नागरिक पत्रकारिता: जमीनी हकीकत की सच्ची आवाज

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बाबूलाल नागा

   डिजिटल क्रांति के इस दौर में खबरों का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। कभी न्यूजरूम और बड़े मीडिया संस्थानों तक सीमित रहने वाली पत्रकारिता आज आम नागरिक के हाथों में पहुंच गई है। स्मार्टफोन, इंटरनेट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ने हर जागरूक व्यक्ति को अपनी बात रखने का मंच दिया है। यही परिवर्तन “नागरिक पत्रकारिता” के रूप में भारतीय लोकतंत्र में नई ऊर्जा भर रहा है। आज खबर केवल टीवी स्टूडियो में नहीं बनती बल्कि गांव की चौपाल, कस्बे की सड़क, सरकारी अस्पताल, स्कूल और पंचायत भवन से सीधे जनता तक पहुंचती है।

   नागरिक पत्रकारिता का अर्थ है—आम नागरिक द्वारा सार्वजनिक महत्व की सूचना को तथ्यात्मक और जिम्मेदार तरीके से सामने लाना। इसके लिए किसी प्रेस कार्ड या बड़े मीडिया संस्थान की आवश्यकता नहीं होती। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे फेसबुक, एक्स (ट्विटर), यूट्यूब और स्थानीय डिजिटल समूहों ने सूचना के प्रसार को सहज बना दिया है। परिणामस्वरूप, वह आवाज भी अब सुनी जा रही है जो पहले मुख्यधारा मीडिया तक नहीं पहुंच पाती थी।

   भारत जैसे विशाल और विविधताओं से भरे देश में नागरिक पत्रकारिता का महत्व और बढ़ जाता है। हजारों गांव और कस्बे ऐसे हैं जहां की समस्याएं राष्ट्रीय मीडिया की प्राथमिकता में शामिल नहीं हो पातीं। ऐसे में स्थानीय नागरिक जब अपने क्षेत्र की सड़क, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य या प्रशासनिक लापरवाही से जुड़े मुद्दों को रिकॉर्ड कर साझा करते हैं, तो वे सीधे व्यवस्था को जवाबदेह बनाते हैं। कई बार सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो के बाद प्रशासन को तत्काल कार्रवाई करनी पड़ती है। यह लोकतंत्र की सक्रियता का संकेत है।

   पिछले कुछ वर्षों में कई घटनाओं ने यह साबित किया है कि नागरिक पत्रकारिता बदलाव की ताकत रखती है। सरकारी कार्यालयों में आम लोगों के साथ दुर्व्यवहार, अस्पतालों में अव्यवस्था, राशन वितरण में अनियमितता या स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार—इन सब मामलों में नागरिकों द्वारा साझा की गई जानकारी ने प्रशासनिक कार्रवाई को प्रेरित किया है। यह दर्शाता है कि लोकतंत्र केवल चुनाव तक सीमित नहीं है, बल्कि निरंतर निगरानी और संवाद की प्रक्रिया है।

   मुख्यधारा मीडिया पर अक्सर टीआरपी, विज्ञापन निर्भरता और राजनीतिक प्रभाव के आरोप लगते रहे हैं। ऐसे माहौल में नागरिक पत्रकारिता उन मुद्दों को सामने लाती है जिन्हें कभी-कभी अनदेखा कर दिया जाता है। यह आमजन की सीधी भागीदारी का माध्यम बनकर लोकतंत्र को अधिक सहभागी और पारदर्शी बनाती है। सूचना का अधिकार जैसी व्यवस्थाएं भी जब सक्रिय नागरिकों के हाथ में आती हैं, तो जवाबदेही और मजबूत होती है।

   नागरिक पत्रकारिता का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि यह हाशिए पर खड़े समाज को स्वयं बोलने का अवसर देती है। दलित, आदिवासी, महिलाएं, मजदूर और लैंगिक अल्पसंख्यक समुदाय अपनी बात सीधे समाज के सामने रख पा रहे हैं। इससे सामाजिक न्याय और समानता की दिशा में सकारात्मक संवाद को बल मिला है।

   हालांकि, इस शक्ति के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी है। फर्जी खबरें, अधूरी जानकारी और भावनात्मक उकसावे समाज में भ्रम और तनाव पैदा कर सकते हैं। इसलिए सत्यापन, संतुलन और संवैधानिक मूल्यों की समझ आवश्यक है। डिजिटल साक्षरता और मीडिया नैतिकता पर ध्यान दिए बिना नागरिक पत्रकारिता का प्रभाव उल्टा भी पड़ सकता है। साथ ही, कई नागरिक पत्रकारों को ट्रोलिंग, कानूनी दबाव और धमकियों का सामना भी करना पड़ता है, जो एक गंभीर चिंता का विषय है।

   आज आवश्यकता है कि नागरिक पत्रकारिता तथ्यों, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी पर आधारित हो। यदि आम नागरिक सूचनाओं को साझा करते समय सत्यापन और मर्यादा का पालन करें, तो यह माध्यम लोकतंत्र की रीढ़ साबित हो सकता है।

   नागरिक पत्रकारिता आज के भारत में लोकतंत्र की जीवंत अभिव्यक्ति बन चुकी है। यह जनता को केवल दर्शक नहीं बल्कि सहभागी बनाती है। मोबाइल फोन से उठी यह आवाज़ व्यवस्था को आईना दिखाने का साहस रखती है। यदि इसे नैतिकता और सत्य के साथ आगे बढ़ाया जाए, तो यह भारतीय लोकतंत्र को और अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और जनोन्मुखी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। 

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Author: Bharat Sarathi

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