पूजा, इबादत, प्रार्थना सेवा और आध्यात्मिकता: राजनीतिक़ घुसपैठ से ऊपर उठाने की वैश्विक अनिवार्यता

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पूजा–इबादत और आध्यात्मिकता मनोरंजन नहीं: मानव आस्था, अध्यात्म और सांस्कृतिक उत्तरदायित्व का वैश्विक विमर्श

दुनियाँ के अनेक देशों में चुनावों,सत्ता-समीकरणों, सार्वजनिक नीतियों और सामाजिक एजेंडों में आध्यात्मिकता के नाम पर जनमत को प्रभावित करने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है

– एडवोकेट किशन सनमुख दास भावनानी

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर दुनिया के अनेक देशों में चुनावी रणनीतियों, सत्ता-संतुलन, सार्वजनिक नीतियों और सामाजिक एजेंडों में आध्यात्मिकता के नाम पर जनमत प्रभावित करने की प्रवृत्ति अभूतपूर्व रूप से बढ़ी है। गोंदिया (महाराष्ट्र) से एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी के अनुसार, आधुनिक विश्व का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि जिस काल में विज्ञान, तकनीक और भौतिक प्रगति मानव जीवन को ऊंचाइयों पर ले जा रही है, उसी समय मानव का आंतरिक संसार अस्थिरता और विभाजन की गिरफ्त में है। ऐसे युग में पूजा, इबादत, प्रार्थना और आध्यात्मिकता मानव-मन के संतुलन, संयम और करुणा के आधार बनने चाहिए थे, किंतु विडंबना यह है कि आज इन्हीं पवित्र क्षेत्रों में राजनीति की घुसपैठ बढ़ रही है। अध्यात्म का राजनीतिकरण केवल धार्मिक स्वतंत्रता का प्रश्न नहीं, बल्कि वैश्विक सामाजिक स्वास्थ्य, सामूहिक शांति और लोकतांत्रिक मजबूती का मुद्दा है। इसलिए यह अनिवार्य है कि पूजा–इबादत को मनोरंजन, विज्ञापन, भीड़-संचालन या प्रचार-प्रसार के साधन के रूप में बदलने की प्रवृत्ति पर रोक लगाई जाए और आध्यात्मिकता की पवित्रता को पुनर्स्थापित किया जाए।

विश्व की लगभग सभी धार्मिक और आध्यात्मिक परंपराएँ—हिंदू, बौद्ध, ईसाई, इस्लाम, यहूदी, ताओ, शिंतो—पूजा को एक आंतरिक प्रक्रिया मानती हैं, न कि प्रदर्शनात्मक क्रिया। हिंदू दर्शन में पूजा मन, बुद्धि और चित्त की शुद्धि का मार्ग है। बौद्ध परंपरा में पूजा से अधिक स्मृति और ध्यान पर बल दिया गया है, जिसका उद्देश्य मन की अशुद्धियों का क्षय है। इस्लाम में नमाज़ आत्मिक विनम्रता और अनुशासन का प्रतीक है। ईसाई परंपराओं में प्रार्थना आत्मिक संवाद है, जिसमें बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि भीतरी पवित्रता को सर्वोच्च माना जाता है। दुनिया की आध्यात्मिक धरोहर इस सत्य को स्वीकार करती है कि पूजा किसी उत्सव या मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि आत्मानुशासन, आत्मचिंतन और आत्मोन्नति की अंतर्जात्रा है।

मानव सभ्यता के विकास में पूजा, प्रार्थना, ध्यान और आध्यात्मिक साधनाएँ केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक नैतिकता, मानसिक अनुशासन और मानवीय संतुलन के स्तंभ रही हैं। किंतु आधुनिक डिजिटल युग, बाज़ारीकरण, उपभोक्तावाद और मनोरंजन-प्रधान संस्कृति ने पूजा के मूल स्वरूप को गंभीर संकट में डाल दिया है। पूजा का बाजारीकरण और उसका मनोरंजन में रूपांतरण न केवल इसकी पवित्रता को कम करता है, बल्कि समाज के मानसिक स्वास्थ्य और सांस्कृतिक शुचिता के लिए भी खतरा पैदा करता है। आज कई धार्मिक आयोजनों में भीड़, संगीत, साउंड सिस्टम, लाइट्स और डिजिटल प्रदर्शन का ऐसा मिश्रण देखने को मिलता है जिससे पूजा अपना वास्तविक उद्देश्य—आत्मिक एकाग्रता और मन की शांति—खोने लगती है।

डिजिटल मीडिया और सोशल नेटवर्क ने पूजा को भी मनोरंजन का हिस्सा बना दिया है। लाइव स्ट्रीमिंग, वायरल भक्ति कंटेंट, डांस वीडियो, डिजिटल डेवोशनल शो और सोशल मीडिया प्रतियोगिताएँ पूजा को एक आंतरिक साधना के बजाय एक ‘व्यू-बेस्ड’ गतिविधि में बदल रही हैं। यह दृश्य केवल भारत तक सीमित नहीं है; अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया, यूरोप, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में भी धार्मिक आयोजनों में ग्लैमरस प्रस्तुति और मनोरंजन संस्कृति का प्रभाव बढ़ रहा है। इस प्रवृत्ति ने पूजा को प्रदर्शन और डिजिटल लोकप्रियता के मापदंडों में बांधना शुरू कर दिया है, जिससे आध्यात्मिकता की आत्मा खोने लगती है।

