डॉ. विजय गर्ग
सेवानिवृत्त प्रिंसिपल, मलोट (पंजाब)

भारत में सदियों से छह ऋतुएँ—बसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत और शिशिर—एक सुसंगत क्रम में जीवन की धुरी रही हैं। हर ऋतु अपने साथ नया रंग, नई ऊर्जा और जीवन की अलग लय लेकर आती थी। परंतु आज प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन का बढ़ता दानव इस प्राकृतिक समरसता को निगलने लगा है। ऋतुओं का संतुलित चक्र अब टूटा-टूटा और बिखरा हुआ लगता है।
बिखरता मौसम–चक्र: छह ऋतुओं की जगह तीन मौसम
उत्तर भारत में अब छह नहीं, केवल तीन प्रमुख मौसम ही महसूस होते हैं—सर्दी, गर्मी और बरसात। वह भी तय समय पर नहीं आते। हेमंत और शिशिर की महीन ठंड लगभग गायब हो चुकी है। पहले अक्टूबर के अंत तक ठंडी हवा की पहली दस्तक मिलने लगती थी, पर अब ग्लोबल वार्मिंग के कारण मानसून अक्टूबर-नवंबर तक बना रहता है। अचानक पारा गिरता है, पर वह सहज ठंडक—हेमंत का सौंदर्य—कहीं खो गया है। सर्दी का समय भी अब सिकुड़ता जा रहा है।
बसंत: किताबों में कैद होने लगा ऋतु-सौंदर्य
मार्च-अप्रैल का सुहावना बसंत अब केवल स्मृतियों में बचा है। बीते कुछ वर्षों में इन महीनों में हीट वेव दस्तक दे देती है। नतीजतन, न फूलों की महक, न पीली सरसों की मुस्कान—सीधे झुलसाती गर्मी का सामना करना पड़ता है।
अनियमित बरसात: कृषि और जीवन दोनों अव्यवस्थित
कहीं बादल फटने जैसे हालात, तो कहीं सूखे की मार—मानसून का पैटर्न पूरी तरह बिगड़ चुका है। खेत-खलिहान, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि कैलेंडर सब गड़बड़ा गए हैं।
प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग: संकट की जड़
स्मॉग की जहरीली चादर
सरदियों की धुंध, जो कभी रोमांस और सौंदर्य का प्रतीक थी, आज जहरीले स्मॉग का रूप ले चुकी है। दिल्ली, पंजाब, हरियाणा समेत उत्तर भारत के शहरों में यह धुंध सूरज को निगलने लगी है। न दिन साफ, न रात सहज—शीत ऋतु का प्राकृतिक आनंद प्रदूषण में घुट रहा है।
ग्रीनहाउस गैसें: पृथ्वी की भट्टी बढ़ती हुई
जीवाश्म ईंधनों और अनियंत्रित औद्योगिक गतिविधियों ने वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन का स्तर खतरनाक हद तक बढ़ा दिया है। यह गैसें पृथ्वी को एक गर्म कंबल की तरह ढँककर तापमान बढ़ा रही हैं, जिससे ऋतुओं का चक्र असंतुलित हो रहा है।
ओजोन क्षरण: जीवन रक्षा कवच को चोट
वायु प्रदूषण के कारण ओजोन परत कमजोर पड़ रही है। परिणामस्वरूप, पृथ्वी के पारिस्थितिक तंत्र पर खतरा बढ़ता जा रहा है।
मानव जीवन पर गंभीर प्रभाव
स्वास्थ्य संकट
तेजी से बदलता तापमान और स्मॉग श्वसन रोग, एलर्जी, हृदय रोग, डेंगू-मलेरिया जैसे संक्रमणों में वृद्धि कर रहा है। बच्चे और बुजुर्ग सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं।
कृषि को गहरा नुकसान
तापमान में अनियमितता और बरसात की अनिश्चितता गेहूँ, धान, कपास जैसी फसलों के लिए विनाशकारी सिद्ध हो रही है। खाद्य सुरक्षा पर खतरा लगातार बढ़ रहा है।
धीरे-धीरे खोती ऋतु–संवेदनाएँ
बसंत की बयार, शरद की उजली धूप, सावन की सोंधी महक—हमारी पीढ़ी इन संवेदनाओं के साथ पली-बढ़ी। पर आज की नई पीढ़ी मौसम से अधिक प्रदूषण महसूस कर रही है। ऋतुएँ अब अनुभूति नहीं, AQI के आंकड़ों में सिमटकर रह गई हैं।
समाधान: समय अभी भी हाथ से फिसला नहीं है
अगर अभी भी कदम न उठाए गए तो ऋतुएँ सिर्फ किताबों में रह जाएँगी। समाधान स्पष्ट हैं—
- वायु प्रदूषण के स्रोतों पर कठोर नियंत्रण
- पराली प्रबंधन के लिए तकनीकी सहायता और किसानों को प्रोत्साहन
- वाहनों और उद्योगों के उत्सर्जन में कमी
- बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण
- जन–जागरूकता और पर्यावरण शिक्षा
प्रदूषण सामूहिक संकट है, इसलिए समाधान भी सामूहिक प्रयासों से ही संभव है।
उपसंहार
प्रदूषण ने केवल हमारी हवा और पानी को नहीं, बल्कि ऋतुओं के जीवनदायी चक्र को जकड़ लिया है। यह संकट पर्यावरण, संस्कृति और अस्तित्व—तीनों पर बराबर आघात है।
यदि आज हमने सचेत कदम नहीं उठाए, तो आने वाली पीढ़ियाँ बसंत, शरद और हेमंत को केवल कहानियों और कविताओं में ही महसूस कर पाएँगी।









