समाज, संस्कार और चरित्र निर्माण को बताया राष्ट्र शक्ति का आधार

कुरुक्षेत्र, 28 फरवरी (प्रमोद कौशिक/संजीव कुमारी)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत ने कहा कि संघ को सही मायने में समझने के लिए उसके कार्य और पद्धति को भीतर से जानना आवश्यक है। केवल बाहर से देखकर या प्रचलित नैरेटिव के आधार पर संघ को नहीं समझा जा सकता।
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के श्रीमद्भगवद्गीता सभागार में आयोजित संघ शताब्दी वर्ष के मध्य प्रमुख जन गोष्ठी को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि समाज, संस्कृति, संस्कार, नैतिकता और श्रेष्ठ आचरण ही संघ के कार्य का मूल आधार हैं। नैतिक मूल्यों, आचरण और पुरुषार्थ के समन्वय से ही स्वस्थ समाज का निर्माण संभव है।
उन्होंने कुटुंब प्रबोधन पर जोर देते हुए कहा कि घरों में “मंगल संवाद” की परंपरा विकसित होनी चाहिए। मन से मन का संवाद ही संस्कार निर्माण का आधार है। केवल उपदेश नहीं, बल्कि संस्कारयुक्त वातावरण व्यक्ति को भटकाव से बचाता है। उन्होंने कहा कि संपन्नता के समय साथ देने वाले अनेक होते हैं, परंतु विपत्ति में साथ खड़ा रहने की शक्ति परिवार और समाज के संस्कारों से आती है।

भागवत ने स्पष्ट किया कि संघ किसी स्पर्धा, विरोध या सत्ता प्राप्ति की भावना से नहीं चला। संघ का उद्देश्य समाज को संगठित कर राष्ट्र के प्रति प्रतिबद्धता का वातावरण बनाना है। उन्होंने बताया कि देशभर में एक लाख से अधिक सेवा कार्य चल रहे हैं, फिर भी संघ स्वयं को केवल सेवा संगठन नहीं मानता। कला, क्रीड़ा, शिक्षा, श्रम और विभिन्न सामाजिक क्षेत्रों में कार्यरत स्वयंसेवक समाज जीवन के विविध आयामों में सक्रिय हैं, परंतु संघ राजनीतिक संगठन नहीं है।
उन्होंने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से लेकर क्रांतिकारी परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि पराधीनता के लंबे कालखंड ने समाज संगठन की आवश्यकता को स्पष्ट किया। संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के जीवन प्रसंगों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि हेडगेवार ने राजनीतिक परिवर्तन से आगे बढ़कर समाज और चरित्र निर्माण को राष्ट्र निर्माण का मूल आधार माना। वर्षों के प्रयोग के बाद उन्होंने एक विशिष्ट कार्यपद्धति विकसित की, जिसके आधार पर संघ की स्थापना हुई।
भागवत ने कहा कि स्थायी परिवर्तन समाज के आचरण और पुरुषार्थ से आता है। महापुरुष प्रेरणा देते हैं, परंतु राष्ट्र का भविष्य संगठित और चरित्रवान समाज तय करता है। संघ स्वयं को उद्धारक नहीं, बल्कि समाज को सक्षम बनाने वाला संगठन मानता है।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल बी.एस. जसवाल ने संघ को मूल्य आधारित संगठन बताते हुए कहा कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके नागरिकों के चरित्र से तय होती है। उन्होंने कहा कि संघ में कोई छोटा-बड़ा नहीं होता और अनुशासन, संस्कार तथा राष्ट्रनिष्ठा उसकी पहचान है।
संघ शताब्दी वर्ष के अंतर्गत आयोजित इस कार्यक्रम में प्रदर्शनी, साहित्य केंद्र और विभिन्न सहयोगी संगठनों की झलक भी प्रस्तुत की गई। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ।








