दीपोत्सव की सार्थकता करुणा, स्त्री सम्मान, सामाजिक सद्भाव और जिम्मेदार आचरण में है
कुमार कृष्णन

भारतीय संस्कृति में पर्व और त्योहार केवल पूजा-पाठ और परंपराओं के निर्वाह तक सीमित नहीं हैं। उनमें जीवन को बेहतर बनाने, समाज को मानवीय मूल्यों से जोड़ने और मनुष्य को अपनी कमजोरियों से परिचित कराने का संदेश भी निहित है। नरक चतुर्दशी ऐसा ही पर्व है। छोटी दीपावली और रूप चौदस के नाम से प्रचलित यह अवसर हमें घरों की साफ-सफाई और दीप प्रज्ज्वलन के साथ अपने विचारों तथा आचरण को भी परखने की प्रेरणा देता है। इसका संदेश उन बुराइयों से मुक्ति का है, जो मनुष्य के विवेक, संवेदना और मानवीयता को कमजोर करती हैं।
नरक चतुर्दशी से जुड़ी प्रचलित पौराणिक कथा भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध की है। मान्यता है कि नरकासुर ने अपने अत्याचारों से लोगों का जीवन दूभर कर दिया था। उसने अनेक स्त्रियों को बंदी बना रखा था और शक्ति के अहंकार में निर्दोषों को प्रताड़ित करता था। श्रीकृष्ण ने उसका अंत कर बंदियों को मुक्त कराया। इस कथा का धार्मिक महत्व अपनी जगह है, लेकिन इसकी सामाजिक और नैतिक व्याख्या भी महत्वपूर्ण है। नरकासुर उस प्रवृत्ति का प्रतीक बनकर सामने आता है, जो शक्ति, धन और सत्ता के मद में दूसरों की स्वतंत्रता, गरिमा और अधिकारों को कुचलती है।
आज इस संदेश को व्यापक संदर्भ में समझने की जरूरत है। क्या हम दीप जलाने के साथ अपने व्यवहार में मौजूद ईर्ष्या, द्वेष, लालच, अहंकार और असहिष्णुता को भी दूर करने का प्रयास करते हैं? क्या दूसरों के दुख के प्रति संवेदनशील हैं? क्या हमारे उत्सव में उन लोगों के लिए भी जगह है, जिनका जीवन अभावों से घिरा है? इन प्रश्नों से बचकर हम पर्व की बाहरी भव्यता तो बढ़ा सकते हैं, उसका आंतरिक उद्देश्य पूरा नहीं कर सकते।
आत्ममंथन से सामाजिक संवेदना तक
मनुष्य के भीतर का अंधकार अनेक रूपों में दिखाई देता है। दूसरे की सफलता से ईर्ष्या, कमजोर का शोषण, गरीब की उपेक्षा, महिलाओं के प्रति हिंसा और सामाजिक भेदभाव इसके अलग-अलग चेहरे हैं। जब व्यक्ति अपने स्वार्थ को दूसरों के अधिकारों से ऊपर रखने लगता है, तब उसकी संवेदनाएं कमजोर पड़ती हैं। धीरे-धीरे अन्याय उसे सामान्य और दूसरों की पीड़ा महत्वहीन लगने लगती है। नरक चतुर्दशी इस जड़ता को पहचानने और उससे बाहर निकलने का अवसर बन सकती है।
हमारे समय की विडंबना है कि उत्सवों की चमक बढ़ रही है, लेकिन सामाजिक संवेदना कई बार पीछे छूट जाती है। बाजार ने त्योहारों को खरीदारी और प्रदर्शन से जोड़ दिया है। सजावट, महंगे उपहार और आतिशबाजी के बीच उत्सव का मानवीय पक्ष दबने लगता है। अपनी सामर्थ्य के अनुसार खुशियां मनाना स्वाभाविक है। चिंता तब होती है, जब खुशी का अर्थ केवल अपनी समृद्धि दिखाना रह जाए।
