हास्य-व्यंग्य के रंग, दिवाली के संग : अथ श्री दीवाला कथा!

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डॉ. घनश्याम बादल

दिलजले दिल की मांग पर छूट का तोहफा लिए, पटाखों की धूमधड़ाम और फुलझड़ियों की रमक-चमक के बीच, बेचूमल की चक्करदार चकरी घुमाती लो जी, आखिर दिवाली आ ही गई! वैसे जिसे आना होता है, वह आकर ही रहता है। दिवाली को आना था, सो आ गई। भला कौन रोक लेता! और दिवाली को रोक भी लेता तो बेचूमल के ‘छूट के खेल’ को कौन रोकता!

अब कोई कुछ भी कहे, महाराज, दिवाली का मजा ही कुछ और है। किसी के घर पटाखे जलते हैं तो किसी के घर की सजावट देखकर पड़ोसी जलते हैं। कोई फुलझड़ी जलाकर खुश है तो कोई दूसरों की खुशियों पर व्यंग्य की फुलझड़ियां छोड़ रहा है। कोई दिवाली के बम फोड़ता है तो किसी की जेब में दीवाले का बम फूट जाता है।

भाई, दिवाली है तो धमाका होगा ही—आंगन में हो या आदमी के बजट में!

चलिए, हम भी कुछ मजे लेते हैं और मिलते हैं अपने खास ‘दीवाला प्रेमियों’ से। देखते हैं, उनका दीवाला… अरे, क्षमा कीजिए, दिवाली कैसी मन रही है!

दिवाली आते ही लाला धनानंद सिंह के घर ऐसी हलचल मची, मानो कुबेर ने अपनी तिजोरी की चाबी इन्हीं के नाम कर दी हो। नया सोफा, नई गाड़ी, विदेशी झालर और लिछमी ताई के लिए हीरे का हार!

गरीबदास ने पूछा, “लालाजी, इतना खर्चा? लक्ष्मी जी नाराज हो गईं तो?”

लालाजी हंसे, “अरे बुड़बक! लक्ष्मी जी हमसे नाराज नहीं होतीं। वह ठाठ-बाट वालों के घर आती हैं। इसीलिए तो उनके आने से पहले सारा इंतजाम कर रहा हूं!”

लिछमी ताई ने बीच में टोका, “पिछली दिवाली का कर्ज अभी बाकी है। इस बार जरा सोच-समझकर खरीदारी करना। पहले ही कितना उधार चढ़ा है सिर पर!”

“चुप, भाग्यवान! वह कर्ज नहीं, हमारी आर्थिक प्रगति का ऐतिहासिक दस्तावेज है। जिसके सिर पर जितना बड़ा कर्ज, वह उतना बड़ा आदमी!”

लिछमी ताई बोलीं, “तब तो आप मोहल्ले के सबसे बड़े आदमी हो गए। दूधवाले से लेकर गाड़ीवाले तक, सब आपका नाम जपते हैं!”

तभी ठाकुर लोनप्रकाश जी प्रकट हुए। हाथ में कागजों का पुलिंदा और चेहरे पर ऐसी चमकती मुस्कान, मानो ब्याज की फसल पककर तैयार हो।

बोले, “लालाजी, इस दिवाली नई योजना लाया हूं—‘खरीदो अभी, सोचो बाद में!’ ब्याज है कम, योजना में दम!”

लिछमी ताई ने पूछा, “और किस्त न भर पाए तो?”

ठाकुर साहब मुस्कराए, “उसके लिए हमारा अलग विभाग है!”

इससे पहले कि लालाजी कुछ कहते, उधारीमल ने दस्तक दे दी।

“लालाजी, कुछ पुराना हिसाब बाकी है…।”

लालाजी का मुंह उतर गया। बोले, “अरे यार, त्योहार के दिन हिसाब की बात! कुछ तो लिहाज करो। हमारी संस्कृति में ‘अतिथि देवो भवः’ कहा गया है, ‘लेनदार देवो भवः’ नहीं!”

उधर गरीबदास दस दुकानों पर मोलभाव करके कुम्हार से चार दीये खरीदने पहुंचा। वहां भी कुछ रुपये कम कराने के लिए आधा घंटा बहस करता रहा। आखिर दीये लेकर लौटा तो पड़ोसीलाल ने कीमत सुनकर आंखें फैला दीं।

“मिट्टी के दीये और इतने महंगे!”

थोड़ी देर बाद गरीबदास ने उन्हीं पड़ोसीलाल को पांच हजार रुपये की विदेशी बिजली की लड़ी खरीदते देखा। उसके पेट में मरोड़ उठी और जबान काबू से बाहर हो गई।

पूछ बैठा, “पड़ोसीलाल जी, मिट्टी का दीया दस रुपये में महंगा और बिजली की लड़ी पांच हजार में सस्ती?”

