घर के साथ मन का अंधकार भी मिटाएँ, अधूरे संकल्पों और रिश्तों को सँवारें
चन्द्र प्रभा सूद

हम बड़े उत्साह और धूमधाम से दीपोत्सव मनाने की तैयारी करते हैं। घरों की सफाई, रंग-रोगन, खरीदारी और सजावट में जुट जाते हैं। दीपावली की रात दीपमालाओं से जगमगाते घर मन मोह लेते हैं। साधारण आर्थिक स्थिति वाला व्यक्ति भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार कुछ दीये जलाकर इस उत्सव में सहभागी बनता है। किंतु घर-आँगन को प्रकाशित करते समय हमें यह भी सोचना चाहिए कि क्या हमारे भीतर का अंधकार दूर हुआ है? दीपावली का पर्व हमें अपने जीवन, व्यवहार और संकल्पों पर आत्ममंथन करने का अवसर भी देता है।
लोकमान्यता के अनुसार, भगवान राम चौदह वर्ष का वनवास पूरा करके और रावण का वध करने के पश्चात माता सीता तथा अनुज लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे थे। उनके आगमन की प्रसन्नता में अयोध्यावासियों ने दीपमालाएँ सजाकर अमावस्या की रात को प्रकाशित किया था। स्वागत, प्रसन्नता और आशा का प्रतीक यह पर्व आज भी उसी उल्लास से मनाया जाता है। दीपक का प्रकाश हमें स्मरण कराता है कि अंधकार कितना भी गहरा हो, उसे दूर करने के लिए एक छोटी-सी ज्योति भी महत्त्वपूर्ण होती है।
माँ लक्ष्मी के स्वागत के लिए लोग अपने घरों, दुकानों और कार्यालयों की सफाई करते हैं। श्रद्धापूर्वक दीप जलाते हैं और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन माँ लक्ष्मी की पूजा से जीवन में मंगल और समृद्धि आती है। देश के कुछ क्षेत्रों और व्यापारिक समुदायों में दीपावली से जुड़ी नववर्ष तथा नए बही-खाते आरम्भ करने की परम्पराएँ भी हैं। यह अवसर पुराने कार्यों का लेखा-जोखा करने और नई शुरुआत का संकल्प लेने की प्रेरणा देता है।
हम पूरे वर्ष इस पर्व की प्रतीक्षा करते हैं। बच्चों का उत्साह तो देखते ही बनता है। वे कई दिन पहले से नए कपड़ों, मनपसन्द खिलौनों और मिठाइयों की योजनाएँ बनाने लगते हैं। उनकी खुशी से पूरे परिवार में उत्सव का वातावरण बन जाता है। इस उत्साह को ऐसी दिशा देना बड़ों का दायित्व है, जिसमें आनंद के साथ सुरक्षा और दूसरों की सुविधा का ध्यान भी बना रहे।
सजे हुए बाजार और खरीदारी करते लोगों की चहल-पहल त्योहार की रौनक बढ़ा देती है। दुकानदार आकर्षक सजावट और छूट के माध्यम से ग्राहकों को अपनी ओर बुलाते हैं। छोटे व्यापारियों, कुम्हारों और अन्य कारीगरों के लिए भी यह पर्व आजीविका का महत्त्वपूर्ण अवसर होता है। अपनी खरीदारी में उनके श्रम को स्थान देकर हम किसी दूसरे परिवार की दीपावली भी खुशहाल बना सकते हैं। साथ ही, हमें अपनी आवश्यकताओं और आर्थिक सामर्थ्य का ध्यान रखना चाहिए। दिखावे की होड़ में किया गया अनावश्यक खर्च बाद में परेशानी का कारण बन सकता है।
मित्रों, सम्बन्धियों और पड़ोसियों से मिलना तथा उपहारों का आदान-प्रदान करना इस पर्व की आत्मीयता बढ़ाता है। व्यस्त जीवन में त्योहार हमें एक-दूसरे के पास बैठने, हालचाल जानने और रिश्तों में आई दूरियाँ मिटाने का अवसर देते हैं। उपहार का मूल्य उसकी कीमत से अधिक उसमें छिपे स्नेह में होता है। कई बार प्रेम से कहे गए दो शब्द किसी महँगी वस्तु से अधिक खुशी दे जाते हैं।
उत्सव की गरिमा बनाए रखना भी हमारा दायित्व
कुछ लोग त्योहार के अवसर पर नशा करके परिवार और आसपास के वातावरण में कटुता पैदा कर देते हैं। कुछ जुआ खेलने को माँ लक्ष्मी की कृपा से जोड़ते हैं। ऐसी सोच से बचना चाहिए। जुए की लत आर्थिक हानि के साथ पारिवारिक विश्वास और मानसिक शांति को भी नष्ट कर सकती है। जिस पर्व का उद्देश्य घर में सुख और सौहार्द बढ़ाना है, उसे कलह और संकट का कारण क्यों बनने दिया जाए?