एक ओर जगमगाते घर हैं, दूसरी ओर ऐसे परिवार भी हैं जिनके लिए भोजन, उपचार और बच्चों की पढ़ाई का खर्च जुटाना कठिन है। हमारी खुशियों में इन परिवारों की भागीदारी कैसे हो, यह प्रश्न भी पर्व की तैयारी का हिस्सा होना चाहिए। किसी जरूरतमंद की सहायता, किसी बच्चे की पढ़ाई में सहयोग, किसी अकेले बुजुर्ग का हाल जानना और किसी बीमार व्यक्ति के उपचार में मदद करना दूसरे के जीवन में उजाला लाने के ठोस प्रयास हैं।
सहायता के साथ सम्मान भी जरूरी है। किसी की विवशता को सार्वजनिक प्रदर्शन का विषय बनाकर की गई मदद उसकी गरिमा को चोट पहुंचा सकती है। संवेदना का अर्थ है सामने वाले की जरूरत और आत्मसम्मान, दोनों को समझना। इसी तरह समाज की जिम्मेदारी केवल तात्कालिक सहायता तक सीमित नहीं है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और अवसरों तक समान पहुंच की चिंता भी करनी होगी।
नरकासुर की कथा का एक महत्वपूर्ण पक्ष स्त्रियों की मुक्ति से जुड़ता है। आज के संदर्भ में यह प्रसंग हमें महिलाओं की सुरक्षा, स्वतंत्रता और समानता पर विचार करने की प्रेरणा देता है। घर हो या कार्यस्थल, स्त्री की गरिमा का सम्मान हर जगह होना चाहिए। परंपरा और प्रतिष्ठा के नाम पर उसकी पसंद, शिक्षा, आजीविका और निर्णयों पर अनुचित रोक लगाना भी आत्ममंथन का विषय है।
स्त्री को समान अधिकारों से संपन्न स्वतंत्र नागरिक के रूप में स्वीकार करना आवश्यक है। देवी की पूजा के साथ घर और समाज की महिलाओं के प्रति सम्मानपूर्ण व्यवहार भी होना चाहिए। आस्था और आचरण के बीच यह सामंजस्य ही पर्व के संदेश को जीवन में उतार सकता है।
जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र के आधार पर मनुष्यों को कमतर समझने की प्रवृत्ति भी सामाजिक अंधकार है। विविधता के बीच सहअस्तित्व और परस्पर सम्मान समाज को मजबूत बनाते हैं। किसी की पहचान के कारण उसके साथ भेदभाव करना उसकी गरिमा के साथ हमारी सामूहिक चेतना को भी आहत करता है। दूसरे की आस्था का सम्मान और असहमति के बावजूद संवाद बनाए रखना सभ्य समाज की पहचान है।
सार्वजनिक जीवन में भी इसी आत्ममंथन की जरूरत है। लोकतंत्र की शक्ति नागरिक अधिकारों, संस्थाओं की स्वतंत्रता, जवाबदेही और सामाजिक न्याय में निहित है। सत्ता और अधिकार का उद्देश्य जनकल्याण होना चाहिए। जहां उनका इस्तेमाल भय पैदा करने, विरोध दबाने या निजी लाभ जुटाने के लिए होता है, वहां सार्वजनिक विश्वास कमजोर पड़ता है। भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और सार्वजनिक संसाधनों का दुरुपयोग सामूहिक प्रगति में बाधा बनते हैं। पद पर बैठे व्यक्ति से लेकर सामान्य नागरिक तक, सभी को अपने आचरण और जिम्मेदारियों का मूल्यांकन करना चाहिए।
प्रकृति और श्रम के सम्मान से सार्थक होगा उत्सव
प्रकृति के प्रति हमारा व्यवहार भी पर्व के व्यापक संदेश से जुड़ा है। जल, जंगल, जमीन और हवा जीवन का आधार हैं। उत्सव के उत्साह में इनके प्रति जिम्मेदारी नहीं भूलनी चाहिए। अनावश्यक शोर, धुआं और संसाधनों की बर्बादी से बचते हुए भी त्योहार आनंदपूर्वक मनाया जा सकता है। बच्चों, बुजुर्गों, बीमार व्यक्तियों और पशु-पक्षियों की सुविधा का ध्यान रखना हमारे उत्सव को अधिक मानवीय बनाता है।
