डिजिटल अराजकता पर लगाम: न्यूट्रल रेगुलेटर, कड़े दंड और एससी/एसटी एक्ट जैसी सख़्ती की पैरवी
सुप्रीम कोर्ट ने मांगी प्रि-स्क्रीनिंग व्यवस्था, कठोर कानून की दिशा में तेज़ संकेत**
एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

गोंदिया (महाराष्ट्र)। वैश्विक डिजिटल युग में जहाँ सोशल मीडिया अभिव्यक्ति, संवाद और विचार-विनिमय का सबसे शक्तिशाली माध्यम बन चुका है, वहीं इसके अनियंत्रित दुष्प्रभावों से निपटना अब दुनिया भर की सरकारों और अदालतों के लिए चुनौती बन गया है। इसी पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी ने सोशल मीडिया रेगुलेशन पर राष्ट्रीय बहस छेड़ दी है।
गोंदिया के वरिष्ठ विधि विशेषज्ञ एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी ने इस संदर्भ में सरकार को “ब्रह्मास्त्र” चलाने की आवश्यकता बताते हुए सुझाव दिया है कि सोशल मीडिया पर भी एससी/एसटी एक्ट जैसे कठोर कानून लागू कर संवेदनशील वर्गों की सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक टिप्पणी: “पोस्ट-फैक्टो हटाना अब अप्रभावी”
सोशल मीडिया कंटेंट पर नियंत्रण से जुड़ी याचिका सुनते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि हानिकारक पोस्ट बेहद तेज़ी से फैलते हैं, ऐसे में बाद में हटाना प्रभावी समाधान नहीं है।
कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह प्रि-स्क्रीनिंग मैकेनिज्म का मसौदा तैयार करे—यानी कंटेंट अपलोड होने से पहले उसकी स्क्रीनिंग हो। यह कदम किसी बड़े लोकतंत्र में पहली बार ऐसा मॉडल लागू करने का संकेत है।
सरकार ने कोर्ट को बताया कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय सोशल मीडिया पर बढ़ रहे अश्लील, आपत्तिजनक और दुष्प्रचारात्मक कंटेंट को रोकने के लिए नया कानूनी ढांचा तैयार कर रहा है, जिसके लिए चार सप्ताह का समय मांगा गया है।
क्या सोशल मीडिया के लिए बनेगा ‘न्यूट्रल रेगुलेटर’?
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि सोशल मीडिया अब व्यक्तिगत अभिव्यक्ति का मंच नहीं रहा, बल्कि यह वैश्विक प्रसारण का माध्यम बन चुका है।

टीवी, रेडियो और फिल्मों की तरह सोशल मीडिया पर भी प्रि-अप्रूवल या रेगुलेशन का तंत्र होना चाहिए। अदालत ने सुझाव दिया कि सरकार को एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और संविधान-आधारित रेगुलेटरी बॉडी बनानी चाहिए, जो न तो निजी कंपनियों के व्यावसायिक हितों से प्रभावित हो और न राजनीतिक दबावों से।
वर्तमान में सोशल मीडिया कंपनियाँ अपनी आंतरिक गाइडलाइंस और फैक्ट-चेकिंग पर निर्भर हैं—लेकिन उनकी पारदर्शिता और निष्पक्षता पर प्रश्न लगातार उठते रहे हैं।
एससी/एसटी एक्ट का उदाहरण: डिजिटल अपराध भी सामाजिक अपराध जितने गंभीर
सुनवाई के दौरान बेंच ने एससी/एसटी एक्ट का उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे जाति आधारित अपराधों पर कठोर दंड है, वैसे ही संवेदनशील समूहों—दिव्यांग व्यक्तियों, महिलाओं, अल्पसंख्यकों आदि—के खिलाफ अपमानजनक डिजिटल कंटेंट पर भी सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मामला दिव्यांगों पर कथित अपमानजनक टिप्पणी करने वाले यूट्यूबर्स से जुड़ा था। अदालत ने संकेत दिया कि डिजिटल अपराध अब पारंपरिक सामाजिक अपराधों की श्रेणी में गिने जाने चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय मॉडल: दुनिया भी तलाश रही है समाधान
भारत के इस कदम को वैश्विक विमर्श के संदर्भ में देखें तो—
- यूरोप का डिजिटल सर्विसेज एक्ट (DSA)
- ब्रिटेन का ऑनलाइन सेफ्टी एक्ट
- ऑस्ट्रेलिया का न्यूज़ मीडिया बार्गेनिंग कोड
- कनाडा का ऑनलाइन हार्म्स बिल
यह दर्शाते हैं कि सोशल मीडिया पर गलत सूचना, ऑनलाइन दुर्व्यवहार, साम्प्रदायिक तनाव और लोकतांत्रिक हस्तक्षेप अब अंतरराष्ट्रीय संकट बन चुके हैं।
कैसा होगा प्रि-स्क्रीनिंग मॉडल?
विशेषज्ञों के अनुसार प्रि-स्क्रीनिंग मैकेनिज्म में शामिल हो सकते हैं—
- AI आधारित स्वचालित फ़िल्टरिंग
- ह्यूमन मॉडरेशन
- स्वतंत्र निरीक्षण तंत्र
- प्लेटफ़ॉर्म-आधारित सह-नियमन मॉडल
हालाँकि इसके साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, वैचारिक पूर्वाग्रह, सेंसरशिप के दुरुपयोग और तकनीकी क्षमता जैसे सवाल भी उठते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में सुरक्षा और स्वतंत्रता दोनों का संतुलन आवश्यक है।
केवल दंड नहीं, समग्र सुधार की आवश्यकता
विशेषज्ञों का मानना है कि सख्त कानून के साथ-साथ—
- डिजिटल साक्षरता
- टेक कंपनियों की जवाबदेही
- डेटा सुरक्षा
- पारदर्शिता रिपोर्ट
- मॉडरेशन नीति
- शिक्षा और जागरूकता
भी उतनी ही आवश्यक हैं। लक्ष्य यह है कि नियम जनता की आवाज़ को न दबाएँ, बल्कि डिजिटल स्पेस को सुरक्षित और जिम्मेदार बनायें।
नए डिजिटल युग की ओर संकेत
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश न केवल कानूनी ढांचे में बदलाव का संकेत देते हैं बल्कि भारत के डिजिटल शासन के नए युग की शुरुआत का भी संकेत हैं। अब केंद्र सरकार और संसद पर निर्भर है कि वे इस मॉडल को किस रूप में लागू करती हैं और क्या भारत एक ऐसा निष्पक्ष, स्वतंत्र और पारदर्शी रेगुलेटर बना पाता है जो सोशल मीडिया को नियंत्रित भी करे और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा भी।
-संकलनकर्ता, लेखक, कर विशेषज्ञ, स्तंभकार, साहित्यकार, अंतरराष्ट्रीय लेखक, चिंतक, कवि, संगीत माध्यमा,सीए (ATC), एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया, महाराष्ट्र









