नए लेबर कोड—“सरलता” के नाम पर श्रमिक सुरक्षा से समझौता: एआईयूटीयूसी का आरोप

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गुरुग्राम, 28 नवंबर 2025 – राष्ट्रीय श्रमिक संगठन एआईयूटीयूसी के राज्य उपप्रधान एवं जिला सचिव श्रवण कुमार गुप्ता ने केंद्र सरकार द्वारा लागू किए जा रहे चार श्रम संहिताओं (लेबर कोड) को मजदूर-विरोधी करार देते हुए कहा कि सरकार जिनको ‘रोजगार बढ़ाने’, ‘पारदर्शिता लाने’ और ‘श्रमिकों को सुरक्षा देने’ वाली सुधार योजनाएँ बता रही है, वे वास्तव में कॉर्पोरेट हितों को बढ़ावा देने वाली नीतियाँ हैं।

गुप्ता ने कहा कि “यह वही भाषा है जिसमें निजीकरण को राष्ट्रवाद, महंगाई को विकास और असंगठित श्रम को अवसर कहा जाता है। इन नए लेबर कोड का दिल मजदूर के लिए नहीं, बल्कि बाजार के लिए धड़कता है।”

राष्ट्रीय स्तर पर कड़ा विरोध—26 नवंबर को मजदूर वर्ग की एकजुट आवाज

एआईयूटीयूसी ने बताया कि देश के लगभग सभी राष्ट्रीय श्रमिक संगठनों ने इन लेबर कोड का एक सुर में विरोध किया है और 26 नवंबर को आयोजित अखिल भारतीय विरोध दिवस ने श्रमिक असंतोष की व्यापकता को स्पष्ट रूप से सामने रखा है।

“सरलीकरण” नहीं, श्रमिक अधिकारों का संकुचन

श्रवण कुमार गुप्ता ने कहा कि सरकार का दावा है कि नए कोड श्रमिकों को ‘सौगात’ हैं, लेकिन वस्तुतः ये श्रमिक सुरक्षा घटाते हैं, नियोक्ताओं का लचीलापन बढ़ाते हैं और सामूहिक सौदेबाजी की शक्ति कम करते हैं।

उन्होंने कहा: “ये तथाकथित सुधार ‘ईज ऑफ डूइंग बिज़नेस’ नहीं, बल्कि नियोक्ताओं के लिए ‘ईज ऑफ फायरिंग’ का रास्ता खोलते हैं।”

नौकरी की स्थिरता पर सबसे बड़ा हमला
  • फिक्स्ड टर्म एंप्लॉयमेंट को कानूनी मान्यता देकर स्थाई नौकरी की अवधारणा पर अंतिम प्रहार किया गया है।
  • स्थायी रोजगार अब अधिकार नहीं, बल्कि महज़ एक अनुबंध बनकर रह गया है जो नियोक्ता की इच्छा पर निर्भर होगा।
  • ले-ऑफ, छंटनी और बंदी के लिए 100 कर्मचारियों की सीमा बढ़ाकर 300 कर देना सीधे-सीधे रोजगार सुरक्षा पर हमला है।
  • 300 से कम कर्मचारियों वाले उद्योग अब बिना किसी सरकारी अनुमति के सामूहिक छंटनी कर सकेंगे।
  • कंपनियाँ 11-11 महीने के कॉन्ट्रैक्ट देकर ग्रेच्युटी, लाभ व सुरक्षा प्रदान करने से बच सकती हैं।
  • इस व्यवस्था का परिणाम यह होगा कि श्रमिक सदैव भय और असुरक्षा में रहेंगे और अपने अधिकारों की मांग भी नहीं कर पाएंगे।
हड़ताल का अधिकार सीमित, यूनियन संरचना पर अंकुश
  • हड़ताल से पहले अनिवार्य नोटिस और पूर्व-अनुमति जैसे प्रावधान हड़ताल जैसे संवैधानिक अधिकार को व्यवहारतः असंभव बनाते हैं।
  • यूनियन की मान्यता के लिए 51% सदस्यता की शर्त लोकतांत्रिक ढांचे पर सीधा हमला है।
  • सुलह प्रक्रिया के बाद सीधे ट्रिब्यूनल में जाना श्रमिकों के लिए महंगा और लंबा रास्ता है, जबकि नियोक्ताओं को सिंगल लाइसेंस जैसी रियायतें दी गई हैं।

