सरकार के इस फैसले को उच्च न्यायालय में दी जाएगी चुनौती

गुडग़ांव, 20 जनवरी (अशोक): प्रदेश में कोरोना महामारी के चलते करीब पिछले 2 वर्षों से स्कूलों में छात्रों की शिक्षा बुरी तरह से प्रभावित हुई है। प्रदेश सरकार ने शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत 8वीं कक्षा तक किसी भी छात्र को फेल न करने वाले नियम को समाप्त कर दिया है। यानि कि अब पहले की भांति 5वीं और 8वीं की वार्षिक परीक्षाएं होंगी, जिसमें न्यूनतम अंक न प्राप्त करने वाले छात्रों को अनुत्तीर्ण माना जाएगा।

केंद्र सरकार के इस अधिनियम में प्रदेश सरकार ने संशोधन किया है। अब सभी सरकारी व मान्यता प्राप्त निजी विद्यालयों में प्रत्येक शैक्षणिक वर्ष की समाप्ति पर 5वीं व 8वीं की परीक्षाएं हरियाणा शिक्षा बोर्ड लेगा। इसमें यह प्रावधान भी रखा गया है कि यदि कोई छात्र परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं होता है तो परीक्षा परिणाम की घोषणा के 2 माह के अंदर वह फिर से परीक्षा दे सकेगा। यदि वह फिर भी उत्तीर्ण नहीं होता है तो उसे उसी कक्षा में रखा जाएगा।

सरकार के इस फैसले का हरियाणा प्रोगे्रसिव स्कूल कांफ्रेंस (एचपीएससी) ने विरोध करना शुरु कर दिया है। उनका कहना है कि सरकार के इस फैसले से उन छात्रों की परेशानियां बढ़ जाएंगी, जो पिछले 2 वर्षों से स्कूल जा ही नहीं रहे हैं। उन्होंने इसका विरोध करते हुए कहा है कि ऐसा करना किसी के लिए भी न्याय संगत नहीं है। उनका आरोप है कि सरकार ने कोरोना के इस दौर में एक बार फिर से छात्रों को फेल होने का मानसिक तनाव दे दिया है। पिछले 2 वर्षों से लगातार कोरोना के कारण स्कूल ढंग से चल भी नहीं पाए। अधिकांश छात्रों ने ऑनलाईन ही शिक्षा प्राप्त की है, जिससे उनकी पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित रही है। चालू शिक्षा सत्र में भी स्कूल कुछ समय के लिए ही खोले गए हैं। यदि इनकी बोर्ड की परीक्षा ली जाती हैं तो छात्रों का परिणाम काफी खराब आएगा। संस्था का कहना है कि यह मामला उच्च न्यायालय में भी विचाराधीन है। संस्था अपना पक्ष मजबूती से रखेगी, ताकि फेल होने के मानसिक दबाव से छात्रों व उनके अभिभावकों को राहत मिल सके।

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