आज मोदीनीति के कारण हालत ये हैं कि देश में टीका नहीं है।
दो मामलो में कंफ्यूज नहीं है, एक तो मोदी की छवि न खराब हो और दूसरे सेंट्रल विस्टा का काम न रुकें।

अशोक कुमार कौशिक

 मोदी अब कह रहे हैं पहले और दूसरे टिके के बीच 21 नहीं 45 नहीं बल्कि 3 महीने यानी 90 दिन का अंतर रखा जाएगा इससे ज्यादा फायदा होगा। और साथ में मोदी सरकार इस पर विचार कर रही है कि जिनको एक बार कोरोना हो गया उन्हें 6 महीने बाद टीका लगाया जाए।

सवाल इतना है कि शुरुवात से ऐसा क्यों नहीं किया गया? तब क्या टीका बनाने वाली संस्था को यह नहीं पता था ? तब क्यों पीड़ित मरीज को 6 से 8 हफ्ते बाद वैक्सीन लगाई गई? पूरा देश जानता है वैक्सीन का निर्माण, वितरण और उपलब्धता केंद्र में बैठे मोदी सरकार की जिम्मेदारी थी। आज मोदीनीति के कारण हालत ये हैं कि देश में टीका नहीं है।

मोदी की अदूरदर्शिता और अकुशल नेतृत्व के कारण भारत में वैक्सीन की कमी हुई, भारत में महामारी का प्रकोप बढ़ा। देश त्राहिमाम कर रहा है । बताते चलें कि अमेरिका जुलाई तक 70% आबादी को टीका लगा देगा और इंगलैंड कोविड से मुक्त हो चुका होगा।

सरकार वैक्सीनशन को लेकर फिर उतने ही कन्फ्यूजन में है, जितने कि नोटबन्दी के समय मे थी। नोटबन्दी के समय मे भी 8 नवम्बर 2016 से 31 दिसम्बर 2016 तक सरकार ने लगभग सौ आदेश निकाले और कुछ तो एक दूसरे के विरोधाभासी थे तो कुछ भूल सुधार के थे।

आरबीआई से लेकर सभी बैंकों तक, वित्त मंत्रालय से लेकर सरकार के प्रवक्ताओं तक, जितने मुंह उतनी बातें। आज तक इस ‘मास्टरस्ट्रोक’ का मक़सद क्या था, पता नही चला। आज भी यही निकम्मेपन भरा कन्फ्यूजन, देश मे वैक्सीनशन को लेकर हो रहा है।

भारत के कोविड वर्किंग ग्रुप के चेयरमैन डॉक्टर एन के अरोरा ने कुछ दिन पहले कहा था की कोई बेहतर साइंटिफिक प्रूफ नहीं है की वैक्सीन की दो डोज में अंतराल 8 वीक से अधिक करना अच्छा है। केवल वही देश ऐसा काम कर रहें जहां वैक्सीन की कमी है। और आज यही डॉ अरोरा इस गैप को फायदेमंद बता रहे हैं । प्रथम और द्वितीय डोज़ मे पहले यह अंतर 40 दिन का था, फिर 6 से 8 सप्ताह का हुआ अब यह और बढ़ा दिया गया। कहीं यह न कह दिया जाय कि दूसरा डोज़ अब अगले साल लगेगा !

देश में वैक्सीनशन को लेकर यह कन्फ्यूजन क्यों है ? आज कोई भी बयान वैक्सीनशन के बारे में स्पष्ट नहीं है। जब कोविशिल्ड की कमी हो गयी तो उसके दूसरे डोज़ की मीयाद बढ़ा दी गयी। भारत की वैक्सीन पॉलिसी जब प्रधानमंत्री की छवि को ध्यान रखकर तय की जाने लगे और देश के बड़े बड़े डॉक्टर, एक्सपर्ट टीवी पर आकर एजेंडा तय करने में लग जाय तो जो हो रहा है इस देश में ये होना तय था।

वैक्सीनशन पर राहुल गांधी ने कहा कि विदेशी वैक्सीन्स भी देश में मंगा ली जाएं ताकि कमी ना हो। शुरू में इस बयान का तमाशा मज़ाक उड़ाया गया पर बाद में सरकार खुद ही विदेशों से वैक्सीन मंगाने को राजी हो गयी। अब तो राज्य भी ग्लोबल टेंडर आमंत्रित कर रहे हैं। पहले तो इस बयान पर रविशंकर प्रसाद ने कहा था कि राहुल गांधी विदेशी वैक्सीन कम्पनियों के हित मे बोल रहे हैं और उनकी दलाली कर रहे हैं। 
पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने पीएम को खत लिखा और कई सुझाव दिए। उस पत्र का एक अशालीन उत्तर स्वास्थ्य मंत्री ने सरकार के मंत्री की तरह से नही बल्कि एक राजनीतिक दल के  प्रवक्ता की तरह दिया। पर बाद में वे उन्ही विन्दुओं पर सोचने के लिये बाध्य भी हुए। लेकिन अहंकार इतना कि वह कुछ बेहतर सोचने देता ही नही है। 

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा कि वैक्सीन का फॉर्मूला अन्य कम्पनियों को भी बता दिया जाय ताकि वे भी बनाना शुरू करें और वैक्सीन की कमी पूरी हो जाय। पर भाजपा के नेताओ ने कहा कि यह कोई रेसिपी नहीं है कि सबको बता दिया जाय। मगर अब  भारत बायोटेक ने इस सुझाव का स्वागत किया है और फॉर्मूला को शेयर करने पर सहमति जताई है। 

सरकार का यह पहला कन्फ्यूजन नहीं है। यही तमाशा, काला धन, आतंकी फंडिंग्स, नकली मुद्रा, कैशलेस और लेसकैश आर्थिकी के रूप में नोटबन्दी के रूप में हुआ, यही तमाशा, साल 2020 के लॉक डाउन के दौरान बेहद शर्मनाक कुप्रबंधन के रूप में हुआ, यही तमाशा चीन की लदाख में घुसपैठ पर हुआ, जब एक कर्नल सहित 20 सैनिक शहीद हो गए और पीएम कह रहे थे कि न तो कोई घुसा था, और न ही कोई घुसा है, और अब यही तमाशा अब वैक्सीनशन में हो रहा है। 

गवर्नेंस और प्रशासन में गलतियां होती हैं। आज तक कोई भी ऐसा दक्ष प्रशासक नही हुआ है जिसके आकलन में चूकें न हुयी हों। पर एक दक्ष प्रशासक वह होता है जो उन चूको से न सिर्फ आगे के लिये सीख ग्रहण करता है बल्कि उन्हें दोहराने से बचता है। सरकार के लोंगो और समर्थकों की आज बस एक ही प्राथमिकता है नरेंद्र मोदी की निजी छवि को कोई नुकसान न पहुंचे। इस प्राथमिकता से बाहर आना होगा। 

सच तो यह है कि सरकार गवर्नेंस के लगभग मामलो में कंफ्यूज है बस वह केवल दो मामलो में कंफ्यूज नहीं है, एक तो नरेंद्र मोदी की छवि न खराब हो और दूसरे सेंट्रल विस्टा का काम न रुकें। रहा सवाल गंगा सहित अन्य नदियों में लाशें बहती रहे, दवाइयों और ऑक्सीजन की कमी से लोग मरते रहें, यह सब तो राज काज है, यूं ही चलता रहेगा, चलता रहता है।

error: Content is protected !!