21वीं सदी के राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में धार्मिक और आध्यात्मिक प्रतीकों का उपयोग सत्ता-समीकरणों को प्रभावित करने के लिए एक वैश्विक रणनीति बन चुका है। राजनीति यदि आध्यात्मिकता के क्षेत्र में प्रवेश कर जाए, तो वह भावनाओं, आस्थाओं और विश्वासों को हथियार बना देती है। इससे न केवल व्यक्तियों की धार्मिक स्वतंत्रता प्रभावित होती है, बल्कि सामाजिक एकता, धार्मिक सौहार्द और लोकतंत्र की मूल भावना भी कमजोर पड़ती है। आध्यात्मिकता मनुष्य को मानवता के सार्वभौमिक सिद्धांतों से जोड़ती है, जबकि राजनीति उसे समूहों, विचारधाराओं और पहचान-आधारित संघर्षों में विभाजित करती है।

राजनीति और आध्यात्मिकता का मिश्रण विश्व के अनेक हिस्सों में हिंसा, विभाजन और संघर्ष का कारण बना है। मध्य-पूर्व, अफ्रीका और एशिया के कई संघर्ष धार्मिक भावनाओं के राजनीतिक दुरुपयोग से उत्पन्न हुए हैं। जब राजनीतिक शक्तियाँ आध्यात्मिक संस्थाओं, पूजा-स्थलों या धार्मिक पहचान का उपयोग चुनावी लाभ या नीतिगत नियंत्रण के लिए करती हैं, तो इसका दुष्प्रभाव पूरे समाज के नैतिक ढांचे पर पड़ता है। धर्म का उद्देश्य व्यक्ति को भीतर की एकता से जोड़ना है, जबकि राजनीति उसे बाहरी संघर्षों में उलझाती है। इसीलिए पूजा, इबादत और आध्यात्मिकता को साम-दाम-दंड-भेद जैसी राजनीतिक रणनीतियों से दूर रखना अनिवार्य है।

सत्ता की रणनीति गणना, लाभ-हानि, प्रतिस्पर्धा और विभाजन पर आधारित होती है, जबकि आध्यात्मिकता का आधार प्रेम, करुणा, आत्म-अनुशासन और आंतरिक विकास है। दोनों की प्रकृति विपरीत है, इसलिए राजनीति और आध्यात्मिकता का मिश्रण न केवल धर्म के मूल स्वरूप को क्षतिग्रस्त करता है, बल्कि समाज में अविश्वास और तनाव भी बढ़ाता है। अमेरिका, यूरोप, जापान, मध्य-पूर्व और अफ्रीका सहित संपूर्ण विश्व में यह सिद्धांत स्थापित है कि धार्मिक स्वतंत्रता तभी सुरक्षित रहती है जब राज्य और आध्यात्मिक संस्थानों की सीमाएँ स्पष्ट हों।

समग्र रूप से विश्लेषण करें तो स्पष्ट है कि आध्यात्मिकता की वैश्विक सुरक्षा आज मानवता की सबसे बड़ी आवश्यकता है। आर्थिक अनिश्चितता, मानसिक तनाव, डिजिटल प्रदूषण और सामाजिक ध्रुवीकरण के इस युग में अध्यात्म ही मनुष्य को आंतरिक शांति और शक्ति प्रदान कर सकता है। लेकिन यदि यही आध्यात्मिकता राजनीति का उपकरण बन जाए, तो यह अपनी सार्थकता खो देती है। अतः पूजा–इबादत को मनोरंजन के प्रभाव से मुक्त रखना, आध्यात्मिकता के राजनीतिकरण को रोकना और राजनीति को धार्मिक संस्थानों से दूर रखना वैश्विक शांति और लोकतांत्रिक भविष्य की रक्षा के लिए अनिवार्य है।

आध्यात्मिकता को सुरक्षित रखना मानवता की रक्षा है। यदि मनुष्य का आंतरिक संसार शांत और संतुलित है, तो विश्व भी सुरक्षित रहेगा। यही आज की वैश्विक अनिवार्यता है—एक ऐसी अनिवार्यता जो पूजा, प्रार्थना और अध्यात्म को उसके मूल स्वरूप में पुनर्स्थापित करने का आह्वान करती है।

-संकलनकर्ता एवं लेखक: कर विशेषज्ञ, स्तंभकार, साहित्यकार, अंतरराष्ट्रीय लेखक, चिंतक, कवि, संगीत माध्यमा,सीए (ATC)  एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया, महाराष्ट्र

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Author: Bharat Sarathi

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