महाभारत का द्यूत प्रसंग इस विषय में गहरी सीख देता है। युधिष्ठिर ने जुए में अपना राज्य और धन-संपत्ति गँवाई तथा भाइयों, स्वयं और द्रौपदी को भी दाँव पर लगा दिया। आगे हुए दूसरे द्यूत के परिणामस्वरूप पांडवों को बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास स्वीकार करना पड़ा। यह प्रसंग हमें विवेक खोने और विनाशकारी आग्रह के परिणामों के प्रति सचेत करता है।
त्योहार की सात्त्विकता और गरिमा बनाए रखना हम सभी का कर्तव्य है। हमारा व्यवहार ऐसा हो, जिससे दूसरों को प्रसन्नता मिले। किसी जरूरतमन्द की सहायता करना, अकेले रह रहे बुजुर्ग का हाल पूछना या किसी दुखी व्यक्ति को सहारा देना भी दीपावली मनाने का सार्थक तरीका है। दूसरों के जीवन में आशा का दीप जलाने से हमारे अपने उत्सव का आनंद भी बढ़ता है।
अपने संकल्पों का भी करें लेखा-जोखा
इस दीपावली हमें कुछ समय अपने लिए निकालकर आत्ममंथन अवश्य करना चाहिए। बीते समय में हमने क्या सीखा? कौन-सी गलतियाँ बार-बार दोहराईं? किन सम्बन्धों को पर्याप्त समय नहीं दिया? कौन-से काम पूरे हुए और कौन-से अभी अधूरे हैं? इन प्रश्नों के ईमानदार उत्तर हमें आगे की दिशा दिखा सकते हैं।
वर्ष 2027 के लिए योजनाएँ बनाते समय अपने स्वास्थ्य, परिवार, कार्य और व्यक्तिगत विकास को उचित स्थान दें। केवल बड़े संकल्प लेने के बजाय ऐसे छोटे और स्पष्ट लक्ष्य तय करें, जिन्हें नियमित प्रयास से पूरा किया जा सके। अपने व्यवहार में धैर्य बढ़ाना, समय का सदुपयोग करना, अनावश्यक खर्च घटाना और परिवार के साथ समय बिताना भी महत्त्वपूर्ण संकल्प हैं।
पिछले वर्ष बनाई गई योजनाओं की समीक्षा भी आवश्यक है। जो कार्य पूरे हो गए हैं, उनके लिए स्वयं को सराहें और सहयोग करने वालों के प्रति आभार व्यक्त करें। जो कार्य अधूरे रह गए हैं, उनके कारण समझें। कहीं प्रयास में कमी रही, कहीं परिस्थितियाँ प्रतिकूल रहीं या कहीं योजना ही व्यावहारिक नहीं थी—इन बातों पर शांत मन से विचार करें।
हर अधूरी योजना को ज्यों का त्यों ढोते रहना भी आवश्यक नहीं है। जो लक्ष्य आज भी उपयोगी हैं, उन्हें पूरा करने की समयसीमा तय करें। जिनकी प्रासंगिकता समाप्त हो गई है, उन्हें छोड़कर आगे बढ़ने का विवेक रखें। ऐसा करने से जीवन में स्पष्टता आएगी और हमारी ऊर्जा सही दिशा में लगेगी।
दीपावली पर घर की सफाई के साथ मन में जमा ईर्ष्या, कटुता, अहंकार और द्वेष को दूर करने का प्रयास करें। जहाँ सम्भव हो, अपनी भूल स्वीकारें, क्षमा माँगें और मनमुटाव मिटाएँ। दीपक की लौ हमें दूसरों के लिए उपयोगी बनने और अपने आसपास उजाला फैलाने की प्रेरणा देती है। इस प्रेरणा को दैनिक आचरण में उतारना ही पर्व की सार्थकता है।
ईश्वर से प्रार्थना है कि यह दीपावली सबके जीवन में सुख, स्वास्थ्य, शांति और सद्भाव लेकर आए। हम अपने संकल्पों को कर्म में बदल सकें और हमारे प्रयासों से किसी दूसरे के जीवन में भी उजाला हो। घर-आँगन के साथ हमारे मन भी प्रकाशित हों—यही इस दीपोत्सव की सबसे सुंदर उपलब्धि होगी।