पड़ोसीलाल ने समझाया, “अबे गरीबदास, तू नहीं समझेगा। दीये से घर रोशन होता है, विदेशी लड़ी से रुतबा!”

गरीबदास ने सिर खुजलाया, “वाह रे जमाने! अब उजाला आंखों से नहीं, पड़ोसी की जलन से नापा जाएगा!”

घर लौटते हुए उसे कुम्हार का बुझा चेहरा याद आया। बुदबुदाया, “और मैं भी खूब हूं! बड़े दुकानदार की छूट को प्रसाद समझकर स्वीकार करता हूं और कुम्हार की कमाई में से अपना त्योहार निकालता हूं!”

शाम को लिछमी ताई ने पूजा की थाली सजाई। धनानंद सिंह ने लक्ष्मी जी के सामने हाथ जोड़े—“माता, धन देना, वैभव देना, कारोबार बढ़ाना!”

तभी लोनप्रकाश जी का फोन आ गया। मासिक किस्त बकाया थी।

लालाजी ने फोन काटा तो दरवाजे पर उधारीमल खड़े मिले। उनके पीछे दो और लेनदार थे। बिजली के बकाया बिल की चेतावनी भी आ चुकी थी।

लिछमी ताई बोलीं, “पति महाराज, लक्ष्मी जी को बुलाया है या लेनदारों की पंचायत बैठाई है?”

लालाजी झुंझलाए, “तुम समझती नहीं! आजकल त्योहार उधार लेकर ही शानदार बनता है।”

“हां,” ताई बोलीं, “खुशियां हमारी होती हैं और उनकी किस्तें अगली दिवाली तक चलती हैं!”

अभी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि पिछले साल उधार पर सामान देने वाले बेचूमल सेठ के कर्मचारी आ पहुंचे। कई महीने की बकाया किस्तों पर बहस हुई। आखिर लालाजी को कुछ सामान लौटाकर हिसाब घटवाना पड़ा।

जिस बैठक को सजाने के लिए इतनी खरीदारी हुई थी, वहीं अब खाली जगह मुंह चिढ़ा रही थी। चक्कर खाए लालाजी साफ देख रहे थे—दिवाली की सफाई तो अधूरी रह गई थी, दीवाले ने घर जरूर साफ कर दिया!

अगली सुबह गरीबदास के घर चार दीये बुझ चुके थे, लेकिन उसके चेहरे पर संतोष था। धनानंद सिंह के घर विदेशी झालरें अब भी चमक रही थीं, मगर मेज पर बकाया किस्तों के कागज बिखरे पड़े थे।

गरीबदास मुस्कराया, “लालाजी, मेरी दिवाली में तेल कम था, लेकिन रुतबे के चक्कर ने तो आपका सारा तेल ही निकाल दिया!”

लालाजी कुछ कहते, उससे पहले मोबाइल चमका—

“दिवाली की महाछूट बढ़ाई गई! आखिरी मौका! अभी खरीदें!”

लालाजी की आंखों में फिर चमक आ गई।

“भाग्यवान, देख तो! ऐसा मौका बार-बार नहीं आता!”

लिछमी ताई ने माथा पीट लिया।

“हां, पिछली बार भी यही लिखा था। मौका फिर आ गया, पिछली किस्त अभी तक नहीं गई!”

उधर बाजार ठहाका मारकर हंस पड़ा। आखिर दिवाली तो उसी की थी! कोई दीया खरीद रहा था, कोई रुतबे का प्रमाणपत्र और लोनप्रकाश जी सबकी खुशियों का ब्याज जोड़ रहे थे।

बहरहाल, गरीबदास दीया जलाकर खुश है, धनानंद सिंह उधार की रोशनी में नहाए हैं, उधारीमल हिसाब लेकर खड़े हैं और लोनप्रकाश जी ब्याज की आरती उतार रहे हैं। लक्ष्मी जी आएं न आएं, बाजार का उल्लू जरूर सीधा हो रहा है।

इसलिए हे उत्सवप्रेमी भक्तों! दीये जलाइए, खुशियां मनाइए, लेकिन जेब का भी हाल पूछते जाइए। कहीं ऐसा न हो कि आप दरवाजे पर ‘शुभ-लाभ’ लिखते रह जाएं और लेनदार नीचे अपना हिसाब जोड़ जाए!

दिवाली आपकी मंगलमय हो—और उसकी किस्तें अगली दिवाली तक न चलें!

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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