भीड़भाड़ वाले प्रतिष्ठानों में सुरक्षा संकट- भ्रष्टाचार की मिलीभगत क़ी संरचनात्मक भूमिका?
भीड़भाड़ वाले कमर्शियल प्रतिष्ठानों में बढ़ता खतरा, भ्रष्टाचार की गहरी जड़ों का परिणाम?-जिलाधीश आधारित निगरानी व्यवस्था की अनिवार्यता ज़रूरी
– एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं

गोंदिया-भारत आज जिस तेज़ी से शहरीकरण, आर्थिक विकास, व्यावसायिक विस्तार और जनसंख्या की सक्रिय भागीदारी के युग से गुजर रहा है, उसी गति से देश के लगभग 780 जिलों में मॉल, मल्टी-स्टोरी बिल्डिंगें, होटल, रेस्टोरेंट, नाइट क्लब, सिनेमाघर, कोचिंग सेंटर, स्कूल, कॉलेज और मनोरंजन स्थल अभूतपूर्व रूप से बढ़े हैं। इन स्थानों पर प्रतिदिन लाखों नागरिक आते हैं। यह विकास आधुनिक भारत की पहचान है, लेकिन इसके बीच एक गहरा और चिंताजनक प्रश्न भी उभरता है—क्या हमारे शहर सुरक्षित हैं? क्या प्रशासनिक निरीक्षण तंत्र पारदर्शी है? क्या भ्रष्टाचार के कारण नागरिकों की जान खतरे में है?
गोवा के नाइट क्लब में हाल ही में लगी भीषण आग, जिसमें 25 लोगों की मृत्यु हुई, इन सवालों का भयावह उत्तर देती है। यह घटना इस बात का चरम उदाहरण है कि देश भर में बड़ी संख्या में ऐसे व्यावसायिक प्रतिष्ठान चल रहे हैं जिनके पास न वैध फायर-सेफ्टी प्रमाणपत्र हैं, न बिल्डिंग बायलॉज का अनुपालन, न ही नगर निकायों से आवश्यक लाइसेंस। यह केवल निरीक्षण की कमी नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार, अवैध लाइसेंसिंग और संबंधित एजेंसियों की मिलीभगत का सीधा परिणाम है। ऐसे में अब समय आ गया है कि कलेक्टर-स्तर पर स्वत: संज्ञान आधारित निरीक्षण प्रणाली लागू की जाए।
भीड़भाड़ वाले प्रतिष्ठानों में…सुरक्षा संकट-भ्रष्टाचार की संरचनात्मक भूमिका
भारत के महानगर ही नहीं, जिला मुख्यालयों तक में आज आधुनिक प्रतिष्ठानों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। लेकिन सुरक्षा मानकों की वास्तविक स्थिति बेहद चिंताजनक है। विभिन्न घटनाओं से यह स्पष्ट हुआ है कि—
- फायर-सेफ्टी ऑडिट वर्षों से नहीं हुए।
- आपातकालीन निकास मार्ग बंद पाए गए।
- स्प्रिंकलर और फायर-अलार्म अनुपस्थित या निष्क्रिय।
- बिल्डिंग बायलॉज का पालन न्यूनतम स्तर पर।
- अत्यधिक भीड़, अवैध निर्माण और अवैध विस्तार सामान्य बात।
- भ्रष्टाचार के चलते फर्जी लाइसेंस जारी होना बेहद सामान्य।
दिल्ली मुंडका हादसा, मुंबई कमला मिल अग्निकांड, सूरत का कोचिंग सेंटर हादसा, और अब गोवा की घटना-हर बड़े हादसे में एक समान तत्व दिखाई देता है: भ्रष्टाचार + लापरवाही + फर्जी लाइसेंस + निरीक्षण का अभाव। जब निचला व मध्यम प्रशासन ही भ्रष्टाचार में लिप्त हो जाए, तो कानून केवल “कागज़” बनकर रह जाता है।
कलेक्टर द्वारा स्वत: संज्ञान आधारित आकस्मिक निरीक्षण -नागरिक सुरक्षा की आवश्यकता
भारत की वर्तमान प्रशासनिक संरचना में कलेक्टर वह अधिकारी होता है जिसके पास-
- भ्रष्टाचार-रोधी शक्तियाँ,
- पुलिस तंत्र पर नियंत्रण,
- तात्कालिक कार्रवाई की क्षमता,
- और किसी भी प्रतिष्ठान का निरीक्षण करने का वैधानिक अधिकार होता है।
इसलिए आवश्यक है कि- कलेक्टर हर जिले में मॉल, होटल, नाइट क्लब, मल्टीप्लेक्स, कोचिंग सेंटर, स्कूल, कॉलेज, सुपर बाजार जैसे व्यावसायिक और भीड़भाड़ वाले प्रतिष्ठानों का आकस्मिक निरीक्षण करें।
इसके लाभ—
- राजनीतिक दबाव कम।
- भ्रष्टाचार की रीढ़ टूटेगी।
