आचार्य डॉ. महेन्द्र शर्मा ‘महेश’

पानीपत। फाल्गुन पूर्णिमा पर मनाया जाने वाला होली का पर्व केवल रंग-गुलाल और उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अनुशासन, ऋतु परिवर्तन और सामाजिक समरसता का संदेश देने वाला महापर्व है। यह विचार श्री गुरु शंकराचार्य पदाश्रित आचार्य डॉ. महेन्द्र शर्मा ‘महेश’ ने व्यक्त करते हुए कहा कि हमें अपने व्रत-उत्सवों का आध्यात्म और विज्ञान समझने की आवश्यकता है, अन्यथा हम उन्हें केवल मनोरंजन तक सीमित कर देते हैं।
पूर्णिमा और मन का विज्ञान
आचार्य महेश के अनुसार पूर्णिमा तिथि के स्वामी चंद्रमा हैं, और चंद्रमा का सीधा प्रभाव मन पर पड़ता है। जैसे समुद्र में ज्वार-भाटा आता है, वैसे ही मन भी पूर्णिमा पर अधिक चंचल और आवेगपूर्ण हो सकता है। होली इसी आवेग को संयमित करने का पर्व है—मन की वृत्तियों को सात्विकता की ओर मोड़ने का अवसर।
संवत्सर का समापन और क्षमा का संदेश
होली को संवत्सर का अंतिम पर्व बताते हुए उन्होंने कहा कि यह बीते वर्ष की भूलों को त्यागकर ‘क्षमा और पुनरारंभ’ का संकल्प लेने का दिन है। भारतीय परंपरा में षोडश संस्कारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जीवन की यात्रा को संस्कारित और अनुशासित बनाने की व्यवस्था प्राचीन ऋषियों, विशेषकर याज्ञवल्क्य द्वारा वर्णित की गई है।
होलिका दहन: पर्यावरण और स्वास्थ्य
होलिका दहन को केवल पौराणिक कथा से जोड़कर न देखें। यह ऋतु परिवर्तन के समय वातावरण को शुद्ध करने का भी प्रतीक है। शिशिर से वसंत में प्रवेश के दौरान शरीर में जड़ता आती है; अग्नि के ताप से शरीर में स्फूर्ति आती है। पारंपरिक मान्यता है कि इससे वातावरण की शुद्धि और शारीरिक संतुलन में सहायता मिलती है।
बासी भोजन की परंपरा
होली के अगले दिन बासी भोजन (पूर्व रात्रि निर्मित) ग्रहण करने की परंपरा को भी आचार्य ने स्वास्थ्य से जोड़ा। पुराने समय में रात्रि की अतिरिक्त रोटियां प्रातः घी या मक्खन के साथ खाने की परंपरा थी, जिसे वे पाचन तंत्र के अनुकूल बताते हैं। उनके अनुसार यह संयम और साधारण जीवनशैली का संदेश भी है।
रंग, संगीत और नृत्य का महत्व
होली पर प्रयुक्त प्राकृतिक रंग—हल्दी, कुमकुम, केसर, चंदन और अबीर—सिर्फ सौंदर्य नहीं, बल्कि सकारात्मक ऊर्जा के प्रतीक हैं। रंग चिकित्सा और मृत्तिका स्नान का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आयुर्वेद में इनका विशेष महत्व है। ढोल-नगाड़ों और संगीत के साथ नृत्य को मानसिक अवसाद दूर करने और सामूहिक आनंद का माध्यम बताया गया।
होलाष्टक और क्षेत्रीय मान्यताएँ
फाल्गुन अष्टमी से पूर्णिमा तक होलाष्टक का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि उत्तर भारत के पंचनद क्षेत्र और पुष्कर में इसकी विशेष मान्यता है। होली का उद्भवस्थल प्राचीन मुल्तान क्षेत्र माना जाता है, इसलिए वहां की परंपराओं का प्रभाव विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग रूप में दिखाई देता है।
पर्वों के विज्ञान को समझें
आचार्य महेन्द्र शर्मा ने कहा कि सनातन परंपरा “जीवेम् शरदः शतम्” के सिद्धांत पर आधारित है, जो दीर्घायु और स्वस्थ जीवन की प्रेरणा देता है। उन्होंने आग्रह किया कि समाज पर्वों के पीछे निहित विज्ञान और आत्मानुशासन को समझे, ताकि अनावश्यक रूढ़ियों से बचा जा सके और होली को हुड़दंग नहीं, बल्कि उमंग, संयम और समरसता के रूप में मनाया जा सके।
— श्री निवेदन
श्री गुरु शंकराचार्य पदाश्रित
आचार्य डॉ. महेन्द्र शर्मा ‘महेश’, पानीपत









