मनरेगा सत्याग्रह: दावे बड़े, ज़मीन खाली — कांग्रेस का प्रदर्शन बन गया औपचारिकता

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बड़े ऐलान, कमजोर अमल: मनरेगा सत्याग्रह में भीड़ नहीं, सवाल ज्यादा

मनरेगा पर आंदोलन या सिर्फ आदेश की खानापूर्ति?

गुरुग्राम। मनरेगा जैसे गरीब और मजदूर वर्ग से जुड़े संवेदनशील मुद्दे पर गुरुग्राम जिला कांग्रेस कमेटी द्वारा किया गया तथाकथित “मनरेगा सत्याग्रह” न तो आंदोलन बन सका और न ही जनता की आवाज़। बड़े-बड़े दावों, प्रेस कॉन्फ्रेंस और शीर्ष नेतृत्व के नाम पर किए गए ऐलानों के बावजूद यह प्रदर्शन पूरी तरह औपचारिकता निभाने तक सिमट कर रह गया।

गौरतलब है कि 19 दिसंबर 2025 को जिला कांग्रेस कार्यालय में राहुल गांधी के निर्देशों का हवाला देते हुए एआईसीसी राष्ट्रीय प्रवक्ता अजय उपाध्याय और प्रदेश अध्यक्ष राव नरेंद्र सिंह की मौजूदगी में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर 21 दिसंबर को बड़े आंदोलन का दावा किया गया था। लेकिन हकीकत यह रही कि 21 दिसंबर 2025 को न्यू कॉलोनी मोड़ स्थित वरिष्ठ नेता सुशील भरद्वाज टूल्लर के कार्यालय के पास किया गया “मनरेगा सत्याग्रह” दो घंटे भी नहीं टिक सका। यह प्रदर्शन 12:30 बजे शुरू होकर करीब पौने दो बजे खत्म हो गया—बिना किसी प्रभाव, बिना किसी संदेश के।

प्रदर्शन में कुछ पदाधिकारियों की औपचारिक उपस्थिति जरूर रही, लेकिन कांग्रेस के कई चर्चित और प्रभावशाली चेहरे पूरी तरह नदारद रहे। गुरुग्राम से सांसद उम्मीदवार राज बब्बर, बादशाहपुर विधायक उम्मीदवार व जिला ग्रामीण अध्यक्ष वर्धन यादव, गुरुग्राम विधायक उम्मीदवार मोहित ग्रोवर, मेयर उम्मीदवार सीमा पाहुजा, पूर्व मंत्री सुखबीर कटारिया, AICC सदस्य कुलराज कटारिया, सीमा हुड्डा सहित किसान कांग्रेस, युवा कांग्रेस, कामगार कांग्रेस, ट्रेड यूनियन, व्यापार सेल और माइनॉरिटी सेल का कोई नामोनिशान नहीं दिखा।

सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि जिन नेताओं की मौजूदगी 19 दिसंबर की प्रेस कॉन्फ्रेंस में थी, वे भी प्रदर्शन के दिन गायब रहे। बड़े आंदोलन के दावे के बावजूद 100 कार्यकर्ता भी नहीं जुट पाए

मनरेगा मजदूरों की रोज़ी-रोटी से जुड़ी योजना है, लेकिन जिस प्रदर्शन को मजदूरों की आवाज़ बताया गया, उसमें मजदूर ही नदारद रहे। न कोई मंत्री, न विधायक और न ही किसी प्रशासनिक अधिकारी के कार्यालय के बाहर प्रदर्शन हुआ। ज्ञापन सौंपने या सरकार तक बात पहुंचाने की कोई ठोस कोशिश भी नजर नहीं आई।

स्थिति यह रही कि प्रदर्शन कब शुरू हुआ और कब समाप्त हुआ, इसकी भनक तक गुरुग्राम की आम जनता को नहीं लगी। इससे यह सवाल उठना लाज़िमी है कि क्या यह कार्यक्रम सिर्फ इसलिए किया गया क्योंकि “ऊपर से आदेश” था?

प्रदर्शन के दौरान कांग्रेस की अंदरूनी गुटबाज़ी भी खुलकर सामने आई। एक ही कार्यक्रम को लेकर जिला शहरी अध्यक्ष और सेवा दल जिला अध्यक्ष द्वारा अलग-अलग प्रेस नोट जारी किए गए। अधिकांश नेता केवल फोटो खिंचवाने और सोशल मीडिया पर सक्रिय दिखने तक सीमित रहे, जबकि ज़मीनी समर्थन पूरी तरह गायब रहा।

यह भी स्पष्ट दिखा कि विधायक उम्मीदवार भी अकेले कार्यक्रम में पहुंचे—न उनके साथ कार्यकर्ता थे, न समर्थक। ऐसे कमजोर और प्रतीकात्मक कार्यक्रम न तो जनता को जोड़ पा रहे हैं और न ही सरकार पर कोई दबाव बना पा रहे हैं।

अब बड़ा सवाल यह है कि क्या गुरुग्राम कांग्रेस की गुटबाज़ी कभी खत्म होगी?
क्या जमीनी और सक्षम नेताओं को संगठन में उचित स्थान मिल पाएगा?
या फिर भाजपा का संगठन और जनसंपर्क इतना मजबूत हो चुका है कि कांग्रेस का हर आंदोलन पहले ही निष्प्रभावी हो जाता है?

जनता से कटे, मजदूरों के बिना और संगठनात्मक एकता से विहीन ऐसे प्रदर्शन न सिर्फ कांग्रेस की संगठनात्मक कमजोरी उजागर करते हैं, बल्कि पार्टी के भविष्य पर भी गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
मनरेगा जैसे मुद्दे पर भी अगर कांग्रेस सड़कों पर असर नहीं छोड़ पा रही, तो यह आत्ममंथन का नहीं, बल्कि सख्त आत्मावलोकन का समय है।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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