- फर्जी प्रमाणपत्र आसानी से पकड़े जाएंगे।
- स्थानीय निकायों की जवाबदेही बढ़ेगी।
- समय पर निरीक्षण से हादसों को रोका जा सकेगा।
गोवा हादसा इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है-यदि जिला प्रशासन समय रहते हस्तक्षेप करता, तो शायद 25 मासूमों की जान बच सकती थी।
भीड़-उपस्थित संस्थानों पर अनिवार्य नियमित निरीक्षण-नई राष्ट्रीय नीति की आवश्यकता
निरीक्षण केवल वार्षिक नहीं, बल्कि जोखिम-आधारित होना चाहिए-

- नाइट क्लब/बार/बेसमेंट रेस्टोरेंट → मासिक निरीक्षण
- मॉल/मल्टीप्लेक्स/भारी भीड़ वाले बाजार→ त्रैमासिक
- स्कूल/कॉलेज/कोचिंग संस्थान→सत्रारंभ पूर्व
- होटल/गेस्ट हाउस→छमाही निरीक्षण
निरीक्षण में आवश्यक बिंदु-
- फायर-सेफ्टी उपकरण
- आपातकालीन निकास मार्ग
- इलेक्ट्रिकल सुरक्षा
- भीड़ नियंत्रण व्यवस्था
- गैस/एलपीजी सुरक्षा
- बिल्डिंग बायलॉज
- सुरक्षा कर्मियों का प्रशिक्षण
- सीसीटीवी/कंट्रोल सिस्टम
साथ ही, डिजिटल पब्लिक इन्स्पेक्शन रजिस्टर अनिवार्य हो ताकि जनता खुद जान सके कि कौन-सा प्रतिष्ठान सुरक्षित है।
सार्वजनिक सुरक्षा घोषणा- ‘इंडिया सेफ्टी कम्प्लायंस चार्ट’ का अनिवार्य प्रदर्शन
सिंगापुर, जापान, जर्मनी जैसे देशों की तरह भारत में भी हर प्रतिष्ठान के प्रवेश द्वार पर अनिवार्य होना चाहिए—
- फायर सेफ्टी प्रमाणन की तिथि
- सुरक्षा स्तर
- निकास योजना
- अग्निशमन उपकरणों की स्थिति
- विद्युत/स्वच्छता निरीक्षण की तिथि
- कलेक्टर का डिजिटल सत्यापन
यदि कोई प्रतिष्ठान यह चार्ट प्रदर्शित नहीं करता, तो उसे उच्च-जोखिम श्रेणी में रखा जाए।
उल्लंघन पर कठोर कार्रवाई- लाइसेंस रद्द,भारी दंड और आपराधिक मुकदमा
भ्रष्टाचार और लापरवाही पर कड़ा दंड आवश्यक है—
- पहली गलती: 10 लाख तक जुर्माना + 15 दिन निलंबन
- दूसरी गलती: लाइसेंस स्थायी रद्द
- तीसरी गलती: आपराधिक मुकदमा (IPC 304, 336, 337, 338)
क्योंकि ऐसी लापरवाही “प्रशासनिक गलती” नहीं, बल्कि नागरिकों की जान जोखिम में डालने का आपराधिक कृत्य है।
भ्रष्टाचार-हर हादसे की जड़
लाइसेंसिंग से लेकर निरीक्षण तक भ्रष्टाचार बिना इस प्रकार की घटनाएँ संभव ही नहीं।
गोवा मामले में—
- अवैध विद्युत कनेक्शन
- फर्जी लाइसेंस
- अधिक क्षमता से 3–4 गुना भीड़
- बंद आपातकालीन निकास
- निष्क्रिय फायर सिस्टम
यह सब स्पष्ट बताता है कि हादसा दुर्घटना नहीं बल्कि भ्रष्टाचार आधारित प्रशासनिक विफलता था।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि भारत एक अहम मोड़ परव्यावसायिक विस्तार और तेज़ आर्थिक विकास के बीच नागरिक सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देना अब अनिवार्य है। गोवा अग्निकांड चेतावनी है कि यदि-
- भ्रष्टाचार,
- प्रशासनिक लापरवाही,
- निरीक्षण तंत्र की विफलता
को समय रहते नहीं रोका गया, तो ऐसी त्रासदियाँ दोहराती रहेंगी।
इसलिए आवश्यकता है-
- कलेक्टर-स्तरीय स्वत: संज्ञान
- नियमित निरीक्षण
- सुरक्षा चार्ट का सार्वजनिक प्रदर्शन
- कठोर दंडात्मक कार्रवाई
- डिजिटल पारदर्शिता
- भ्रष्टाचार-विरोधी तंत्र का सशक्तिकरण
केवल तभी भारत सुरक्षित, पारदर्शी और जवाबदेह शहरी ढांचा स्थापित कर सकेगा।
संकलक-लेखक:कर विशेषज्ञ, स्तंभकार,साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक, चिंतक, कवि, संगीत माध्यमा सीए (ATC) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया महाराष्ट्र