मिट्टी के दीपों का उपयोग, बिजली की अनावश्यक खपत से बचाव, सजावट की वस्तुओं का दोबारा इस्तेमाल और सार्वजनिक स्थानों पर कचरा न फैलाना छोटे लेकिन उपयोगी कदम हैं। स्थानीय कारीगरों तथा छोटे दुकानदारों से खरीदारी करने पर त्योहार की खुशी उनकी आजीविका को भी सहारा देती है।
नरक चतुर्दशी से जुड़ी स्नान और स्वच्छता की परंपराएं हमें अपने भीतर झांकने का अवसर भी देती हैं। घर में जमा कचरा हटाने की तरह मन में जमा घृणा, पूर्वाग्रह और संकीर्णता को पहचानना जरूरी है। वर्षों पुरानी नाराजगी हो तो संवाद की संभावना तलाशें। किसी के प्रति गलत धारणा बना ली हो तो उसे बदलने का साहस करें। अपनी गलती स्वीकार करना कमजोरी नहीं, नैतिक परिपक्वता का परिचय है।
त्योहारों की रौनक के पीछे असंख्य लोगों का श्रम होता है। कुम्हार दीप बनाता है, बुनकर वस्त्र तैयार करता है, फूल विक्रेता सजावट में रंग भरता है और सफाईकर्मी सार्वजनिक स्थानों को स्वच्छ रखता है। छोटे दुकानदारों और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की मेहनत उत्सव को आकार देती है। उनके योगदान की पहचान, सम्मानपूर्ण व्यवहार और उचित पारिश्रमिक हमारी सामाजिक जिम्मेदारी है।
जिन हाथों की मेहनत से हमारे घर रोशन होते हैं, उनकी जरूरतों के प्रति उदासीन रहकर उत्सव की पूर्णता संभव नहीं। त्योहार पर अपने यहां काम करने वालों को समय पर भुगतान करना और उनके विश्राम तथा पारिवारिक जीवन का ध्यान रखना भी संवेदनशील आचरण है।
दरअसल, किसी पर्व की सार्थकता केवल दीपों की संख्या, सजावट या खरीदारी से तय नहीं होती। यह इस बात में भी दिखाई देती है कि हमारे व्यवहार में कितना सकारात्मक परिवर्तन आया और हमारे कारण किसी दूसरे को कितनी खुशी मिली। अनुष्ठान आत्मसुधार की प्रेरणा बनें, तभी उनका प्रभाव उत्सव के बाद भी बना रहेगा।
नरकासुर की कथा का नैतिक संदेश हर उस परिस्थिति में प्रासंगिक है, जहां अन्याय के कारण मनुष्य की गरिमा संकट में पड़ती है। दूसरों को कमतर समझना, शक्ति के आधार पर उनका हक छीनना और स्वार्थ को सर्वोपरि मानना ऐसी प्रवृत्तियां हैं, जिनसे निरंतर संघर्ष करना पड़ता है। इनका अंत एक दिन के संकल्प से नहीं होगा; इसके लिए रोजमर्रा के जीवन में विवेक, जागरूकता और नैतिक साहस चाहिए।
इस नरक चतुर्दशी पर दीप जलाते समय यह संकल्प भी लें कि हमारे व्यवहार से किसी का जीवन अधिक कठिन न हो। अपने घर की रोशनी के साथ किसी जरूरतमंद की खुशी की चिंता करें। स्त्रियों की स्वतंत्रता और सम्मान को स्वीकारें, कमजोरों के अधिकारों के प्रति सजग रहें और प्रकृति के साथ जिम्मेदारी से पेश आएं। नफरत के प्रसार को रोकना और संवाद के लिए जगह बनाना भी हमारी जिम्मेदारी है।
दीपक घर को प्रकाशित करता है; विवेक, करुणा और न्यायपूर्ण आचरण जीवन को दिशा देते हैं। नरक चतुर्दशी का संदेश तभी सार्थक होगा, जब बाहर की रोशनी हमारे भीतर भी बदलाव लाए। घर के साथ अपने विचारों और व्यवहार को स्वच्छ बनाने का प्रयास ही इस पर्व को स्थायी अर्थ दे सकता है।







