धनतेरस: सुख, स्वास्थ्य और समृद्धि का महापर्व

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धन्वंतरि की आराधना और दीपदान से जुड़ा पर्व देता है आरोग्य, स्वच्छता और पारिवारिक खुशहाली का संदेश

सुरेश गोयल धूप वाला

दीपावली के पांच दिवसीय दीपोत्सव का शुभारंभ धनतेरस से होता है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाए जाने वाले इस पर्व को ‘धनत्रयोदशी’ और ‘धन्वंतरि जयंती’ भी कहा जाता है। भारतीय संस्कृति में इसका विशेष महत्त्व है। यह भौतिक संपन्नता के साथ उत्तम स्वास्थ्य, पारिवारिक सुख और मंगल की कामना का उत्सव है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। उन्हें देवताओं का वैद्य और आयुर्वेद का अधिष्ठाता माना जाता है। धनतेरस पर उनकी पूजा कर स्वस्थ जीवन और दीर्घायु की कामना की जाती है। लोकजीवन में प्रचलित उक्ति—‘पहला सुख निरोगी काया, दूजा सुख घर में हो माया’—इस पर्व के संदेश को सहज रूप में व्यक्त करती है। स्वस्थ शरीर ही जीवन की सबसे बड़ी संपदा है; उसके बिना अन्य सुखों का आनंद अधूरा रह जाता है।

धन्वंतरि जयंती के सम्मान में पहले धनतेरस पर आयुर्वेद दिवस भी मनाया जाता था। हालांकि, वर्ष २०२५ से भारत सरकार ने आयुर्वेद दिवस की स्थायी तिथि २३ सितंबर निर्धारित कर दी है। धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि की आराधना की धार्मिक परंपरा यथावत है।

धनतेरस पर नई वस्तुएं खरीदने की परंपरा है। लोग अपनी सामर्थ्य के अनुसार सोने-चांदी के आभूषण, सिक्के, बर्तन और घरेलू उपयोग की वस्तुएं खरीदते हैं। लोकमान्यता में इस दिन की खरीदारी को सुख-समृद्धि से जोड़ा जाता है। कुछ परंपराओं में खरीदी गई संपत्ति में तेरह गुना वृद्धि होने का विश्वास भी प्रचलित है। यह आस्था की अभिव्यक्ति है, जिसका मूल भाव घर में संपन्नता और शुभता के आगमन की कामना करना है।

इस अवसर पर पीतल और चांदी के बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है। कुछ क्षेत्रों में झाड़ू और साबुत धनिया खरीदने की भी परंपरा है। झाड़ू को स्वच्छता और लक्ष्मी के स्वागत से, जबकि धनिए को समृद्धि की कामना से जोड़ा जाता है। घरों की सफाई, वस्तुओं को व्यवस्थित करना और दीपोत्सव की तैयारी इस पर्व के उत्साह को बढ़ाते हैं।

धनतेरस की संध्या पर यमदेव के निमित्त दीपदान का विशेष महत्त्व माना जाता है। लोकपरंपरा में इसे ‘यम का दीपक’ कहा जाता है। अनेक परिवारों में सूर्यास्त के बाद मुख्य द्वार के निकट दक्षिण दिशा की ओर दीपक जलाया जाता है। धार्मिक विश्वास के अनुसार, यह दीपदान अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति और परिवार की दीर्घायु की कामना का प्रतीक है। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में इसकी विधि भिन्न हो सकती है, लेकिन इसके केंद्र में अपनों के सुख और सुरक्षा की प्रार्थना रहती है।

व्यापारिक और सामाजिक जीवन में भी धनतेरस विशेष स्थान रखता है। बाजारों में चहल-पहल बढ़ जाती है और दुकानों पर उत्सवी सजावट दिखाई देती है। व्यापारी अपने प्रतिष्ठानों में लक्ष्मी-कुबेर की पूजा करते हैं। बहीखातों की पूजा और नए खातों के शुभारंभ की परंपरा भी क्षेत्रीय रीति के अनुसार धनतेरस अथवा दीपावली से जुड़ी है। खरीदारी के इस उत्साह से स्थानीय दुकानदारों, कारीगरों और छोटे व्यापारियों की आजीविका को भी सहारा मिलता है।

पर्व की सार्थकता अपनी सामर्थ्य के अनुरूप उत्सव मनाने में है। किसी परिवार के लिए सोने-चांदी की खरीदारी प्रसन्नता का माध्यम हो सकती है, तो किसी के लिए उपयोग का एक छोटा बर्तन ही शुभता का प्रतीक बन जाता है। उत्सव का आनंद वस्तु की कीमत से अधिक उससे जुड़ी भावना और परिवार की साझा खुशी में निहित है।

धनतेरस हमें याद दिलाता है कि जीवन की संपदा अनेक रूपों में हमारे पास होती है—स्वस्थ शरीर, अच्छे संस्कार, अपनों का स्नेह और संतोष भी अमूल्य धन हैं। घर में प्रेम, सहयोग और खुशहाली हो, तभी भौतिक संपन्नता का सुख पूर्ण होता है। दीपोत्सव का यह पहला पर्व आरोग्य की कामना, स्वच्छता के संकल्प और समृद्धि की आशा के साथ जीवन को आलोकित करने का अवसर देता है।

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Author: Bharat Sarathi

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