मानता है, जबकि ईरान शिया क्रांति के बाद से क्षेत्र में शिया प्रभाव फैला रहा है। 2016 में सऊदी द्वारा शिया धर्मगुरु निम्र अल-निम्र की फांसी के बाद संबंध पूरी तरह टूट गए। वहीं यूएई भी ईरान को प्रॉक्सी समूहों (हिजबुल्लाह, हूती) के जरिए अस्थिरता फैलाने वाला देश मानता है।
आठवां, इस्लामिक देशों की अपनी अपनी क्षेत्रीय सुरक्षा चिंताएं हैं। अलबत्ता ईरान के परमाणु कार्यक्रम और यमन, सीरिया में हस्तक्षेप ने सऊदी-यूएई (UAE) को अमेरिका-इजरायल के साथ गठजोड़ करने को मजबूर किया। आलम यह रहा कि सऊदी क्राउन प्रिंस ने खुद ही ट्रंप से मिलकर ईरान विरोधी कार्रवाई को समर्थन दिया। जबकि यूएई ने अपने हवाई क्षेत्र का अप्रत्यक्ष उपयोग करने की इजाजत दी, ताकि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। चूंकि दोनों देश हर बात में अमेरिका से आर्थिक-सैन्य सहायता पर निर्भर हैं और ईरान को कमजोर करके खाड़ी में अपना प्रभुत्व बनाए रखना चाहते हैं। इसलिए उन्होंने शतरंजी चाल ऐसी चली कि ईरान के मनबढ़ शासक उनकी जाल में फंसकर धुं-धू करके जल उठे। वहीं प्रतिक्रिया वश ईरान के जवाबी हमलों (जैसे अरामको रिफाइनरी) ने भी आपसी वैमनस्य बढ़ाया।
नवाँ यह कि शिया-सुन्नी संघर्ष ने ईरान को मध्य पूर्व में अलग-थलग कर दिया क्योंकि यह धार्मिक विभाजन क्षेत्रीय शक्ति संतुलन और भू-राजनीतिक हितों से गहराई से जुड़ गया। इसके ऐतिहासिक जड़ें को समझना जरूरी है, क्योंकि यह दरार पैगंबर मुहम्मद की मृत्यु (632 ई.) के बाद उत्तराधिकार विवाद से शुरू हुई, जहां सुन्नी बहुमत ने अबू बकर को चुना, लेकिन शिया अली (और उनके वंशजों) को अपना नेता मानते रहे। वहीं कर्बला (680 ई.) में इमाम हुसैन की शहादत ने इसे स्थायी जख्म बना दिया, जो ईरान की 1979 शिया क्रांति के बाद राजनीतिक हथियार बन गया। इनकी क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता भी बढ़ी, क्योंकि ईरान ने शिया-बहुल इराक, सीरिया, लेबनान (हिजबुल्लाह), यमन (हूती) में प्रॉक्सी नेटवर्क बनाया, जिसे सऊदी अरब जैसे सुन्नी शक्तियां क्षेत्रीय विस्तार मानती हैं। चूंकि सुन्नी देश (85-90% मुस्लिम आबादी) ईरान को इस्लामिक नेतृत्व का दावेदार नहीं मानते, जिससे ओआईसी (OIC) जैसे मंचों पर एकता टूटती है। इसका हालिया प्रभाव यह पड़ा कि इजरायल-अमेरिका हमलों (2026) में खामेनेई की मौत के बाद भी सऊदी, यूएई (UAE) ने चुप्पी साधी या अप्रत्यक्ष विरोध किया, क्योंकि ईरान के हमास-हूती समर्थन को वे अस्थिरता का कारण मानते हैं। इससे ईरान केवल शिया सहयोगियों तक सीमित रह गया।