गुप्ता ने कहा— “उद्देश्य स्पष्ट है—यूनियनों को विभाजित करना, कमजोर करना और संघर्ष को असंभव बनाना। जब एक आवाज़ को दबा दिया जाता है तो लाखों आवाज़ें स्वतः मौन हो जाती हैं।”

सामाजिक सुरक्षा: कागज़ों में बहुत, ज़मीनी हकीकत में शून्य
  • गिग और प्लेटफ़ॉर्म वर्कर्स को शामिल करने का प्रावधान स्वागत योग्य जरूर है, लेकिन यह ‘सुरक्षा’ केवल कागजों पर है।
  • एग्रीगेटर्स पर 1–2% योगदान का फंड न तो पर्याप्त है और न ही गारंटीड।
  • वेतन संहिता में मजदूरी की नई परिभाषा ‘टेक-होम सैलरी’ घटा देगी। PF बढ़ने की आड़ में श्रमिक के हाथ में आने वाला वास्तविक वेतन कम होगा।
काम के घंटे बढ़ाकर 12 करना—श्रमिक स्वास्थ्य पर कुठाराघात

OSHWC संहिता के तहत कुछ सेक्टरों में 12 घंटे के कार्य दिवस का प्रावधान सीधे तौर पर श्रमिक कल्याण के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
गुप्ता ने कहा कि “जब 8 घंटे की कानूनी सीमा होते हुए भी कई जगह 12 घंटे काम कराया जाता है, अब उसे कानूनी जामा पहनाकर शोषण को वैध बनाया जा रहा है।”

निरीक्षण तंत्र को कमजोर कर कंपनियों को खुली छूट

लेबर इंस्पेक्टर को ‘फैसिलिटेटर’ बना देने का अर्थ है कि अब निरीक्षण नहीं, ‘सलाह’ होगी।
उल्लंघन करने वाली कंपनियाँ मामूली जुर्माना भरकर बच निकलेंगी।
“जब उल्लंघन सस्ता हो जाए और कानून लागू करना महँगा—तो शोषण लाभ का साधन बन जाता है।”

‘सुधार’ का असली चेहरा—बाजार को स्वतंत्रता, मजदूर को असुरक्षा

गुप्ता ने कहा— “जब अर्थव्यवस्था को रोजगार-केंद्रित होना चाहिए, उसे लाभ-केंद्रित बना दिया गया है। लोकतंत्र को असहमति से मजबूत होना चाहिए, लेकिन उसे आज्ञाकारिता से सजाया जा रहा है।”

हमारी मांगें—एक न्यायपूर्ण श्रम ढांचे के लिए संघर्ष जारी

एआईयूटीयूसी ने श्रमिकों के लिए संयुक्त संघर्ष का आह्वान करते हुए कहा कि संगठन निम्न मांगों पर दृढ़ है—

  • श्रम संहिताओं को तत्काल वापस लिया जाए
  • स्थायी रोजगार का अधिकार पुनः बहाल किया जाए
  • समान कार्य के लिए समान वेतन लागू किया जाए
  • यूनियन मान्यता से जुड़ी दमनकारी शर्तें हटाई जाएँ
  • निरीक्षण व दंड तंत्र को पुनः मजबूत किया जाए

गुप्ता ने कहा— “हम लड़ेंगे, मिलकर लड़ेंगे—मजदूर वर्ग के अधिकारों और मानवीय गरिमा की रक्षा के लिए।”

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Author: Bharat Sarathi

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