गुरुग्राम, 24 जनवरी। जिला विधिक सेवा प्राधिकरण गुरुग्राम द्वारा दहेज मृत्यु एवं विवाहित महिलाओं के प्रति क्रूरता से संबंधित हालिया सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय के संबंध में विभिन्न हितधारकों को जागरूक एवं संवेदनशील बनाने हेतु एक कार्यशाला का आयोजन किया गया।

इस कार्यशाला का उद्देश्य दहेज मृत्यु एवं घरेलू हिंसा से जुड़े मामलों के विधिक, सामाजिक एवं संवैधानिक पहलुओं पर जागरूकता बढ़ाना तथा दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 एवं भारतीय दंड संहिता की धारा 304-बी व 498-ए के प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित करना था।
कार्यक्रम में न्यायिक अधिकारी, पुलिस अधिकारी, पैनल अधिवक्ता, अभियोजन अधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता, गैर-सरकारी संगठनों के प्रतिनिधि एवं अन्य हितधारकों ने भाग लिया।
सेमिनार के मुख्य वक्ता एडवोकेट प्रदीप जांगड़ा एवं एडवोकेट सनी रहे, जिन्होंने प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए बताया कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने दहेज को एक गहरी सामाजिक बुराई बताते हुए इसे समाप्त करना संवैधानिक अनिवार्यता बताया है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि विवाह से पूर्व, विवाह के समय या विवाह के पश्चात संपत्ति या मूल्यवान वस्तु की कोई भी मांग दहेज की श्रेणी में आती है तथा “मृत्यु से शीघ्र पूर्व की गई क्रूरता” पर साक्ष्य अधिनियम की धारा 113-बी के अंतर्गत अनुमान लागू होता है।
प्रतिभागियों को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी निर्देशों की भी जानकारी दी गई, जिनमें राज्य प्राधिकरणों एवं विधिक सेवा संस्थाओं से यह अपेक्षा की गई है कि जमीनी स्तर पर कार्यशालाओं एवं जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से जनसामान्य को जागरूक किया जाए, दहेज निषेध अधिकारियों की भूमिका को सुदृढ़ किया जाए, पुलिस एवं न्यायिक अधिकारियों को विशेष प्रशिक्षण प्रदान किया जाए, धारा 304-बी एवं 498-ए से संबंधित मामलों का त्वरित निस्तारण सुनिश्चित किया जाए। कार्यशाला का समापन दहेज मुक्त समाज की स्थापना तथा महिलाओं की गरिमा, समानता एवं न्याय सुनिश्चित करने के सामूहिक संकल्प के साथ किया गया।









